आदरणीय पिताजी,
सादर प्रणाम
आज आपकी बहुत याद आ रही है। बरसों बीत गये आप को परलोक सिधारे मगर एक दिन भी ऐसा नहीं निकला कि आपको याद न किया हो। सुना है पिता सूरज है, आत्मा होते है, आप क्या गये मेरी आत्मा ही सूनी हो गयी। अब मुझे मायका अच्छा ही नहीं लगता आपके बिना क्योंकि आप ही मुझे बहुत स्नेह देते थे, मुझे स्पेशल महसूस कराते थे।
पापाजी आपको एक बात कहने के लिए ये पत्र लिख रही हूँ। आपके बाद मम्मी और दोनों भाइयों ने जिम्मेदारी निभाई है मेरे प्रति, मगर आपके जैसा प्रेम नहीं मिला मुझे, विवाह के बाद दोनों भाइयों का परिवार हो खास हो गया, मैं तो बस औपचारिक रिश्तों में बँधी रह गयी। खैर अब मैं भी अपनी गृहस्थी में मस्त हूँ मगर एक टीस मन में उठती रहती है।
आप करोड़पति परिवार अपने पीछे छोड़ गये, आपने कुछ संपत्ति मुझे देने को बोला था जो उस समय तो स्वीकार कर लिया गया लेकिन आपके जाने के बाद ये सब मुकर गये। दोनों भाइयों से संपत्ति अपने कर ली, मैंने भी उनकी बातों में आकर भोलेपन में नो ड्यूज पर हस्ताक्षर कर दिए। करोड़ो का मेरा हिस्सा उनके नाम कर दिया। उन्होंने इतने सालों में मुझे एक लाख भी पूरे नहीं दिए जबकि वादा किया था कि कुछ हिस्सा बिकने पर कुछ लाख मुझे भी देंगे। जब भी मायके जाती, 4-5हजार का खर्चा कर देते व रोना रोते रहते। आपके दामाद का तीन बार एक्सीडेंट हो गया, मुझे अपने गहने बेच कर काम चलाना पड़ा। मायके वालों ने कोई भी मदद करने से इंकार कर दिया। इस बार जब मायके गयी तो दोनों भाइयों ने खूब झगड़ा किया व मां चुपचाप देखती रही। आज तीन महीने से ज्यादा समय हो गया, एक फोन भी नहीं आया। भाइयों का तो कुछ नहीं पर माँ को एक बार भी मेरी याद नहीं आई। आपकी इकलौती बेटी खून के आँसू पीकर वक्त बिता रही है। अपना हिस्सा दे दिया पर मुसीबत में कुछ लाख धन मांगने की ये सजा मिली मुझे… पापाजी!आप होते तो क्या मेरे साथ ऐसा होता क्या? क्यों दूर चले गये आप? आज लगता है कि अनाथ ही हो चुकी हूँ।
क्या करोड़पति मायके से कुछ लाख मदद मांगना गुनाह हो गया, लौटा देती मैं धीरे धीरे… मगर…
खैर.. आपसे मन की बात कहकर थोड़ा सुकून मिला है। आप मुझे न्याय दिलाइए। मैं बस कुछ लाख की मदद ही तो माँग रही हूँ, करोड़ो का अपना हिस्सा तो सहर्ष वर्षों पूर्व दे ही चुकी हूँ। क्या इंसानियत के नाते वे मेरी मदद नहीं कर सकते?
मुझसे बोलना भी छोड़ दिया, फोन तक नहीं किया, क्या यही न्याय है?
आप ही बताओ मुझे.. सपनें में आकर मुझे समझाओ.. कोई दिलासा दो, कोई राह ही सुझा दीजिए। मुझे आशीर्वाद दीजिए कि इस मुश्किल वक्त में मैं अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा कर सकूँ, आपके दामाद तो कमाकर देते नहीं, उनको तो दुकान में हमेशा घाटा ही घाटा हुआ है।
बुत बेदर्द है ये दुनिया.. बस मेरे बेटे पढ़ लिखकर कमाने लगे फिर आप इस कलयुगी संसार से मुझे भी अपने पास ही बुला लेना। थक गयी हूँ मैं.. दुःख सहते सहते.. बस बच्चों का मुख देख कर ही जी रही हूँ।
मुझे कोई दिशा दिखाओ पापाजी…
शत शत नमन
आपकी लाडली
(जो अब किसी की भी प्रिय ना रही)।
नीलम व्यास स्वयंसिद्धा





