Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 1:11 am

Thursday, July 9, 2026, 1:11 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

वेदों की ऋचाएं…ये सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि हमारी पूरी सभ्यता की धड़कन है…120 विद्यार्थियों की सांस-सांस में हम रोज इसे सुनते हैं : कृष्ण कुमार त्रिवेदी

लाइव इंटरव्यू – श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी, व्यवस्थापक, ब्रह्मा सावित्री वेद विद्यापीठ, पुष्कर

दिलीप कुमार पुरोहित व राखी पुरोहित

8302316074 diliprakhai@gmail.com

स्थान: जोधपुर, त्रिवेदी परिवार का निवास

[दृश्य 1 – आरंभ ही महान है…]

शोभावतों की ढाणी विक्टोरियन पैलेस। शहर का शांत इलाका। यहां त्रिवेदी परिवार कभी-कभार ही आता है। दो दिन पहले उनकी पुत्री विधि दाधीच का अरंगेत्रम था। इसी सिलसिले में वे यहां आए थे। जब हम उनके फ्लैट पर पहुंचते हैं तो वे दोपहर के भोजन की तैयारी की रहे थे। यहीं पर कृष्ण कुमार त्रिवेदी से लंबी बातचीत हुई।

हम बैठते हैं, और बातचीत शुरू होती है।
त्रिवेदी जी कहते हैं –
“चलिए, पहले जलपान कीजिए … फिर वेदों की दुनिया में उतरते हैं।”

प्रश्न 1: त्रिवेदी जी, आपकी कहानी कहां से शुरू होती है?

त्रिवेदी जी हल्का सा मुस्कुराते हैं, जैसे कोई पुराना किस्सा याद कर रहे हों –

“शुरू से ही मुझे सनातन धर्म से एक गहरा लगाव था। बचपन में आरएसएस की शाखा में जाता था, गण शिक्षक भी रहा। वहीं से संस्कृति के बीज मन में पड़ गए। आगे 1983 में मेरी नौकरी बीएसएनएल में लग गई। अकाउंट ऑफिसर से रिटायर हुआ। इस दौरान श्री आनंद राठी जी के संपर्क में आया और ब्रह्मा सावित्री वेद विद्यापीठ से जुड़ गया।

प्रश्न 2: लेकिन इस संस्था की कहानी तो और भी पुरानी होगी…

वे तुरंत सिर हिलाते हैं –

“हां, बिल्कुल। ब्रह्मा सावित्री वेद विद्यापीठ की कहानी समझने के लिए पहले आपको पूज्य स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज के बारे में जानना पड़ेगा।

वे सिर्फ़ 12 साल के थे, जब भागवत कथा करना शुरू कर दिया था। उनका नाम पहले श्री किशोर जी व्यास था। 45 साल तक विवाह नहीं किया, शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के शिष्य रहे और उनके साथ भागवत कथा करते रहे। बाद में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि से दीक्षा ली और नाम पड़ा – स्वामी गोविंद देव गिरि

एक समय, सत्यमित्रानंद गिरि जी ने अपनी गादी उन्हें दी। लेकिन महाराज जी ने छह माह बाद भारत माता की गादी अवधेशानंद गिरि जी को सौंप दी और खुद एक संकल्प लिया – ‘राजस्थान में 108 वेद विद्यालय खोलने हैं’।

वे थोड़ा ठहरते हैं, फिर गहरी आवाज़ में कहते हैं –
“उनका कहना था – वेदों के बिना संस्कृति की पुनर्स्थापना संभव नहीं।”

[दृश्य 2 – स्मृतियों के पन्ने]

त्रिवेदी जी आगे बढ़ते हैं –

“28 जनवरी 2001 को, पुष्कर के अखिल भारतीय माहेश्वरी सेवा सदन में ‘महेश वेद अध्ययन केंद्र’ के रूप में यह विद्यालय शुरू हुआ।

इसमें स्व. श्री पुखराज जी कालानी, स्व. श्री चिरंजीलाल जी झंवर, स्व. श्री ओमप्रकाश जी सोनी और आचार्य महेश जी नंदे जैसे महान लोग जुड़े। उद्घाटन पद्मश्री राजश्री जी बिड़ला ने किया।

लोग जुड़ते गए और आज 120 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। अब तक 500 से अधिक विद्यार्थी यहां से शिक्षा लेकर जा चुके हैं।” श्री आनंद राठी वर्तमान में इसके अध्यक्ष हैं, जिनके कुशल संचालन और मार्गदर्शन में यह संस्थान फलीभूत हो रहा है।

प्रश्न 3: यहां शिक्षा व्यवस्था कैसी है?

उनकी आंखों में चमक आ जाती है –

“ये गुरुकुल पद्धति है। रहना, खाना, पढ़ना – सब निशुल्क। सात साल का कोर्स होता है, यजुर्वेद की शिक्षा दी जाती है।
संस्कृत और कंप्यूटर भी सिखाते हैं।

परिसर 10 बीघा ज़मीन में फैला है – छात्रावास, आचार्य निवास, 35 कमरे का गेस्ट हाउस, कंप्यूटर लैब, और मृत्युंजय महादेव मंदिर

इस मंदिर की स्थापना शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने की थी। यहां शिवलिंग पर छात्र रोज़ अभिषेक करते हैं।”

[दृश्य 3 – वेदों का महत्व]

हम पूछते हैं – “आज की दुनिया में वेद क्यों ज़रूरी हैं?”
वे गहरी सांस लेकर कहते हैं –

“मानव जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक, राष्ट्रीय, पर्यावरण और तमाम समस्याओं का समाधान वेदों में है।

ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण विज्ञान प्रणाली हैं। दुनिया का बौद्धिक वर्ग अब इन्हें गंभीरता से पढ़ रहा है।

भारतीय संस्कृति की सुप्त विद्याओं को पुनर्जीवित कर, व्यक्ति और समाज में उच्च मूल्यों की स्थापना करना – यही हमारा उद्देश्य है।”

प्रश्न 4: परिसर में क्या-क्या सुविधाएं हैं?

“हमारा परिसर पुष्कर सरोवर के दक्षिण में, सावित्री मंदिर के पास है। यहां 150 छात्रों के लिए कक्षाएं, वाचनालय, ग्रंथालय, 12 आचार्य निवास क्वार्टर हैं।

मंदिर में अष्टभुजाधारी मृत्युंजय महादेव, माता पार्वती, गणपति, हनुमान और गायत्री माता विराजमान हैं।

छात्र महामृत्युंजय जप, महारुद्राभिषेक, लघुरुद्र, नवचंडी, शत-चंडी जैसे अनुष्ठान कराते हैं। यजमान परिवारों के लिए 35 AC कमरों का विश्रांति गृह है।”

[दृश्य 4 – सहभागिता योजनाएं]

त्रिवेदी जी योजनाओं के बारे में बताते हैं –

“हमने ऋषि कुमार दत्तक योजना बनाई है। आप 21,000 रुपये वार्षिक देकर एक छात्र को गोद ले सकते हैं। सात साल के लिए 1,47,000 रुपये में पूरा सहयोग कर सकते हैं।

इसके अलावा, विशेष अनुष्ठान योजनाएं हैं – षडंग रुद्राभिषेक (11,000 रुपये), महा रुद्राभिषेक (36,000 रुपये)। यज्ञशाला में 15,000 रुपये में मांगलिक अवसर पर यज्ञ हो सकता है।

भोजन के लिए ‘अन्नक्षेत्र योजना’ – 15,000 रुपये में एक समय के भोजन का प्रबंध।

हर पूर्णिमा और सोमवार को विशेष आरती व यज्ञ भी होते हैं। कोई भी यजमान आकर इसमें सहभागी बन सकता है।”

प्रश्न 5: आप खुद इस मिशन को कैसे महसूस करते हैं?

वे गंभीर होकर कहते हैं  –

जब मैं इन बच्चों को वेद मंत्रों का उच्चारण करते सुनता हूं, तो लगता है – ये सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि हमारी पूरी सभ्यता की धड़कन है।

और अगर हम इसे बचा पाए, तो ये सबसे बड़ा पुण्य होगा।”

[दृश्य 5 –त्रिवेदी जी की धर्मपत्नी मधु जी से आत्मीय मुलाकात और बातचीत विराम…]

बातचीत लगभग दो घंटे चली। बीच-बीच में त्रिवेदी जी कभी पुरानी घटनाएं सुनाते, कभी अपने मोबाइल में मंदिर और परिसर की तस्वीरें दिखाते। बाहर शाम का रंग गहरा रहा था।
हम उठे तो उन्होंने कहा –
“बस, आप ये संदेश लोगों तक पहुंचा दीजिए… ताकि वेदों की ज्योति बुझने न पाए।”श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी केवल एक व्यवस्थापक नहीं, बल्कि एक संरक्षक हैं – संस्कृति, वेद और भारतीय आत्मा के। पुष्कर का ब्रह्मा सावित्री वेद विद्यापीठ सिर्फ़ एक संस्था नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक धरोहर है, जहां मंत्रों की गूंज में अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ सांस लेते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor