Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 5:43 pm

Thursday, July 9, 2026, 5:43 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

पर्यटन की चमक के पीछे छिपा जैसलमेर का दर्द — विकास नहीं, सुनियोजित लूट

इस चमकती सतह के नीचे एक ऐसा दर्द पल रहा है जिसे कोई सुनना नहीं चाहता — क्योंकि यह दर्द ‘पैसे’ और ‘ताकत’ के शोर में दबा दिया गया है

दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर 

जैसलमेर आज विश्व पर्यटन मानचित्र पर जगमगा रहा है। इस समय दीपोत्सव चल रहा है, विदेशी पर्यटक मौज कर रहे हैं, बाजारों में पैर रखने की जगह नहीं है, होटल फुल हैं, सड़कों पर कैमरे, सेल्फियां और रेगिस्तान में संगीत-नृत्य का तामझाम है। दुनिया जैसलमेर को देखकर वाहवाही कर रही है। लेकिन इस चमकती सतह के नीचे एक ऐसा दर्द पल रहा है जिसे कोई सुनना नहीं चाहता — क्योंकि यह दर्द ‘पैसे’ और ‘ताकत’ के शोर में दबा दिया गया है।

जैसलमेर दिखने में सुनहरा है, लेकिन भीतर से खोखला हो चुका है। जिस शहर की पहचान उसकी धरोहर, उसके किले और उसके खुले आकाश के नीचे फैले मरुस्थल से है — उसी शहर को नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों और भू-माफियाओं ने मिलकर निचोड़ खाया है। पर्यटन के नाम पर विकास नहीं, लूट मचाई गई है।

फोर्ट में वैकल्पिक गेट — असल समस्या से बचने का बहाना

जैसलमेर कलेक्टर आज फोर्ट में वैकल्पिक गेट खोलने का प्लान बना रहे हैं। सुनने में यह ‘विकास योजना’ लगती है, लेकिन असल में यह समस्या की जड़ से भागने का तरीका है। फोर्ट में रास्ते बंद किसने किए? किसी सरकार ने नहीं। खुद प्रशासन की मिलीभगत से वर्षों से व्यापारी दोनों तरफ दुकानें फैलाकर बैठे हैं। पॉल में अतिक्रमण कर रास्तों को इतना तंग कर दिया गया है कि पर्यटक तो क्या, एंबुलेंस तक नहीं निकल सकती।

समाधान यह नहीं कि नया दरवाज़ा निकाला जाए। समाधान तो यह है कि जो अतिक्रमण है उसे हटाया जाए — लेकिन यह कदम उठाने की हिम्मत किसी कलेक्टर में नहीं है। व्यापारी लॉबी और राजनीतिक दबाव के आगे प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं। इसलिए आसान रास्ता चुना गया — धरोहर से छेड़छाड़ करो, नया गेट खोदो और दिखाओ कि ‘कुछ बड़ा’ कर रहे हैं।

असलियत में यह विकास नहीं, प्रशासनिक अक्षमता है।

बाजारों में व्यापारी कब्जे — सड़कें नहीं, गलियां बची हैं

आज जैसलमेर के बाजारों में चलकर देखिए। मुख्य सड़कों को दुकानदारों ने आधा निगल लिया है। ठेलों, बेसमेंट शॉप्स, फूटपाथ और तिरपाल से बने अस्थायी ढांचों ने सड़कों को चौरस से रेंगने लायक बना दिया है। पैदल चलने के लिए भी जगह नहीं। कार निकलना तो भूल ही जाइए। ट्रैफिक पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी है क्योंकि वह जानती है — जिसने कब्जा किया है, वह ही ‘स्थानीय प्रभावशाली’ है।

जाम लगते हैं, लोग गालियां देकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन सवाल कोई नहीं उठाता — यह सड़क आखिर किसकी है? प्रशासन की, जनता की या व्यापारियों की?

जैसलमेर को लूटा गया है — और यह लूट 20 साल से जारी है

आज जो दिखाई दे रहा है वह नई समस्या नहीं है। यह 20 साल पुराना कैंसर है। कभी जहां ओरन होते थे, गोचर जमीन होती थी, श्मशान भूमि होती थी — आज वहां होटल, ढाबे, गेस्ट हाउस और फार्म हाउस खड़े हैं। क्या यह किसी एक रात में हुआ? नहीं। हर कलेक्टर ने देखा, हर विधायक और सांसद ने देखा, हर पत्रकार ने देखा — और सबने या तो चुप्पी साधी या हिस्सा ले लिया।

यहाँ तक कि कुछ तथाकथित ‘जनसेवक’ और ‘पत्रकार’ भी जमीन के टुकड़े हड़पकर करोड़पति बन बैठे। जिसने लिखा, उसने सौदा किया। जिसने बोला, उसने समझौता किया। जिसने विरोध किया, उसे या तो खरीद लिया गया या किनारे कर दिया गया।

आज स्थिति यह है कि जैसलमेर में विकास की भाषा में लूट छिपाई जाती है। धरोहर संरक्षण की बात सिर्फ फाइलों में होती है, ज़मीन पर सौदेबाजी होती है।

जैसलमेर चमकता भी है और सिसकता भी — फर्क सिर्फ यह है कि एक रोशनी दिखती है, दूसरा अंधेरा छुपा दिया गया है

पर्यटक यहां आकर कहते हैं — “कितना सुंदर शहर है!” लेकिन स्थानीय लोग अंदर ही अंदर कहते हैं — “किसको बताएं कि यह सुंदरता हम पर कितनी भारी पड़ गई है।”

धरोहर बिक गई

सड़कें बिक गईं

जमीनें बिक गईं

प्रशासन बिक गया

सवाल पूछने की हिम्मत भी बिक गई

यह शहर अब किसी एक व्यक्ति की गलती से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सड़ांध से कराह रहा है।

सवाल जो जैसलमेर पूछ रहा है — लेकिन कोई सुनने वाला नहीं

क्या जैसलमेर केवल सैलानियों के कैमरे के लिए बचा है?

क्या यहां रहने वालों को सुविधा नहीं, सिर्फ तमाशा देखने की आदत डालनी होगी?

क्या हर कलेक्टर केवल ‘प्रोजेक्ट लॉन्च’ करने आता है, हल निकालने नहीं?

क्या विधायक और सांसद केवल शपथ लेने आते हैं, शपथ निभाने नहीं?

क्या मीडिया केवल ‘ट्रैवल स्टोरी’ लिखेगा, ‘स्टिंग ऑपरेशन’ नहीं?

क्या धरोहर बचाएंगे या उसे ही ‘कमाई का रास्ता’ बनाकर खत्म कर देंगे?

जैसलमेर आज केवल सुनहरा शहर नहीं, चीखता हुआ शहर है।
पर्यटन के शोर में उसकी आवाज दब गई है।
अतिक्रमण के ढांचों में उसकी सांस रुकी हुई है।
लूट की परतों के नीचे उसका अस्तित्व दम तोड़ रहा है।

और सबसे दुखद बात यह है —

जैसलमेर को सबने लूटा — और किसी ने बचाने की कोशिश नहीं की।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor