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दिव्यांग हुकमाराम को किराए पर कमरा नहीं मिला, श्मशान में रह शिक्षा पूरी की…उनका सत्य प्रेम करुणा सेवा संस्थान आज समाज को रोशन कर रहा

संवाद : संस्थान के फाउंडर हुकमाराम भाटी से खास बातचीत

जहां चाह वहां राह...दिव्यांगता कमजोरी नहीं संघर्षों का सहज मार्ग है…हर चुनौती आने वाले कल की भूमिका बनती है, हुकमाराम भाटी ने अपनी कहानी खुद लिखी और आज उनका संस्थान ऐसी कई कहानियां गढ़ रहा है…पढ़िए खास रिपोर्ट

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

हुकमाराम भाटी, जोधपुर जिले के भोपालगढ़ उपखंड के बागोरिया गांव से आने वाले एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने दिव्यांगता के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि “सत्य प्रेम करुणा सेवा संस्थान” की स्थापना कर सैकड़ों अनाथ और दिव्यांगजनों के लिए उम्मीद की एक किरण जलाई। आज उनका संस्थान शिक्षा, चिकित्सा और पुनर्वास के क्षेत्र में एक आदर्श बन चुका है।

यह बातचीत उनके जीवन संघर्ष, संस्थान की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को सामने लाती है।

सवाल 1: भाटी जी, आप हमें अपने शुरुआती जीवन और संघर्षों के बारे में बताइए।

हुकमाराम भाटी: मैं जब 15 साल का था तब अपने पैतृक गांव बागोरिया, भोपालगढ़ से पढ़ाई करने के लिए जोधपुर आया। मेरे मन में एक सपना था कि पढ़-लिखकर जीवन में कुछ कर दिखाऊं। लेकिन उस समय सबसे बड़ी समस्या सामने आई कि मेरी दिव्यांगता की वजह से मुझे कोई किराए पर कमरा देने को तैयार नहीं था। मकान मालिक सोचते थे कि दिव्यांग लड़का कैसे रहेगा, कैसे संभालेगा।

उस वक्त मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मजबूरी में मैंने श्मशान घाट को ही अपना आश्रय बनाया। वहां रहकर मैंने पढ़ाई जारी रखी। रात को अंधेरे में चिता की ठंडी राख और सन्नाटा मेरे साथी होते थे। लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। मेरे भीतर हमेशा यही भावना रही कि अगर मैं हार गया तो बाकी दिव्यांग भाई-बहनों के लिए प्रेरणा कौन बनेगा?

सवाल 2: यह अनुभव बहुत कठिन रहा होगा। उस दौर ने आपको क्या सिखाया?

हुकमाराम भाटी: हां, बहुत कठिन रहा। लेकिन उसी कठिनाई ने मुझे मजबूत बनाया। मैंने महसूस किया कि समाज में दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनशीलता की कमी है। हम लोग भी सपने देख सकते हैं, हमें भी अवसर चाहिए। तभी मैंने ठान लिया कि एक दिन ऐसा संस्थान बनाऊंगा जहां किसी भी दिव्यांग को वह दर्द न झेलना पड़े जो मैंने सहा।

सवाल 3: यही सोच आपके संस्थान की नींव बनी। “सत्य प्रेम करुणा सेवा संस्थान” की स्थापना कैसे हुई?

हुकमाराम भाटी: 13 मई 2011 को मैंने इस संस्थान की स्थापना की। इसका नाम मैंने “सत्य, प्रेम और करुणा” पर रखा क्योंकि यही तीन मूल्य मुझे आगे बढ़ने की ताकत देते हैं। मेरा उद्देश्य था—अनाथ और दिव्यांग बच्चों को शिक्षा, चिकित्सा, और पुनर्वास की सुविधाएं देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना।

मैंने शुरुआत छोटे स्तर पर की। कुछ बच्चों को पढ़ाई का सहारा दिया, खाने-पीने का इंतज़ाम किया। धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए, दानदाता आए, और आज यह संस्थान एक बड़े परिवार में बदल चुका है।

सवाल 4: आपके संस्थान में बच्चों के लिए क्या-क्या सुविधाएं उपलब्ध हैं?

