प्रो. मीना बरड़िया का जीवन इस बात की मिसाल है कि यदि सोच सकारात्मक हो और कार्य ईमानदारी से किया जाए तो समाज में कोई व्यक्ति कमजोर नहीं रह सकता। वे वर्तमान में विकलांग पुनर्वास एवं प्रशिक्षण संस्थान की अध्यक्ष है। अपनी बहन तथा अपनी प्रेरणास्रोत डॉ. कुसुमलता भंडारी को याद करते हुए बताती हैं कि हम दोनों ने साथ में जो सपना देखा उसे अब भी वह कुसुम दीदी की याद करते हुए पूरा करेंगी।
प्रो. मीना बरड़िया का मानना है कि अगर लोग आईक्यू के साथ ईक्यू पर जोर दें तो समाज और देश की दशा और दिशा बदल सकती है
दिलीप कुमार पुरोहित. पंकज जांगिड़. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
1999 में मख्तूरमल सिंघवी दशरथमल सिंघवी की हवेली में 5 दिव्यांग बच्चों से एक हॉस्टल शुरू हुआ- प्रज्ञा निकेतन छात्रावास। आज यह हॉस्टल पब्लिक पार्क के पास स्थित हैं और इस हॉस्टल में 60 बच्चे हैं जो अपना भविष्य गढ़ रहे हैं। उनके भविष्य की राह को प्रशस्त कर रहा है विकलांग पुनर्वास एवं प्रशिक्षण संस्थान।
यह छात्रावास जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए संचालित किया जा रहा है। यहां रहने वाले बच्चों को न केवल मुफ्त आवास और भोजन की सुविधा मिलती है, बल्कि जीवन जीने का हौसला और समाज से जुड़ने का आत्मविश्वास भी मिलता है। सामान्यतया इस हॉस्टल में 80-90 बच्चे रहते हैं, लेकिन इस वर्ष 60 बच्चे यहां रह रहे हैं।
और सबसे बड़ी बात – यह देश का पहला ऐसा हॉस्टल है, जो यूनिवर्सिटी से जुड़ा होने के बावजूद दानदाताओं के सहयोग से चलता है।
प्रो. मीना बरड़िया: संघर्ष से सेवा तक का सफर
इस छात्रावास और संस्थान के पीछे खड़ी हैं मीना बरड़िया…वे विकलांग पुनर्वास एवं प्रशिक्षण संस्थान की अध्यक्ष हैं। उनका मानना है –
“भगवान जब किसी से कुछ छीन लेता है, तो उसे अतिरिक्त योग्यता भी दे देता है, जो उसके जीवन की दिशा बदल देती है।”
प्रो. मीना कहती हैं कि दृष्टिहीन और दिव्यांग बच्चों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। उनके भीतर विशेष प्रतिभा होती है, बस जरूरत है उसे पहचानने और सही दिशा देने की। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने जीवन को दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास और समाज में समावेशी विकास के लिए समर्पित कर दिया।
उनके जीवन में यह प्रेरणा उनकी बड़ी बहन डॉ. कुसुमलता भंडारी से आई। प्रो. मीना बरड़िया का जीवन इस बात की मिसाल है कि यदि सोच सकारात्मक हो और कार्य ईमानदारी से किया जाए तो समाज में कोई व्यक्ति कमजोर नहीं रह सकता। वे वर्तमान में विकलांग पुनर्वास एवं प्रशिक्षण संस्थान की अध्यक्ष हैं। अपनी बहन तथा अपनी प्रेरणास्रोत डॉ. कुसुमलता भंडारी को याद करते हुए बतातीं हैं कि हम दोनों ने साथ में जो सपना देखा उसे अब भी वह कुसुम दीदी को याद करते हुए पूरा करेंगी।
प्रज्ञा निकेतन की शुरुआत: पांच बच्चों से नई रोशनी
संस्थान की शुरुआत छोटे पैमाने पर हुई थी। हवेली में केवल पांच बच्चे रहते थे। लेकिन जैसे-जैसे समाजसेवी और दानदाता जुड़ते गए, छात्रावास का दायरा बढ़ता गया। आज यह 60 से अधिक बच्चों का घर है।
पूर्व नरेश गजसिंह इस संस्था के संरक्षक हैं। वहीं, संस्था का संचालन टीम भावना से होता है – प्रो. मीना बरड़िया अध्यक्ष हैं, ईरा सिसोदिया सचिव और प्रमोद प्रकाश सैन कोषाध्यक्ष। इनके साथ 15 कार्यकारिणी सदस्य जुड़े हैं, जो निरंतर बच्चों के लिए नए-नए कार्यक्रम और योजनाएं तैयार करते रहते हैं।
बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास
संस्थान का उद्देश्य केवल बच्चों को छत और खाना देना भर नहीं है। यहां बच्चों को पढ़ाई में मदद की जाती है, कॅरिअर के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है, संस्कारों और मूल्यों का निर्माण करवाया जाता है।
बच्चों को प्रेरित करने के लिए यहां लेक्चर, वर्कशॉप, सेमिनार और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साथ ही, खेल और अन्य गतिविधियों पर भी बराबर ध्यान दिया जाता है।
परिणाम सामने हैं – यहां से निकले कई बच्चों ने खेलों में मेडल जीतकर साबित किया है कि दिव्यांग होना कमजोरी नहीं है। हाल ही में एक छात्र ने एसएससी एमटीएस की नौकरी हासिल की है। जब यह खबर छात्रावास में पहुंची तो हर बच्चे की आंखों में चमक और आत्मविश्वास की नई लहर दौड़ गई।
जहां चाह, वहां राह
प्रो. मीना बरड़िया कहती हैं कि बच्चों को मोटिवेट करने के लिए उन्होंने सोचा कि “श्रीकांत” मूवी दिखाई जाए। लेकिन बजट की समस्या थी। तभी उन्होंने पिक्चर हॉल के मैनेजर से बात की। मैनेजर ने पूरी कहानी सुनने के बाद टिकट का दाम घटाकर चौथाई कर दिया। साथ ही मिनरल वॉटर और पॉपकॉर्न में भी छूट दी।
बच्चे फिल्म देखकर लौटे तो उनके चेहरों की मुस्कान बताती थी कि सपनों को जीने की प्रेरणा मिल चुकी है।
संघर्षों के बीच शिक्षा और समाजसेवा
प्रो. मीना बरड़िया का अपना जीवन भी संघर्ष से भरा रहा।
1984 में उनकी शादी हो गई। शादी के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और डबल एमए, एलएलबी, पीएचडी और शास्त्रीय संगीत में संगीत विसारद की डिग्रियां हासिल कीं। उनके पति शैलेंद्र बरड़िया, जो एक इंटरनेशनल आर्बिट्रेटर हैं, हमेशा उनका साथ देते रहे।
सास विमला बरड़िया और ससुर संपतराज बरड़िया ने भी उन्हें पढ़ाई और समाजसेवा के लिए प्रोत्साहित किया। सुबह चार बजे उठकर वे पढ़ाई करतीं, बेटियों को तैयार करतीं, घर का काम संभालतीं और फिर अपने सपनों की ओर बढ़तीं।
आज उनकी बड़ी बेटी चारू भूरट मुंबई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और छोटी बेटी छवि बरड़िया जयपुर में फैशन डिजाइनर।
मीना का मानना है –
“आईक्यू से ज्यादा जरूरी है ईक्यू। अगर समाज और देश ईक्यू को महत्व दे तो आधी समस्याएं खुद-ब-खुद सुलझ जाएंगी।”
गांवों में समावेशी विकास की ओर
संस्थान अब केवल हॉस्टल तक सीमित नहीं है। प्रो. मीना बरड़िया ने तय किया है कि वे गांवों में भी समावेशी विकास के लिए कार्य करेंगी।
उनका पहला कदम बड़ली गांव से शुरू हुआ। वहां सरकारी स्कूल में सरपंच, ग्रामीणों, शिक्षकों और बच्चों के साथ कार्यक्रम आयोजित किया गया। अगला पड़ाव है भांडू चारणा गांव (बालेसर के पास)।
प्रो. मीना कहती हैं कि यूएनए के 17 गोल्स में से एक प्रमुख लक्ष्य समावेशी विकास है। “हमारा भी मकसद यही है – दिव्यांग बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना।”
संवेदनाओं से भरा हर कदम
जब आप प्रज्ञा निकेतन छात्रावास के गलियारों से गुजरते हैं, तो बच्चों की हंसी-ठिठोली सुनाई देती है। कोई अपनी पढ़ाई में व्यस्त है, कोई मोबाइल पर गूगल वॉइस असिस्टेंट से जानकारी ले रहा है, तो कोई गिटार की धुन छेड़ रहा है।
इन बच्चों के लिए यह छात्रावास महज रहने की जगह नहीं, बल्कि एक परिवार है – जहां हर दिन उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि वे बोझ नहीं, बल्कि समाज की ताकत हैं।
प्रो. मीना बरड़िया का संकल्प है कि हर बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो और समाज को कुछ लौटाएं।
दिव्यांगों को दया नहीं उनके प्रति दृष्टिकोण बदलिए…
आज जब समाज का एक बड़ा वर्ग दिव्यांग बच्चों को दया की नजर से देखता है, वहीं मीना बरड़िया जैसे लोग उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें मंच दे रहे हैं।
उनका नारा –
“दिव्यांग समर्थ है, व्यर्थ नहीं”
केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि बदलती सोच की आवाज है।
प्रज्ञा निकेतन छात्रावास से निकलने वाले हर बच्चे की सफलता यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, हौसले बुलंद हों तो मंज़िल जरूर मिलती है।
और जब भी कोई बच्चा इस छात्रावास से निकलकर अपने सपनों को पंख देता है, तो मीना बरड़िया की आंखों में वही चमक दिखाई देती है – जो उनकी बहन कुसुमलता भंडारी के सपनों को आगे बढ़ाने का प्रमाण है।
आप संस्था की मदद यहां कर सकते हैं-
A Short Bio-note of Prof. Meena Bardia
| Name | : | PROF. (DR.) MEENA BARDIA |
| Date of Birth | : | 1st FEBRUARY, 1964 |
| Address for correspondence
|
: | 53, ABHISHEK, NEHRU PARK,
JODHPUR – 342003 |
| Mobile No. | : | 9414195643 |
| : | drmeenabardia@gmail.com |
Educational Qualification –
M.A. (Political Science and Public Administration) LLB., Ph.D.,
Sangeet Visharad (Indian Vocal Classical)
Positions Held Before Superannuation on 31 January 2024 –
- Professor of Political Science and Public Administration.
- Head, Department of Public Administration, Jai Narain Vyas University, Jodhpur.
- Chairman – Student Service Board, Jai Narain Vyas University, Jodhpur.
- Warden of Pragya Niketan Hostel for Disabled and Blind Students of Jai Narain Vyas University, Jodhpur.
- Director- Gandhi Studies Centre, Sponsored by UGC, Jai Narain Vyas University, Jodhpur.
- Member Vishakha Committee of Jai Narain Vyas University, Jodhpur.
- Secretary- Viklang Punarvas Prashikshan Sansthan, Jodhpur.
- Member- International Inner Wheel club district-305.
- Former Member, Editorial Boards of – Indian Journal of Political Studies, Jodhpur
- BT’s International Journal of Humanities and Social Sciences, Ahmadabad and Jodhpur
Present Status
- Vice Chair Person – Research Committee 18 on Asian and Pacific Studies of International Political Science, Association, Montreal.
- President, Viklang Punarvas Prashikshan Sansthan, Jodhpur
- Member, Vishakha Committee – North Western Railway Jodhpur to prevent and deal with sexual harassment of women at work
- Member of ICC (Internal Complaint Committee) of AIIMS, Jodhpur.
Academic Achievements –
- Teaching Experience – 30 years
- Books Authored – 5
- World Politics and WTO, Published by Books Treasure, Ahmedabad, 2012, ISBN : 978-81-900422-9-8
- Origin and Development of SAARC, Published by Books Treasure, Ahmedabad, 2012, ISBN : 978-81-900422-08-1
- Dakshin Asia : Manavadhikar va anya mudde, Edited Book, Published by Rajasthani Grandhagar, Jodhpur, 2016, ISBN : 978-93-85593-82-6
- South Asia in 21st Century : Issues & Challenges, Edited Book, Published by Book Treasure, Ahmedabad, 2016 ISBN : 978-93-84385-21-7
- Sustainable Development : Issues and Challenges, edited Book, Published by Bharti Publication’s, New Delhi, July 2022, ISBN : 978-93-94779-76-1
- Articles Published – approx 40
- Presented Papers in Seminar –approximately -55
- International Experience – Presented Papers in International Conferences -15.
- D Guided and Awarded – 16 students
- D in Process – 06 students
- Keynote Lectures – more than -40
- Presented Research Papers and Session Chaired in IPSA World Congress of Political Science
- Madrid (Spain) -2012
- Poznan (Poland)-2016
- Lisbon (Portugal)-2021
- Buenos Aires (Argentina)-2023










