Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 6:41 am

Thursday, July 9, 2026, 6:41 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

”भारत विकास की चुनौतियों” के बीच ”जल प्रबंधन” और ”काले धन” पर सीए अनिल के. जैन के क्रांतिकारी सुझाव

आर्थिक विशेषज्ञ, विचारक और 40 साल से प्रैक्टिस कर रहे सीए अनिल के. जैन से उनकी पुस्तक भारत विकास की चुनौतियां को लेकर राइजिंग भास्कर का विशेष इंटरव्यू
भारत में इच्छाशक्ति की कमी नहीं है, लेकिन नीतियों के सही क्रियान्वयन और दृष्टिकोण की कमी है। यदि हमने अपनी रफ्तार नहीं बढ़ाई, तो दुनिया मंगल ग्रह पर जाएगी और हम अभी भी बुलेट ट्रेन की योजना बनाते रह जाएंगे : अनिल के. जैन

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

चार दशकों से चार्टर्ड अकाउंटेंसी के क्षेत्र में सक्रिय, अनुभवी और दूरदर्शी विचारक सीए अनिल के. जैन ने अपने जीवन के अनुभवों, देश-विदेश की यात्राओं और भारतीय व्यवस्था के गहन अध्ययन के आधार पर एक पुस्तक लिखी है — “भारत विकास की चुनौतियां”। इस पुस्तक में उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि, तकनीक, जनसंख्या संतुलन, रोजगार, और शासन व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की है।
मगर उनकी पुस्तक की असली ताकत उन दो क्रांतिकारी सुझावों में निहित है, जो अगर लागू कर दिए जाएं, तो भारत की दो बड़ी समस्याओं — जल संकट और काले धन — का स्थायी समाधान संभव है।

रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से डिस्टिंक्शन के साथ स्नातक कर चार्टर्ड अकाउंटेंट बने अनिल के. जैन ने अपने 40 वर्षों के व्यावसायिक अनुभव और 60 देशों की यात्राओं से जो सीखा, वही उन्होंने इस पुस्तक में समाज के सामने रखा है। उनसे हुई यह बातचीत इन्हीं दो मुद्दों — नदियों के जल संचयन और काले धन के समाधान — पर केंद्रित है।

राइजिंग भास्कर : जैन साहब, आपने अपनी पुस्तक में भारत के विकास की गति को धीमी बताया है। इस निष्कर्ष तक कैसे पहुंचे?

सीए अनिल के. जैन : देखिए, मैंने 60 से अधिक देशों की यात्रा की है — अमेरिका, थाइलैंड, वियतनाम, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, चीन, इजराइल जैसे देशों में गया। जब हम इन देशों की व्यवस्था, अनुशासन और कामकाज देखते हैं, तो यह स्पष्ट समझ आता है कि भारत की गति अपेक्षाकृत बहुत धीमी है। उदाहरण के लिए, मैं 1984 में चीन गया था। तब चीन विकास के शुरुआती दौर में था। आज, सिर्फ 40 साल में चीन ने जिस स्तर की इंफ्रास्ट्रक्चर, औद्योगिक और आर्थिक प्रगति हासिल की है, वह विश्व के लिए उदाहरण बन गई है। जबकि भारत में अभी भी हम ट्रेनों की गति और सड़कों की चौड़ाई पर बहस कर रहे हैं।

मेरा मानना है कि भारत में इच्छाशक्ति की कमी नहीं है, लेकिन नीतियों के सही क्रियान्वयन और दृष्टिकोण की कमी है। यदि हमने अपनी रफ्तार नहीं बढ़ाई, तो दुनिया मंगल ग्रह पर जाएगी और हम अभी भी बुलेट ट्रेन की योजना बनाते रह जाएंगे।

राइजिंग भास्कर : आपने जल प्रबंधन पर जो सुझाव दिए हैं, उन्हें आप ‘क्रांतिकारी’ क्यों मानते हैं?

सीए अनिल के. जैन : इसका कारण सरल है — हमारे देश का 45 प्रतिशत नदीजल हर साल समुद्र में जाकर व्यर्थ बह जाता है। यह वही पानी है जो हमारे किसानों की सिंचाई, पीने के पानी और उद्योगों की जरूरतों को पूरा कर सकता है। हमारे पास देशभर में लगभग 170 प्रमुख और उप-नदियां हैं। लेकिन उनमें से अधिकांश का पानी बिना उपयोग के समुद्र में मिल जाता है।

आज हम वाटर हार्वेस्टिंग की बात करते हैं, लेकिन वह केवल वर्षा जल तक सीमित है।
मेरा सुझाव उससे आगे का है — नदियों के दोनों किनारों पर कुएं खोदे जाएं और उन कुओं को पाइपों के माध्यम से नदी के जल से भरा जाए।
इससे दो फायदे होंगे —

  1. भूमिगत जल स्वतः रिचार्ज होगा।

  2. नदियों के आसपास की जमीन में जल स्तर ऊंचा रहेगा, जिससे किसानों को हर मौसम में पानी उपलब्ध रहेगा।

इस तकनीक का खर्च बहुत कम है। बस कुछ किलोमीटर के अंतराल पर कुएं खोदने और पाइपलाइन से जोड़ने का सिस्टम तैयार करना है। एक बार यह व्यवस्था बन गई, तो हर साल बारिश और नदी के प्रवाह से यह कुएं अपने-आप भरते रहेंगे।

राइजिंग भास्कर : क्या यह योजना तकनीकी रूप से भारत में संभव है?

सीए अनिल के. जैन : बिलकुल संभव है — और यही इसकी खूबसूरती है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि व्यावहारिक समाधान है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल जैसे विकसित देश पहले से इसी दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने जल स्रोतों के आसपास “रीचार्ज ज़ोन” बना रखे हैं, जिससे हर साल भूमिगत जल अपने आप रिचार्ज हो जाता है। भारत में तो स्थिति और भी अनुकूल है — हमारे पास नदियों का विशाल नेटवर्क, मानसून आधारित वर्षा, और भूमिगत जलधाराएं हैं। सिर्फ जरूरत है, नीति और इच्छा शक्ति की।अगर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर यह योजना लागू करें, तो हर नागरिक को मीठा पानी मुफ्त में उपलब्ध हो सकता है। न किसान को टैंकरों पर निर्भर रहना होगा, न शहरों में जल संकट रहेगा।

राइजिंग भास्कर : क्या यह उपाय लागत के लिहाज से भी व्यवहारिक है?

सीए अनिल के. जैन : बिलकुल। यह योजना कम लागत और दीर्घकालिक लाभ का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यदि आप देखें तो किसी एक नदी के किनारे कुएं खोदने और पाइपलाइन डालने की लागत, किसी बड़ी नहर या डैम बनाने की लागत की तुलना में नगण्य होगी। इसके बदले में पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर ऊपर आ जाएगा, किसानों की फसल उत्पादन बढ़ेगा, और उद्योगों को स्थायी जल स्रोत मिलेगा। सरल शब्दों में कहूं तो — यह योजना भारत को “जल आत्मनिर्भर” बना सकती है।

राइजिंग भास्कर : आपकी पुस्तक का दूसरा प्रमुख बिंदु काले धन का समाधान है। आपने आयकर अधिनियम की धारा 68 को हटाने का सुझाव दिया है। ऐसा क्यों?

सीए अनिल के. जैन : काले धन की समस्या भारत की सबसे पुरानी और गहरी जड़ है। मेरे अनुभव में — इस समस्या का एक बड़ा कारण है आयकर अधिनियम की धारा 68। यह धारा आयकर अधिकारियों को असीमित अधिकार देती है। अगर किसी ट्रांजेक्शन में उन्हें “संदेह” होता है, तो वे उसे अघोषित आय मान लेते हैं। समस्या यह है कि यह अधिकार पुलिस या जांच एजेंसी के समान हो गया है, जबकि आयकर विभाग का मूल काम राजस्व एकत्र करना है, न कि जांच या दंड देना।

इससे ईमानदार कारोबारी, व्यापारी, और टैक्स देने वाले नागरिक अनावश्यक परेशानियों में फंस जाते हैं।
कई बार छोटी तकनीकी गलती या दस्तावेजी कमी के कारण भी लोगों को गलत तरीके से दोषी ठहरा दिया जाता है। यदि यह धारा हटाई जाए, तो टैक्स सिस्टम सरल, पारदर्शी और जनहितकारी बनेगा।
काले धन का प्रवाह रुकने के साथ-साथ व्यापारियों का भरोसा भी बढ़ेगा।

राइजिंग भास्कर : लेकिन क्या धारा 68 हटाने से टैक्स चोरी नहीं बढ़ेगी?

सीए अनिल के. जैन : नहीं, यदि सही वैकल्पिक व्यवस्था की जाए तो नहीं बढ़ेगी। मैं यह नहीं कहता कि कोई भी ट्रांजेक्शन बिना जांच के छोड़ दिया जाए।  बल्कि, जांच का अधिकार पुलिस, सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय जैसी वैधानिक एजेंसियों के पास होना चाहिए, न कि आयकर अधिकारियों के पास। आयकर विभाग का काम टैक्स मूल्यांकन तक सीमित होना चाहिए, न कि आपराधिक जांच तक। आज जो डर व्यापारी वर्ग में है, वह आर्थिक अपराध से ज्यादा अधिकारों के दुरुपयोग से पैदा हुआ है। अगर इस भय को खत्म किया जाए, तो लोग स्वेच्छा से टैक्स देंगे — यह मेरा दृढ़ विश्वास है।

राइजिंग भास्कर : आपने काले धन के संदर्भ में डीएलसी रेट खत्म करने की बात की है। कृपया इसे विस्तार से समझाएं।

