विदेशों में प्रधानमंत्री मोदी का गायत्री मंत्र और शांति मंत्र से स्वागत होता है, सांस्कृतिक गीत आवभगत करते हैं…मोदी के इस चेहरे को दुनिया सलाम करती है, मगर बाहर तो यश ज्योत जल रही, घर में अमावस अंधियारी वाली कहावत चरितार्थ हो रही है…
अभी से वेब सीरीज की अश्लीलता और नशे की मानसिकता को नहीं रोका गया ताे समाज में बढ़ते सांस्कृतिक प्रदूषण को कैसे रोक पाएंगे? सेंसर बोर्ड में ऐसे-ऐसे लोगों को सरकार ने बिठा रखा है जो समाज के ताने-बाने को स्वाहा होते देख रहे हैं, मगर कोई एक्शन नहीं ले रहे? प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी राइजिंग भास्कर आपसे कड़ी भाषा में सवाल पूछ रहा है- क्या आप भारतीय फिल्मों का यही चेहरा लेकर फिर विदेशों में यात्रा करेंगे या कुछ कड़े कदम उठाएंगे?
चलते-चलते बात स्टैंडअप कॉमेडी की भी कर दें…गालियों, दोहरे अर्थ वाले चुटकुलों और संबंधों पर भद्दी टिप्पणियों से भले ही कुछ दर्शक ठहाके लगाते हों, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इसे अपमानजनक और स्तरहीन मानते हैं।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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भारत को दुनिया में उसकी संस्कृति, सभ्यता और पारिवारिक मूल्यों के लिए पहचाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब विदेश यात्राओं पर जाते हैं तो भारतीय संस्कृति का बखान करते हैं—कभी शांति पाठ के जरिए, कभी गायत्री मंत्र के जरिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि यही प्रधानमंत्री अपने देश में बढ़ती वेब सीरीज़ और फिल्मों की अश्लीलता, शराब और सिगरेट के दृश्यों पर मौन क्यों हैं? क्यों ऐसी सीरीज़ सेंसर बोर्ड से पास हो जाती हैं जिनमें पारिवारिक माहौल को तहस-नहस करने वाले दृश्य भरे पड़े हैं?
आज हालात यह हो गए हैं कि घर के ड्रॉइंग रूम में बैठकर परिवार के साथ कोई भी नई वेब सीरीज़ या फिल्म देखना मुश्किल है। बच्चा हो या बुजुर्ग, सब झेंप जाते हैं। एक तरफ संस्कृति का ढिंढोरा और दूसरी तरफ अश्लीलता का फैलता जाल—यह विरोधाभास आखिर क्यों?
अश्लीलता का बढ़ता बाज़ार
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (OTT) ने दर्शकों को नया विकल्प दिया। कोरोना काल में इन प्लेटफॉर्म्स की लोकप्रियता चरम पर पहुंची। लेकिन मनोरंजन की इस नई लहर ने अश्लीलता को भी नई हवा दी।
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फिल्मों और वेब सीरीज़ में अनावश्यक किसिंग और इंटीमेसी सीन ठूंस दिए जाते हैं।
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आइटम सॉन्ग्स और फूहड़ गीत से माहौल और गंदा किया जाता है।
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भद्दे डायलॉग सुनकर परिवार का कोई सदस्य असहज हुए बिना नहीं रह सकता।
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कपड़े उतारना ही मानो अभिनय की “पहली सीढ़ी” मान ली गई है।
निर्देशक और लेखक अक्सर यह तर्क देते हैं कि “कहानी की मांग” थी। लेकिन क्या हर कहानी का आधार अब अश्लीलता ही बचा है?
शराब और सिगरेट का महिमामंडन
बच्चे ही देश का भविष्य हैं। लेकिन वेब सीरीज़ में जिस तरह से सिगरेट और शराब का प्रचार किया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है।
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हर तीसरी फिल्म या वेब सीरीज़ में नायक या नायिका को सिगरेट पीते दिखाना “फैशन” बन चुका है।
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शराब के गिलास में टोस्ट करना और नशे में धुत्त होना “कूल” माना जा रहा है।
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युवतियों को भी जानबूझकर शराब और सिगरेट पीते दिखाया जाता है—मानो यही आधुनिकता का पैमाना हो।
परिणाम यह कि छोटी उम्र के बच्चे भी सिगरेट पकड़कर “हीरो” बनने लगे हैं। कॉलेज जाने वाले युवा शराब को “स्टेटस सिंबल” मानने लगे हैं।
समाज पर दुष्प्रभाव
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पारिवारिक माहौल टूट रहा है। माता-पिता बच्चों के साथ बैठकर मनोरंजन नहीं कर सकते।
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नशाखोरी बढ़ रही है। जो बच्चे पहले इन आदतों से दूर थे, वेब सीरीज़ देखकर उन्हें अपनाने लगे हैं।
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सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। भारतीय संस्कृति, जहां संयम और मर्यादा सर्वोपरि है, उसे खुलेआम चुनौती दी जा रही है।
सेंसर बोर्ड की चुप्पी
सवाल उठता है कि सेंसर बोर्ड ऐसी वेब सीरीज़ और फिल्मों को पास कैसे कर देता है?
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क्या सेंसर बोर्ड सिर्फ़ नाम का है?
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क्या यह बोर्ड पैसे और दबाव के आगे बेमायने हो चुका है?
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या फिर सेंसर बोर्ड की भूमिका जानबूझकर कमजोर कर दी गई है ताकि अश्लीलता का बाजार बिना रुकावट चलता रहे?
प्रधानमंत्री मोदी कटघरे में क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं।
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जापान में गायत्री मंत्र से स्वागत होता है।
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अमेरिका और यूरोप में भारतीय योग और अध्यात्म की चर्चा होती है।
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मंच से ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ की बातें होती हैं।
लेकिन अपने देश में जब वेब सीरीज़ और फिल्मों के नाम पर संस्कृति की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, तो प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। आखिर क्यों?
क्या यह मौन उनकी मूक सहमति नहीं है?
क्या सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मिलने वाले राजस्व और उद्योगपतियों के दबाव में है?
क्या संस्कृति का संरक्षण केवल विदेशों में दिखावे के लिए है?
कुछ ताज़ा उदाहरण
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मिर्ज़ापुर – गालियों, गोलीबारी और अश्लील दृश्यों का भरपूर प्रदर्शन।
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सेक्रेड गेम्स – भद्दी भाषा और बोल्डनेस की हदें लांघी गईं।
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लस्ट स्टोरीज़ – नाम ही काफी है; अश्लीलता को “कला” का जामा पहनाने की कोशिश।
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फैबुलस लाइव्स ऑफ बॉलीवुड वाइव्स – शराब, पार्टियों और फूहड़पन का प्रदर्शन।
इनके अलावा दर्जनों सीरीज़ हैं जिनमें कहानी से ज्यादा अंग प्रदर्शन और नशाखोरी को महत्व दिया गया।
दर्शकों की भूमिका
सिर्फ़ सरकार या सेंसर बोर्ड ही जिम्मेदार नहीं हैं। दर्शकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी।
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ऐसी सीरीज़ का बहिष्कार करें।
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बच्चों को सही और गलत मनोरंजन के बारे में समझाएं।
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सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज कराएं।
समाधान क्या हो?
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सख्त सेंसरशिप – वेब सीरीज़ के लिए अलग से सख्त कानून और सेंसर की व्यवस्था हो।
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सरकारी जवाबदेही – प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्रालय इस विषय पर स्पष्ट नीति बनाएं।
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निर्माताओं की जिम्मेदारी – कहानी और कला को महत्व दें, न कि अश्लीलता को।
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सकारात्मक विकल्प – ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रेरणादायक कहानियों पर आधारित सीरीज़ बनाई जाएं।
आखिर वेब सीरीज की अश्लीलता और नशे का अंधकार कब मिटेगा?
आज भारत एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ संस्कृति का गर्व और दूसरी तरफ वेब सीरीज़ की अश्लीलता का अंधकार। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सेंसर बोर्ड तक, हर संस्था पर सवाल है कि वे आखिर कब कदम उठाएँगे?
विदेश में संस्कृति का झंडा बुलंद करना आसान है, लेकिन असली परीक्षा अपने देश में संस्कृति की रक्षा करना है। यदि प्रधानमंत्री मोदी वास्तव में भारतीय संस्कृति के रक्षक हैं, तो उन्हें वेब सीरीज़ और फिल्मों की इस गंदगी के खिलाफ तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे। वरना इतिहास गवाह रहेगा कि उनके शासनकाल में संस्कृति केवल भाषणों में थी, ज़मीन पर नहीं।
हंसी के नाम पर हदें पार: स्टैंडअप कॉमेडी का बिगड़ता चेहरा
-जब चुटकुले मनोरंजन से भटककर फूहड़ता और अश्लीलता की ओर बढ़ जाते हैं, तब हंसी समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगती है।
राखी पुरोहित. जोधपुर
हंसी इंसान की सबसे खूबसूरत अभिव्यक्तियों में से एक है। कहा भी जाता है कि “हंसी सबसे अच्छी दवा है।” लेकिन क्या हो जब यही दवा ज़हर में बदलने लगे? आजकल स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर मंचों और स्क्रीन पर ऐसा कंटेंट परोसा जा रहा है, जिसमें हास्य से ज्यादा फूहड़ता और अश्लीलता पर ज़ोर दिया जा रहा है। यह स्थिति ऐसी हो चली है कि परिवार संग बैठकर देखना मुश्किल हो गया है। सवाल यह है कि क्या हंसी को परोसने के लिए अश्लीलता ही आखिरी विकल्प है?
कभी स्टैंडअप कॉमेडी का उद्देश्य था रोज़मर्रा की ज़िंदगी की छोटी-छोटी मुश्किलों और घटनाओं को मज़ाकिया अंदाज़ में पिरोकर दर्शकों को राहत और मुस्कुराहट देना। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। मंच पर खड़े कॉमेडियन का पहला शिकार बनते हैं संवेदनशील विषय – धर्म, रिश्ते, शरीर और यहां तक कि महिलाओं की गरिमा। नतीजा यह कि चुटकुला हंसी नहीं, बल्कि असहजता और असहमति का कारण बन जाता है।
लाइक और व्यूज की दौड़ में अश्लील इशारे-जुबान की धार बदली :
यूट्यूब, ओटीटी और लाइव शो ने स्टैंडअप कॉमेडी को बड़ा प्लेटफॉर्म दिया है। पर इसके साथ ही ‘लाइक और व्यूज़’ की दौड़ में कॉमेडियंस ने अपनी कलम और जुबान की धार को हास्य के बजाय अश्लील इशारों की ओर मोड़ दिया। गालियों, दोहरे अर्थ वाले चुटकुलों और संबंधों पर भद्दी टिप्पणियों से भले ही कुछ दर्शक ठहाके लगाते हों, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इसे अपमानजनक और स्तरहीन मानते हैं।
दर्शकों का भी एक वर्ग है जो इस तरह के कंटेंट को मज़ेदार समझकर तालियां बजाता है, जिससे कॉमेडियंस को लगता है कि वे सही राह पर हैं। लेकिन यह भूल जाते हैं कि हंसी का असर पलभर का होता है, जबकि फूहड़ता संस्कृति और समाज पर स्थायी दाग छोड़ देती है।
साफ-सुथरे हास्य की जरूरत, गाली देकर हंसी नहीं चाहिए…
समाज को जोड़ने और सोच को हल्का करने का जो काम कॉमेडी कर सकती है, वही काम आज फूहड़ता उसे बांटने और गिराने में कर रही है। अब वक्त है कि दर्शक भी समझदारी दिखाएं और सिर्फ “साफ-सुथरे हास्य” को ही प्रोत्साहित करें। कॉमेडियन को भी यह समझना होगा कि असली चुनौती गाली देकर हंसाने में नहीं, बल्कि बिना अश्लीलता के ठहाके बटोरने में है।
क्योंकि असली कॉमेडी वहीं है, जहां हंसी आए और सर झुकाना न पड़े।




