वित्त विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ऑडिट रिपोर्ट में कई गड़बड़ियां सामने आई हैं। कई जिलों में ड्रेस वितरण के रिकॉर्ड अपूर्ण हैं। कई जगह भुगतान का कोई फिजिकल एविडेंस नहीं मिला।”
एक आरटीआई कार्यकर्ता ने जानकारी दी कि, “हमें प्राप्त दस्तावेजों में कई ऐसे छात्रों के नाम मिले हैं जो अब स्कूल में पढ़ते ही नहीं, लेकिन उनके नाम पर यूनिफार्म की राशि जारी की गई। कई खातों के बैंक IFSC कोड तक गलत दर्ज किए गए हैं, जिससे संदेह और गहरा जाता है।”
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार द्वारा 2022 के अंत में शुरू की गई नि:शुल्क यूनिफार्म वितरण योजना अब सवालों के घेरे में है। यह योजना राज्य के 71,363 सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 68 लाख से अधिक छात्र-छात्राओं को साल में दो सेट ड्रेस उपलब्ध करवाने के लिए चलाई गई थी। लेकिन ऑडिट रिपोर्ट और आरटीआई खुलासों ने एक बड़ा घोटाला उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 20 लाख बच्चों तक ड्रेस पहुंची ही नहीं, जबकि उनके नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में भुगतान दिखाया गया है।
40 करोड़ का रहस्य: ऑडिट रिपोर्ट में खुला खेल
सरकारी ऑडिट में अब यह सामने आया है कि यूनिफार्म योजना में करीब 40 करोड़ रुपए की राशि संदिग्ध तरीके से खर्च दिखाई गई है। इस राशि पर वित्तीय आपत्ति (ऑब्जेक्शन) दर्ज की गई है। ऑडिट अधिकारियों ने सवाल उठाया है कि जब इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को ड्रेस नहीं मिली, तो यह राशि आखिर कहां गई?
सरकार की तरफ से इस ऑब्जेक्शन का जवाब अभी तक प्रस्तुत नहीं किया गया है। वित्त विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
“ऑडिट रिपोर्ट में कई गड़बड़ियां सामने आई हैं। कई जिलों में ड्रेस वितरण के रिकॉर्ड अपूर्ण हैं। कई जगह भुगतान का कोई फिजिकल एविडेंस नहीं मिला।”
योजना का ढांचा: पैसे सीधे खातों में, पर खाते असली या नकली?
योजना के तहत राज्य सरकार ने यह प्रावधान रखा था कि कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों को यूनिफार्म सिलवाने के लिए प्रति छात्र 200 रुपए उनके अभिभावकों के बैंक खातों में सीधे जमा किए जाएंगे। लेकिन अब यह आरोप लग रहा है कि कई जिलों में फर्जी नामांकन दिखाकर राशि निकाली गई। वहीं, ड्रॉपआउट बच्चों (जो स्कूल छोड़ चुके थे) के नाम पर भी राशि ट्रांसफर की गई।
एक आरटीआई कार्यकर्ता ने जानकारी दी कि,
“हमें प्राप्त दस्तावेजों में कई ऐसे छात्रों के नाम मिले हैं जो अब स्कूल में पढ़ते ही नहीं, लेकिन उनके नाम पर यूनिफार्म की राशि जारी की गई। कई खातों के बैंक IFSC कोड तक गलत दर्ज किए गए हैं, जिससे संदेह और गहरा जाता है।”
ड्रेस तो दिखी नहीं, मगर भुगतान का रिकॉर्ड पूरा
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन 20 लाख बच्चों तक यूनिफार्म नहीं पहुंची, उनके नाम पर भी भुगतान का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है। कई स्कूलों में प्रधानाध्यापकों ने बताया कि
“हमें विभाग से केवल बच्चों के नामों की सूची आई थी। पैसे सीधे खातों में ट्रांसफर होने थे, पर अधिकांश बच्चों के अभिभावकों को कोई राशि नहीं मिली।”
शिक्षा विभाग के जिला स्तर के अधिकारियों का कहना है कि “भुगतान का डेटा स्टेट सर्वर पर अपडेट किया गया था, पर कई बैंक खातों की पुष्टि (वेरिफिकेशन) नहीं की गई।”
इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि यूनिफार्म योजना के तहत कई फर्जी और बोगस खातों में राशि ट्रांसफर कर दी गई, और बाद में उन्हें क्लियर दिखा दिया गया।
आरटीआई से खुली परतें
आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से खुलासा हुआ कि कई जिलों में यूनिफार्म वितरण का फिजिकल स्टॉक रिकॉर्ड ही नहीं है। जयपुर जिले में 9,80,000 बच्चों में से लगभग 7,45,000 तक ही यूनिफार्म पहुंचने का रिकॉर्ड है। उसी तरह भरतपुर, बारां, चूरू, बाड़मेर और धौलपुर जिलों में लाखों बच्चों का रिकॉर्ड अधूरा है।
आरटीआई दस्तावेज़ों में यह भी सामने आया कि कुछ जगहों पर “ड्रेस वितरण समारोह” के फोटो अपलोड किए गए, लेकिन जिन बच्चों के नाम फोटो में थे, वे स्कूल की हाजिरी रजिस्टर में मौजूद ही नहीं हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता ने कहा,
“यह घोटाला केवल अकाउंटिंग गलती नहीं है, बल्कि एक योजनाबद्ध आर्थिक हेराफेरी है। बच्चों के नाम पर सरकारी पैसे की बंदरबांट हुई है।”
यूनिफार्म योजना कैसे बनी घोटाले की खुराक
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2022 में घोषणा: अशोक गहलोत सरकार ने यूनिफार्म योजना को शिक्षा प्रोत्साहन के तौर पर लॉन्च किया।
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68 लाख बच्चों को लक्ष्य: प्रत्येक बच्चे के लिए 200 रुपए निर्धारित किए गए।
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बजट आवंटन: तय बजट की हुई बंदरबांट।
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ऑडिट जांच: 2024 के अंत तक 40 करोड़ रुपए का कोई उचित हिसाब नहीं मिला।
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प्राथमिक जिम्मेदारी: स्कूल शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा अधिकारियों पर थी, जिन्होंने डाटा वेरिफिकेशन किए बिना भुगतान की अनुमति दी।
कौन हैं जिम्मेदार?
सूत्रों के अनुसार, कुछ जिलों में शिक्षा विभाग के कर्मचारियों, बैंकिंग समन्वयकों और पंचायत स्तर के ऑपरेटरों की मिलीभगत से यह रकम ट्रांसफर की गई। कई पंचायतों में एक ही बैंक खाता कई बच्चों के नाम से जोड़ा गया था। इस “मल्टी-एंट्री सिस्टम” के जरिए कई जगह एक ही व्यक्ति ने दर्जनों छात्रों की राशि निकाल ली।
एक वरिष्ठ शिक्षा अधिकारी के अनुसार,
“हमने कई स्कूलों में पाया कि समान आधार नंबर से एक से ज्यादा खातों में पैसे गए हैं। यह अपने आप में गंभीर गड़बड़ी है।”
अब जांच का इंतजार
राजस्थान के शिक्षा विभाग की यह योजना गरीब बच्चों की मदद के लिए शुरू की गई थी। पर अब यह एक बड़ा वित्तीय घोटाला बनकर उभर रहा है। 40 करोड़ रुपए का यह खेल न सिर्फ सरकारी सिस्टम की लापरवाही दिखाता है, बल्कि उन बच्चों के साथ अन्याय भी, जिनके नाम पर यह पैसा जारी किया गया।
अब सबकी निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई पर हैं —क्या यह मामला कागजों तक सिमट कर रह जाएगा, या फिर 40 करोड़ के इस यूनिफार्म घोटाले के असली जिम्मेदारों तक जांच की सुई पहुंचेगी?