सीए अनिल के. जैन : डीएलसी रेट (District Level Committee Rate) वह न्यूनतम दर है, जिस पर संपत्ति की रजिस्ट्री की जाती है। सरकार हर क्षेत्र के लिए यह तय करती है कि संपत्ति का मूल्य कम से कम इतना माना जाएगा। अब समस्या यह है कि बाजार मूल्य (Market Rate) और डीएलसी रेट में भारी अंतर होता है।
मान लीजिए, किसी जमीन का बाजार मूल्य 1 करोड़ है, लेकिन डीएलसी रेट 60 लाख तय है। तो लोग 60 लाख में रजिस्ट्री करवाते हैं और बाकी 40 लाख नकद (ब्लैक मनी) में दे देते हैं। यही ब्लैक मनी आगे जाकर देश की समानांतर अर्थव्यवस्था को बढ़ाती है। अगर सरकार डीएलसी रेट की यह व्यवस्था ही समाप्त कर दे और यह अनिवार्य कर दे कि हर संपत्ति की रजिस्ट्री उसके वास्तविक बाजार मूल्य पर होगी, तो काले धन की बड़ी धारा अपने-आप रुक जाएगी।

राइजिंग भास्कर : लेकिन ऐसा करने से जमीन के दाम तो बहुत बढ़ जाएंगे?

सीए अनिल के. जैन : इसके उलट, दाम स्थिर हो जाएंगे। आज जमीनों के दाम कृत्रिम रूप से इसलिए बढ़ते हैं, क्योंकि लोग ब्लैक मनी लगाते हैं। जब हर लेन-देन पारदर्शी और बैंकिंग सिस्टम के माध्यम से होगा, तो बाजार स्वतः संतुलित होगा। इसके अलावा, सरकार को वास्तविक मूल्य पर रजिस्ट्री शुल्क मिलने लगेगा,
जिससे राजस्व भी बढ़ेगा और काला धन भी समाप्त होगा। यह “एक तीर से दो निशाने” जैसा उपाय है।

राइजिंग भास्कर : नोटबंदी जैसे कदमों से भी काले धन पर रोक लगाने की कोशिश हुई थी। आप उस पर क्या सोचते हैं?

सीए अनिल के. जैन : नोटबंदी एक साहसिक कदम था, लेकिन उसकी तैयारी और उसके बाद की प्रणाली पर्याप्त नहीं थी। काले धन की जड़ें नकदी में नहीं, बल्कि नीतिगत खामियों में हैं। जब तक आप डीएलसी रेट, आयकर की धारा 68, और जटिल टैक्स संरचना को नहीं सुधारेंगे, तब तक ब्लैक मनी खत्म नहीं हो सकती।काले धन का असली प्रवाह जमीन-जायदाद के माध्यम से होता है। यदि वहीं पारदर्शिता आ जाए, तो 70% समस्या का समाधान स्वतः हो जाएगा।

राइजिंग भास्कर : आप इन दोनों समस्याओं — जल संकट और काले धन — के समाधान को भारत के विकास से कैसे जोड़ते हैं?

सीए अनिल के. जैन : बहुत सीधा संबंध है। अगर हमारे देश में हर किसान को पानी मिले, हर नागरिक को स्वच्छ जल मिले, तो उत्पादन और स्वास्थ्य दोनों सुधरेंगे। इसी तरह, अगर व्यापारियों और निवेशकों को पारदर्शी व्यवस्था मिले, तो वे निडर होकर निवेश करेंगे। जल और धन — ये दोनों ही विकास की रीढ़ हैं। एक प्राकृतिक संसाधन है और दूसरा आर्थिक संसाधन। अगर इन दोनों का प्रवाह सही दिशा में रहे, तो भारत अगले 10 वर्षों में दुनिया की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।

राइजिंग भास्कर : अंत में, आप सरकार और आम जनता से क्या संदेश देना चाहेंगे?

सीए अनिल के. जैन : सरकार से मेरा विनम्र आग्रह है कि —

  1. नदियों के किनारों पर जल संचयन की राष्ट्रीय योजना शुरू की जाए।

  2. आयकर अधिनियम की धारा 68 की समीक्षा कर उसे समाप्त किया जाए।

  3. डीएलसी रेट प्रणाली को खत्म कर, बाजार मूल्य पर रजिस्ट्री का प्रावधान किया जाए।

और जनता से यही कहना चाहूंगा —
हम सबको केवल शिकायत नहीं करनी चाहिए, समाधान का हिस्सा बनना चाहिए।
अगर हम अपने स्तर पर पानी बचाएं, टैक्स ईमानदारी से दें, और पारदर्शिता अपनाएं,
तो भारत की विकास यात्रा कोई नहीं रोक सकता।

राइजिंग भास्कर विचार : अनिल के. जैन की सोच व्यावहारिक व दूरदर्शी

सीए अनिल के. जैन की सोच व्यावहारिक और दूरदर्शी है। उनका मानना है कि भारत के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं — बस उन्हें सही दिशा में प्रयोग करने की आवश्यकता है। “भारत विकास की चुनौतियां” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक दृष्टि है —जो बताती है कि अगर जल और धन की धारा सही दिशा में बहे, तो भारत आत्मनिर्भर और विश्वगुरु बन सकता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor