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चलो जीते हैं….पीएम नरेंद्र मोदी के बचपन पर बनी फिल्म स्कूलों में 2 अक्टूबर तक दिखाई जाएगी

छात्रों को यह फिल्म दिखाना जरूरी है, ताकि उनमें चरित्र, सेवा और जिम्मेदारी जैसी भावनाओं को बढ़ावा दिया जा सके।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

चलो जीते हैं…पीएम नरेंद्र मोदी के बचपन पर बनी फिल्म स्कूलों में बच्चों को दिखाई जा रही है। यह फिल्म 2 अक्टूबर तक बच्चों को दिखाई जाएगी। जानें क्या है खास इस फिल्म में। कभी-कभी एक छोटी सी कहानी भी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख दे जाती है. यही वजह है कि शिक्षा मंत्रालय की ओर से स्कूलों में फिल्म ‘चलो जीते हैं’ दिखाने का आदेश दिया गया है। फिल्म पीएम मोदी के बचपन पर आधारित है।

यह फिल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन की एक घटना से प्रेरित है। मंत्रालय के मुताबिक 16 सितंबर से 2 अक्टूबर तक छात्रों को यह फिल्म दिखाना जरूरी है, ताकि उनमें चरित्र, सेवा और जिम्मेदारी जैसी भावनाओं को बढ़ावा दिया जा सके।

शिक्षा मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा कि यह फिल्म बच्चों को नैतिक मूल्यों पर सोचने का मौका देगी। इससे उनमें आत्मचिंतन, करुणा, सहानुभूति और आलोचनात्मक सोच जैसे गुण विकसित होंगे. फिल्म को एक तरह से केस स्टडी की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि छात्र जीवन के असली मायनों और मानवीय मूल्यों को बेहतर ढंग से समझ सकें।

प्रेरणा कार्यक्रम से जुड़ी है पहल

यह कदम मंत्रालय के प्रेरणा नामक अनुभवात्मक लर्निंग प्रोग्राम का हिस्सा है। यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी के गृहनगर गुजरात के वडनगर की ऐतिहासिक वर्नाक्युलर स्कूल से चलाया जा रहा है। यही वह जगह है, जहां से प्रधानमंत्री की शिक्षा की शुरुआत हुई थी। प्रेरणा कार्यक्रम 9 मुख्य मानवीय मूल्यों स्वाभिमान और विनय, शौर्य और साहस, परिश्रम और समर्पण, सत्यनिष्ठा और शुचिता, करुणा और सेवा, नवाचार और जिज्ञासा, विविधता और एकता, श्रद्धा और विश्वास, स्वतंत्रता और कर्तव्य पर आधारित है। इस कार्यक्रम में कहानी सुनाना, वैल्यू-बेस्ड सेशंस, पारंपरिक खेल, ऑडियो-वीडियो लर्निंग जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

फिल्म की कहानी और संदेश

‘चलो जीते हैं’ फिल्म 2018 में रिलीज हुई थी और अब फिर से 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक देशभर के सिनेमाघरों में दिखाई जा रही है। इसमें नारु नाम का एक बच्चा मुख्य किरदार में है, जो स्वामी विवेकानंद के विचारों से गहराई से प्रभावित होता है। वह समझना चाहता है कि दूसरों के लिए जीने का असली मतलब क्या है और अपने छोटे से संसार में बदलाव लाने की कोशिश करता है। इस फिल्म को 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फैमिली वैल्यूज पर बेस्ट नॉन-फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिल चुका है। इसे खास तौर पर युवा पीढ़ी को प्रेरित करने वाली फिल्म माना जाता है।

बच्चों पर असर

शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, प्रेरणा कार्यक्रम में जब भी यह फिल्म दिखाई गई, बच्चों पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने इसके संदेश को अपने व्यवहार और सोच में अपनाना शुरू किया। मंत्रालय का मानना है कि इस बार भी जब इसे बड़े पैमाने पर स्कूलों में दिखाया जाएगा, तो बच्चे न सिर्फ मनोरंजन लेंगे बल्कि जीवन की गहरी सीख भी पाएंगे।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor