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Sunday, August 23, 2026, 10:59 pm

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कथक और मांड के मिश्रण से नृत्य-गायन के आसमां पर चंद्रोदय बनकर छाईं डॉ. शशि सांखला

जोधपुर में जन्मीं और पली-बढ़ी डॉ. शशि सांखला कथक के जयपुर घराने की एक प्रख्यात प्रतिपादक और एक जीवंत किंवदंती हैं, जिन्होंने इस शास्त्रीय नृत्य को नए आयाम दिए हैं।
कथक के अलावा, उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन, भरतनाट्यम और पखावज जैसे अन्य कला रूपों में भी प्रशिक्षण लिया, जिसने उनकी अभिव्यक्ति को एक व्यापक और गहरा आयाम दिया।

अमित सांखला. जोधपुर

डॉ. शशि सांखला। प्रख्यात शास्त्रीय नृत्यांगना। जिन्होंने कथक को मांड के मिश्रण से नव ऊंचाइयां देते हुए नृत्य-गायन के आसमां पर चंद्रोदय बनकर छाने में महारथ हासिल की। कथक को मांड के साथ मिलकर नया अध्याय गढ़ने वाली जोधपुर की बेटी डॉ. शशि सांखला अब किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। जोधपुर में जन्मीं और पली-बढ़ी डॉ. शशि सांखला कथक के जयपुर घराने की एक प्रख्यात प्रतिपादक और एक जीवंत किंवदंती हैं, जिन्होंने इस शास्त्रीय नृत्य को नए आयाम दिए हैं।

उनकी कला यात्रा भारत की समृद्ध परंपरा का एक प्रमाण है, जो एक कलाकार के रूप में उनकी विनम्र शुरुआत से लेकर एक संस्था-निर्माता और संरक्षक बनने तक की कहानी कहती है। उनका काम कला को संरक्षित करने और उसे नया जीवन देने का एक शानदार उदाहरण है।

कलात्मक सफर : गुरुओं की विरासत से बनी एक शख्सियत

​डॉ. सांखला का जन्म 1948 में जोधपुर में हुआ था। उन्होंने अपनी कलात्मक शिक्षा यहीं के राष्ट्रीय कला मंडल में शुरू की। उन्होंने कथक का प्रारंभिक प्रशिक्षण पंडित मूलचंद गोमेती और पंडित मोहन लाल महाराज से प्राप्त किया । हालांकि, उनके काम पर सबसे गहरा प्रभाव उनके गुरु, महान कथक maestro पंडित कुंदन लाल गांगानी का रहा। डॉ. सांखला ने उनके विचारों को आत्मसात किया, जिसमें लास्य (कोमलता) और तांडव (ओजस्विता) दोनों पर समान बल दिया गया था। कथक के अलावा, उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन, भरतनाट्यम और पखावज जैसे अन्य कला रूपों में भी प्रशिक्षण लिया, जिसने उनकी अभिव्यक्ति को एक व्यापक और गहरा आयाम दिया।

​नवाचार की एक नई परिभाषा

​डॉ. शशि सांखला का सबसे महत्वपूर्ण योगदान कथक के अभिनय (भाव) को राजस्थानी लोक गायन शैली ‘मांड’ के साथ मिलाना है। इस अनूठे प्रयोग ने कथक को एक “व्यापक और गहरा कैनवास” प्रदान किया और जयपुर घराने में ‘ठुमरी’ की कमी को पूरा किया। उनके इस नवाचार को कला जगत में व्यापक प्रशंसा मिली है। उन्होंने अपने इस शोध को ‘मांड: कथक नृत्य में अभिनय का एक सशक्त माध्यम’ नामक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया है, जिसने उनके काम को एक अकादमिक आधार दिया है।

शिक्षण और संस्थान का निर्माण

अपनी युवावस्था में ही 18 वर्ष की उम्र में डॉ. सांखला ने जोधपुर के राष्ट्रीय कला मंडल में पढ़ाना शुरू कर दिया था। 1978 में, वह जयपुर कथक केंद्र में ‘नृत्य गुरु’ के रूप में शामिल हुईं और 2006 में प्रिंसिपल के रूप में सेवानिवृत्त हुईं। सरकारी संस्थान से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने अपनी कला को आगे बढ़ाने की अपनी तीव्र इच्छा के कारण 1981 में खुद के संस्थान ‘गीतांजलि म्यूजिक सोसायटी’ (जिसे तिलक संगीत केंद्र भी कहा जाता है) की स्थापना की। आज, यह संस्थान कथक, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और अन्य कला रूपों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

सम्मान और विरासत

​डॉ. सांखला को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2001 में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2008 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों के अलावा, उन्हें ‘दैनिक भास्कर’ द्वारा भी सम्मानित किया गया है। ​उनकी विरासत उनके हजारों छात्रों के माध्यम से जीवित है, जिनमें उनकी अपनी बेटियां भी शामिल हैं। उनके शिष्य उनकी कला को देश और विदेश में ले जा रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि डॉ. सांखला ने कथक को एक ‘जीवंत परंपरा’ के रूप में कायम रखा है । जोधपुर की इस बेटी ने कथक को नया जीवन दिया है, जिससे यह कला आज भी समकालीन दुनिया से जुड़ी हुई हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor