सालाना सफ़ाई से शुरू हुई एक नई सोच — घर के कोने-कोने में पड़ी अमानतें अब किसी के जीवन की जरूरत बन रही हैं।
राइजिंग भास्कर डेस्क. जोधपुर/ जयपुर/दिल्ली/पुणे
दिवाली का मौसम आ गया है। मिठाइयों की खुशबू, रंगोलियों के रंग, और बाजारों की चहल-पहल के बीच एक और परंपरा फिर से लौट आई है — “सालाना सफाई।”
हर घर में झाड़ू और कपड़े लेकर लोग जुटे हैं। कोई अलमारी खाली कर रहा है, कोई बक्सा खोल रहा है, कोई पुराने खिलौनों को देखकर मुस्कुरा रहा है।
पर इस बार हवा में कुछ अलग है — क्योंकि कुछ लोग सिर्फ घर नहीं, अपनी सोच भी झाड़-पोंछ रहे हैं।
“धूल सिर्फ दीवारों पर नहीं, सोच पर भी जम जाती है। इस दिवाली उसे भी साफ करने का वक्त है।”
— सामाजिक कार्यकर्ता रितिका, जोधपुर
अध्याय 1: सफाई के पीछे की भावना
हर साल की तरह, इस साल भी दीया जलाने से पहले घरों में सफाई चल रही थी। पर जोधपुर के सामाजिक कार्यकर्ताओं की इस बार एक नई पहल ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
सामाजिक कार्यकर्ता रवि ने बताया- —
“घर की सफाई करें, पर ज़रूरतमंदों को भी याद रखें।”
साथ ही एक डोनेशन बॉक्स रख दिया गया। लोग अपने पुराने कपड़े, जूते, बर्तन, किताबें, खिलौने और यहां तक कि फर्नीचर तक उसमें डालने लगे। तीन दिनों में बॉक्स इतना भर गया कि नए कार्टन मंगवाने पड़े।
शुरुआत अब कई इलाकों में हो गई है। गृहिणी अर्चना बताती हैं —
“हर बार सफाई के बाद ढेर सारा सामान निकलता था। इस बार सोचा, क्यों न इसे किसी के काम लाया जाए? जब मैंने देखा कि मेरी पुरानी साड़ी एक विधवा आश्रम में किसी महिला ने पहन रखी थी, तो मन को ऐसी शांति मिली जो शायद शॉपिंग मॉल में जाकर भी नहीं मिलती।”
अध्याय 2: घर में बंद यादें, बाहर अधूरे सपने
पुराने खिलौने जिन्हें हम यादों के कारण संभाल कर रखते हैं, वही किसी गरीब बच्चे के लिए ‘पहला खिलौना’ हो सकता है।
पुरानी किताबें जो अलमारी में धूल खा रही हैं, वही किसी झुग्गी के बच्चे के लिए ‘पहली शिक्षा’ का आधार बन सकती हैं।
और वो रजाई जो ट्रंक में बंद है, वही किसी दिहाड़ी मजदूर के लिए ‘सर्दी की पहली राहत’ बन सकती है।
“हमारे घरों में बंद यादें, किसी और के लिए उम्मीद की किरण बन सकती हैं।”
— शोभा व्यास, सामाजिक कार्यकर्ता
‘क्लीन टू केयर’ से सीखें-
नाम: Clean to Care Initiative
शुरुआत: 2022, पुणे से
संस्थापक: नेहा अग्रवाल (आईटी प्रोफेशनल) और उनके 6 दोस्त
उद्देश्य:
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घरों में पड़े उपयोगी सामान को पुनः उपयोग के लिए गरीबों तक पहुंचाना।
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समाज में “क्लटर फ्री, कॉन्शस लिविंग” की संस्कृति को बढ़ावा देना।
अब तक: -
18 शहरों में सक्रिय
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25,000+ परिवारों ने डोनेट किया सामान
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1.2 लाख से अधिक लोग सीधे लाभान्वित
अध्याय 3: जब सफाई बनी सामाजिक आंदोलन
गुड़गांव की ‘ग्रीन व्यू सोसाइटी’ ने इस बार दिवाली की सफाई को एक “सोशल क्लीनिंग ड्राइव” में बदल दिया।
हर रविवार, बच्चे और बुजुर्ग मिलकर घरों से पुराने सामान इकट्ठा करते हैं और पास के झुग्गी इलाकों में जाकर बाँटते हैं।
65 वर्षीय ओम प्रकाश बंसल कहते हैं —
“पहले हम पुराने बर्तन कबाड़ी को बेच देते थे। अब वही बर्तन जब किसी झुग्गी में खाना बनाते दिखे, तो लगा कि दिवाली की असली रोशनी वहीं है।”
सफाई के इस बदलते अर्थ ने समाज को उपभोक्तावाद से उदारता की ओर मोड़ दिया है।
अब लोगों को लगने लगा है कि सफाई केवल झाड़ू चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर जमा स्वार्थ को भी झाड़ना जरूरी है।
सोच में बदलाव
“दिवाली की सफाई हमें यह याद दिलाती है कि कुछ चीजें दूसरों की जिंदगी रोशन कर सकती हैं।”
— नेहल, स्टूडेंट्स
“हम हर साल नया खरीदते हैं, पर किसी पुराने के लिए वो नया ही होता है।”
—शशि माहेश्वरी, गृहिणी, दिल्ली
“दान हमेशा पैसे से नहीं होता, संवेदनाओं से होता है।”
— चंद्रमोहन, जोधपुर
अध्याय 4: जब बच्चों ने दी मिसाल
जोधपुर के कई स्कूलों में अनोखा कार्यक्रम किया गया —
‘माय ओल्ड, समवन’स न्यू।’
बच्चों से कहा गया कि वे अपनी कोई भी पुरानी पर अच्छी वस्तु — खिलौना, बैग, या किताब — लाएं।
तीन दिनों में 2,000 से अधिक वस्तुएं जमा हुईं।
फिर छात्रों ने खुद जाकर झुग्गी स्कूलों में उन्हें बांटा।
10 वर्षीय छात्रा मीरा ने कहा —
“मैंने अपना टेडी बियर दिया, जो मेरा फेवरेट था। लेकिन जब देखा कि वह दूसरी बच्ची उसी को गले लगाकर हँस रही थी, तो लगा कि मेरा टेडी बियर अब सच में खुश है।”
अध्याय 5: सफाई से दान तक — एक मानसिक यात्रा
सफाई अक्सर हमें हमारे ‘अनुपयोगीपन’ से परिचित कराती है।
जब हम अलमारी खोलते हैं तो यह अहसास होता है कि जो कपड़े, किताबें, सामान हम सालों से नहीं छू रहे, वे बस जगह घेर रहे हैं — और हमारे भीतर भी एक जकड़न पैदा कर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार —
“सफाई केवल वस्तुओं की नहीं, मानसिक हल्केपन की भी प्रक्रिया है। जब हम चीज़ें बांटते हैं, तो हमारा मन भी मुक्त होता है। इससे व्यक्ति में कृतज्ञता और संतोष की भावना बढ़ती है।”
क्या दान करना सुरक्षित है?
| वस्तु | देने से पहले क्या करें? | ध्यान रखें |
|---|---|---|
| कपड़े | धुले, साफ, बिना फटे हों | फॉर्मल और बच्चों के कपड़े अधिक उपयोगी |
| किताबें | बिना फटे, लिखावट रहित | खासकर बच्चों की पाठ्यपुस्तकें, कहानियाँ |
| खिलौने | साफ और कार्यशील | बैटरी या टूटे हिस्से न हों |
| बर्तन | जंग या टूट-फूट रहित | स्टील या एल्युमिनियम सबसे टिकाऊ |
| इलेक्ट्रॉनिक्स | बेसिक रूप से चालू | साथ में उपयोग गाइड दें |
अध्याय 6: डिजिटल युग में दान की नई राह
अब दान सिर्फ मंदिरों या दरवाजों पर नहीं होता।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इसे आसान बना दिया है।
‘GiveIndia, Goonj, Share At Doorstep’ जैसे पोर्टल्स अब घर से सामान उठाकर जरूरतमंदों तक पहुंचा रहे हैं।
“हम चाहते हैं कि लोग चीजें फेंकने से पहले सोचें — क्या यह किसी के जीवन में फर्क ला सकती है?”
— अनुष्का साहू, Goonj Delhi Chapter
अध्याय 7: दान का नया अर्थ — आत्मा की रोशनी
दिवाली का मूल अर्थ ‘अंधकार से प्रकाश’ है।
पर यह प्रकाश केवल दीयों से नहीं आता — वह भीतर से फैलता है, जब हम किसी और की जिंदगी में रोशनी लाते हैं।
दिल्ली की सड़कों पर जब नेहा अग्रवाल ने देखा कि उनकी दी हुई पुरानी जैकेट एक रिक्शा चालक ने पहन रखी थी, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा —
“शायद यही असली दिवाली थी, जो मेरे घर से निकलकर किसी और के जीवन में जल रही थी।”
डेटा बॉक्स: भारत में ‘रीयूज़’ संस्कृति की स्थिति
| आंकड़ा | स्रोत | विवरण |
|---|---|---|
| 1.5 लाख टन | CPCB रिपोर्ट 2023 | हर साल दिवाली के दौरान निकलने वाला घरेलू कचरा |
| 48% | लोकल NGO सर्वे | घरों में अनयूज्ड कपड़ों का प्रतिशत |
| 72% | Deloitte Study | भारतीय उपभोक्ता त्योहारों में औसतन 20% नया सामान खरीदते हैं |
| 22 शहर | Clean India Campaign | जहां “डोनेशन बॉक्स” मॉडल सक्रिय है |
| 1 करोड़+ | अनुमान | हर साल दान से लाभान्वित लोग |
अध्याय 8: संवेदना की लौ
जोधपुर की शारदा पुष्करणा बताती हैं कि —
“सोचा था, थोड़ा सफाई करेंगे और कुछ सामान बांट देंगे। लेकिन अब हमें कॉल करके कहते हैं, ‘दीदी अगले हफ्ते भी आइए।’ ये दान नहीं, रिश्ता बन गया है।”
दिवाली के दीये की तरह यह अभियान भी धीरे-धीरे फैल रहा है — एक घर से दूसरे, एक दिल से दूसरे तक।
जीवन बदलते पल
“मैंने अपनी बेटी की पुरानी किताबें दीं। हफ्ते बाद एक बच्ची वही किताब लेकर मुझे पढ़ाई दिखाने आई। वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे उजला दिन था।”
— सुषमा वर्मा, शिक्षक, भोपाल
“दान करने से ज्यादा सुख शायद कुछ नहीं।”
— राजीव गुप्ता, बिजनेसमैन, दिल्ली
अध्याय 9: दिवाली का नया अर्थ
दिवाली का त्योहार हमेशा से “अंधकार पर प्रकाश की जीत” का प्रतीक रहा है।
पर शायद अब इसे एक नए अर्थ में देखा जा सकता है —
“स्वार्थ पर संवेदना की जीत।”
हमारी सफाई अब केवल हमारे घर की नहीं, बल्कि हमारी सोच की भी होनी चाहिए।
क्योंकि असली रौशनी तब फैलती है, जब कोई और हमारे कारण मुस्कुराए।
इस बार कुछ अलग करें
-पुराने कपड़े दान करें
-किताबें बच्चों तक पहुंचाएं
-खिलौने बांटें
-रसोई का अतिरिक्त सामान साझा करें
-और सबसे जरूरी — यह बात आगे बढ़ाएं
हर व्यक्ति अपने स्तर पर “क्लीन टू केयर” बन सकता है।
इस बार दीया जलाते वक्त सोचें —
“मेरे घर की सफाई से किसी और के घर में रौशनी पहुंचे, यही तो असली दिवाली है।”
केवल 5 चीजें जान करें, देश साफ नहीं, संवेदनशील भी बन जाएगा:
हम सबके घरों में कोई न कोई कोना ऐसा होता है जो यादों से भरा है — पर वही कोना किसी और की जिंदगी बदल सकता है।
इस दिवाली, अगर हर परिवार सिर्फ 5 चीजें भी दान करे, तो यह देश केवल साफ नहीं, संवेदनशील भी बन सकता है।
“जब आप किसी को खुश करते हैं, तो ईश्वर को धन्यवाद देने की जरूरत नहीं होती — क्योंकि उस पल में आप ही ईश्वर का काम कर रहे होते हैं।”
“इस बार दीया तभी जलाएं,
जब किसी की अंधेरी रात उजियारे में बदले।”क्योंकि असली दिवाली वही है,
जो दीवारों नहीं, दिलों को रोशन करे।