हुकमाराम भाटी: हमारे यहां शिक्षा, चिकित्सा और पुनर्वास तीनों पर बराबर ध्यान दिया जाता है।

  • शिक्षा: बच्चों को विशेष शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और कोचिंग जैसी सुविधाएं मिल रही हैं।

  • चिकित्सा: दिव्यांग बच्चों के लिए फिजियोथेरेपी, डॉक्टरों की सलाह और नियमित जांच करवाई जाती है।

  • मनोरंजन और खेलकूद: बच्चों के लिए मैदान, संगीत और कला की गतिविधियां रखी गई हैं ताकि वे मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहें।

इसके अलावा, हमने हाल ही में नया भवन बनाया है जिसमें लाइब्रेरी, भोजनशाला और खेल सुविधाएं भी हैं। यहां हर कमरे में चार से छह बच्चों के रहने की व्यवस्था है। खाना, कपड़े, पढ़ाई सामग्री, सबकुछ निशुल्क दिया जाता है।

सवाल 5: नए भवन के निर्माण में दानदाताओं की भूमिका कैसी रही?

हुकमाराम भाटी: बहुत महत्वपूर्ण। यह भवन पूरी तरह जन सहयोग से बना है। किसी ने अपने माता-पिता की याद में कमरा बनवाया, किसी ने हॉल बनवाया। कोई एक ईंट लेकर आया, तो कोई सीमेंट का बैग। किसी ने गाड़ी भरकर रेत दी, तो किसी ने पत्थर का ट्रक भेज दिया।

यानी भवन एक-एक योगदान से खड़ा हुआ है। यह सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि हजारों लोगों के सहयोग और आशीर्वाद से बनी एक भावनात्मक धरोहर है।

सवाल 6: वर्तमान में संस्थान की सबसे बड़ी आवश्यकता क्या है?

हुकमाराम भाटी: हमारा भवन चार मंजिला है। दिव्यांग बच्चे अलग-अलग मंजिल पर रहते हैं और उन्हें ऊपर-नीचे जाने में बहुत दिक्कत होती है। इसलिए हमने लिफ्ट लगाने की योजना बनाई है। इस पर लगभग 8 लाख रुपये की लागत आएगी।

हमें ऐसे दानदाताओं की तलाश है जो इस नेक काम में सहयोग करें। अगर कोई परिवार, संगठन, या ग्रुप मदद करता है तो बच्चों के जीवन में बड़ी राहत मिलेगी।

सवाल 7: आपने बताया कि संस्थान 15 वर्षों से जन सहयोग से चल रहा है। क्या सरकार से कोई मदद मिलती है?

हुकमाराम भाटी: नहीं, हमें सरकार से कोई अनुदान या आर्थिक मदद नहीं मिलती। सबकुछ जनता और भामाशाहों के सहयोग से चलता है। हां, सरकार से हमारी उम्मीद जरूर है कि दिव्यांगों के लिए चलाई जा रही योजनाओं को और पारदर्शी बनाए ताकि हर जरूरतमंद तक सुविधाएं पहुंच सकें।

सवाल 8: आपके संस्थान से अब तक कितने बच्चों ने सफलता हासिल की है?

हुकमाराम भाटी: हमारे लिए यह गर्व की बात है कि पिछले 15 वर्षों में हमारे यहां से पढ़-लिखकर लगभग 60 विद्यार्थियों ने सरकारी नौकरी हासिल की है। यह सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि हमारे संस्थान के लिए भी बड़ी उपलब्धि है।

इसके अलावा, खेलकूद और सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भी बच्चों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार जीते हैं।

सवाल 9: दिव्यांग बच्चों के लिए आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी है?

हुकमाराम भाटी: क्योंकि समाज में आज भी दिव्यांगों को रोजगार आसानी से नहीं मिलता। लोग उन्हें बोझ समझते हैं। इसलिए हमने अपने संस्थान में लगभग दिव्यांग स्टाफ ही रखा है ताकि बच्चों को रोल मॉडल मिल सके।

हम व्यावसायिक प्रशिक्षण, कंप्यूटर शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रम शुरू करना चाहते हैं ताकि बच्चे आत्मनिर्भर बन सकें। हमारा लक्ष्य है कि यहां से पढ़े-लिखे बच्चे भविष्य में खुद संस्थान को संभालें।

सवाल 10: सोशल मीडिया पर दिव्यांगजनों का मजाक उड़ाया जाता है। आप इस पर क्या कहना चाहेंगे?

हुकमाराम भाटी: यह बहुत दुखद है। लोग फॉलोवर और व्यूज बढ़ाने के लिए दिव्यांगों पर कॉमेडी बनाते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि इससे दिव्यांगों का आत्मसम्मान आहत होता है।

हम समाज से अपील करते हैं कि कृपया हमें कमजोर मत समझें। हमें अवसर दीजिए, सम्मान दीजिए। हम भी आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बन सकते हैं।

सवाल 11: आने वाले पांच वर्षों में आपका संस्थान किन लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है?

हुकमाराम भाटी: हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य है कि राजस्थान के हर जिले और भारत के हर राज्य की राजधानी में संस्थान की शाखा खोली जाए। ताकि कोई भी दिव्यांग बच्चा वंचित न रहे।

हम अपने संस्थान को आदर्श केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जहां शिक्षा, चिकित्सा और पुनर्वास की सभी सुविधाएं एक ही जगह उपलब्ध हों।

सवाल 12: समाज और आम लोगों से आपकी क्या अपील है?

हुकमाराम भाटी: मैं कहना चाहूंगा कि आप छोटी-छोटी मदद करके भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

  • दान दें,

  • बच्चों के साथ जन्मदिन या सालगिरह मनाएं,

  • पूर्वजों की पुण्यतिथि पर भोजन प्रसादी रखें,

  • स्वयंसेवा करें,

  • या घर में पड़ी कोई अतिरिक्त वस्तु संस्थान को भेंट करें।

हमारे बच्चे जब आपके हाथों से बना भोजन खाते हैं तो उनके चेहरे पर जो खुशी आती है, वह अनमोल होती है।

सवाल 13: अंत में, आपकी व्यक्तिगत इच्छा या सपना क्या है?

हुकमाराम भाटी: मेरा सपना है कि एक दिन हमारे संस्थान से पढ़े-लिखे बच्चे ही इसे आगे चलाएं। हमें भामाशाहों पर हमेशा निर्भर नहीं रहना चाहिए। अगर बच्चे आत्मनिर्भर बनेंगे तो वे समाज में भी आदर्श स्थापित करेंगे और दूसरों को प्रेरित करेंगे। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा संकल्प है।

निष्कर्ष : संवेदनशील बनिए, दिव्यांगों को अवसर दीजिए, ताकि वे सम्मानित जीवन जी सकें

हुकमाराम भाटी की कहानी हमें यह सिखाती है कि कठिनाइयों से लड़ते हुए भी इंसान समाज में बदलाव ला सकता है। उन्होंने श्मशान में रहकर पढ़ाई की, संघर्ष किया और आज सैकड़ों दिव्यांग बच्चों के जीवन को दिशा दे रहे हैं।

उनका संदेश साफ है—“संवेदनशील बनिए, दिव्यांगों को अवसर दीजिए और समाज को मिलकर ऐसा बनाइए जहां हर कोई आत्मनिर्भर और सम्मानित जीवन जी सके।”

सत्य-प्रेम करुणा संस्थान को आप यहां मदद कर सकते हैं-

खाता धारक का नाम:-
सत्य प्रेम करुणा सेवा संस्थान, जोधपुर

बैंक का नाम:- ICICI BANK

खाता नंबर:- 682501701246

IFS CODE:- ICIC0006825

PAN NO:- AAMAS7088M

पता-
सत्य प्रेम करुणा सेवा संस्थान, जोधपुर
वसंत विहार, बनाड़ रोड़, खोखरिया, जोधपुर
Call:- 8769522367

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor