पुलिस कमिश्नर को डाक से भेजी शिकायत की प्रति राइजिंग भास्कर को उपलब्ध करवाते हुए सज्जन सिंह ने बताया कि भगत की कोठी न्यू पाली रोड पर स्व. प्रताप सिंह पुत्र स्व. रामचंद्र गौड़ के मकान में स्थित दुकान 26 साल पूर्व किराए पर ली थी। वहां सज्जनसिंह धनलक्ष्मी फैंसी स्टोर के नाम से व्यापार करता है और आउटडोर फोटो वीडियोग्राफी का कार्य करता है।
राइजिंग भास्कर. जोधपुर
458 सुभाष नगर सैकंड पाल रोड जोधपुर निवासी सज्जन सिंह पुत्र स्व. अर्जुन सिंह उम्र 46 वर्ष रावणा राजपूत ने पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर शिकायत की कि उनकी 26 साल पुरानी किराए की दुकान जबरन खाली करवाने की धमकियां दी जा रही है और उसमें तोड़-फोड़ की जा रही है। पुलिस कमिश्नर को डाक से भेजी शिकायत की प्रति राइजिंग भास्कर को उपलब्ध करवाते हुए सज्जन सिंह ने बताया कि भगत की कोठी न्यू पाली रोड पर स्व. प्रताप सिंह पुत्र स्व. रामचंद्र गौड़ के मकान में स्थित दुकान 26 साल पूर्व किराए पर ली थी। वहां सज्जनसिंह धनलक्ष्मी फैंसी स्टोर के नाम से व्यापार करता है और आउटडोर फोटो वीडियोग्राफी का कार्य करता है।
सज्जनसिंह ने पुलिस कमिश्नर को डाक से भेजी शिकायत में कहा कि पूर्व में जबरदस्ती डरा-धमका कर मकान मालिक द्वारा दुकान खाली करवाने के प्रयास किए गए। तब मैंने पुलिस व न्यायालय की शरण ली जहां पर मकान मालिक ने दुकान खाली करवाने से मना कर दिया। इस संबंध में कोर्ट में राजीनामा भी हुआ। लेकिन प्रताप सिंह की मौत के बाद उसकी पत्नी और पुत्रियों द्वारा झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकियां देकर डराया जा रहा है। साथ ही दुकान के ऊपरी हिस्से को क्षतिग्रस्त किया जा रहा है।
मामले के तथ्य :
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26 वर्ष पहले दुकान किराये पर ली गई थी।
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मालिक रामचंद्र ने दुकान खाली करवाने के लिए मुकदमा किया था।
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मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों में राजीनामा/समझौता हुआ — कि किरायेदार दुकान खाली नहीं करेगा और किराया नियमित देगा।
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इसके बाद रामचंद्र और किरायेदार के बीच किरायेदारी कायम रही।
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बाद में रामचंद्र और उसका बेटा दोनों की मृत्यु हो गई।
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अब बेटे की पत्नी और तीन बेटियां किरायेदार को परेशान कर रही हैं, तोड़फोड़ कर रही हैं और दुकान खाली करवाने का दबाव बना रही हैं — जबकि किरायेदार किराया नियमित और अग्रिम देता है।
कानूनी स्थिति (भारत के किरायेदारी कानून के अनुसार):
1. राजीनामा (Court Settlement / Compromise Decree) की वैधता:
अगर अदालत में या लिखित रूप से दोनों पक्षों के बीच राजीनामा हुआ था, और उसे अदालत ने स्वीकार किया था, तो:
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वह कानूनी रूप से बाध्यकारी (binding) है।
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उसका प्रभाव उत्तराधिकारियों पर भी लागू होता है।
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इसका मतलब यह हुआ कि रामचंद्र के मरने के बाद उसके वारिस (पत्नी, बेटे, बेटियाँ) उसी समझौते के कानूनी उत्तराधिकारी हैं, यानी उन्हें उसी शर्तों पर किरायेदार को स्वीकार करना होगा।
कानूनी संदर्भ:
“A valid tenancy or compromise binding on the landlord is equally binding on his heirs and legal representatives.”
— Supreme Court: Shyam Lal vs. Deepa, (AIR 2011 SC 447)
2. उत्तराधिकारियों द्वारा परेशान करना या जबरन खाली करवाना:
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किसी भी स्थिति में स्वयं कब्जा करने, तोड़फोड़ करने, बिजली-पानी काटने या धमकाने का अधिकार मालिक के वारिसों को नहीं होता।
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यह कृत्य “अनधिकृत हस्तक्षेप” (illegal interference) और “आपराधिक उत्पीड़न” (criminal intimidation) की श्रेणी में आता है।
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वे यदि दुकान में तोड़फोड़ या धमकी दे रहे हैं, तो यह दंडनीय अपराध के अंतर्गत आता है।
3. किरायेदार के अधिकार:
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आप एक वैध किरायेदार हैं, क्योंकि:
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आपके पास राजीनामा है,
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किराया नियमित दे रहे हैं,
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और मकान मालिक (रामचंद्र) ने आपको किरायेदारी स्वीकार की थी।
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इस स्थिति में —
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कोई भी उत्तराधिकारी आपको बिना कानूनी प्रक्रिया (court eviction order) के दुकान से बेदखल नहीं कर सकता।




