Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 1:53 pm

Thursday, July 9, 2026, 1:53 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

शिक्षा मंत्री दिलावर जी टाई पर रोक और यूनिफॉर्म एक समान से कुछ नहीं होने वाला, करना ही है तो निजी-सरकारी स्कूलों की पढ़ाई एक समान कीजिए…

राइजिंग भास्कर कॉलम : दिलीप कुमार पुरोहित

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने शिक्षकों की हाजिरी दोनों टाइम हाजिरी अनिवार्य करने की घोषणा की है इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। मगर टाई व्यवस्था खत्म करना, सरकारी-निजी स्कूलों की यूनिफॉर्म समान करने का निर्णय अतार्किक है। अगर करना ही था तो सरकारी-निजी स्कूलों की पढ़ाई यानी शिक्षा पाठ्यक्रम समान करना था ताकि गरीब और मध्यमवर्ग के बच्चों को एक समान और आधुनिक शिक्षा नसीब होती…मगर शिक्षा मंत्री को उटपटांग आदेश जारी कर चर्चा में रहना पसंद है…प्रस्तुत है उनकी घोषणा पर एक रिपोर्ट-

राजस्थान के पंचायतीराज और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हाल ही में स्कूल शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अहम फैसले लिए हैं। इनमें कुछ निर्णय स्वागत योग्य हैं, तो कुछ ने शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिक्षा मंत्री ने घोषणा की है कि अब सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों को टाई पहनने पर रोक लगाई जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि अब राजस्थान में नया शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल से शुरू होगा — जो कि लगभग एक दशक बाद लागू की जा रही नई व्यवस्था है। इतना ही नहीं, शिक्षा विभाग अब अनुपस्थित विद्यार्थियों की सूचना सीधे अभिभावकों के मोबाइल पर भेजेगा, ताकि उन्हें अपने बच्चे की उपस्थिति की जानकारी मिल सके।
इन सबके बीच एक और बड़ा फैसला सामने आया — कि अब सरकारी और निजी स्कूलों की यूनिफॉर्म एक जैसी होगी।

पहली नज़र में यह निर्णय “समानता” की भावना से प्रेरित लग सकता है, लेकिन जब हम इसे गहराई से परखते हैं, तो कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं — क्या समान कपड़े पहनाने से समान शिक्षा मिल जाएगी? क्या बच्चों को टाई पहनने से रोक देना आधुनिकता या अनुशासन का अंत नहीं होगा? और क्या शिक्षा मंत्री को यूनिफॉर्म जैसी सतही बातों की बजाय शिक्षा की गुणवत्ता में समानता लाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए था?

1. टाई पर रोक: आधुनिक शिक्षा के अनुशासन पर चोट

शिक्षा मंत्री का पहला आदेश — “अब स्कूलों में टाई पहनने पर रोक लगाई जाएगी” — प्रदेश भर में चर्चा का विषय बन गया है। उनका तर्क है कि टाई विदेशी परंपरा है और भारतीय वातावरण के अनुकूल नहीं। लेकिन क्या हर विदेशी परंपरा को त्याग देना ही ‘भारतीयता’ की पहचान है?

टाई पहनना न केवल अनुशासन का प्रतीक रहा है बल्कि यह विद्यार्थियों के आत्मविश्वास को भी दर्शाता है। भारत के कई प्रतिष्ठित सरकारी स्कूलों — जैसे केन्द्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय, और यहां तक कि राजस्थान बोर्ड के मॉडल स्कूलों में — वर्षों से टाई अनुशासन का हिस्सा रही है।

टाई हटाने से बच्चों की सुविधा तो बढ़ेगी, लेकिन व्यक्तित्व निर्माण और अनुशासन की भावना पर असर पड़ेगा।
आज जब देश “विश्वगुरु भारत” बनने का सपना देख रहा है, तब हमें बच्चों को सादगी सिखाने के साथ-साथ सभ्यता, आत्म-संयम और प्रस्तुति की शिक्षा भी देनी चाहिए — जो स्कूल ड्रेस का उद्देश्य रहा है।

शिक्षा मंत्री का यह फैसला दिखने में छोटा है, परंतु इसके पीछे का दृष्टिकोण कहीं न कहीं आधुनिक शिक्षा की भावना से टकराता हुआ लगता है। बच्चे जब टाई पहनते हैं, तो वे खुद को स्कूल की मर्यादा से जोड़ते हैं। टाई केवल कपड़ा नहीं — एक मानसिक अनुशासन का प्रतीक है।

2. सत्र अब 1 अप्रैल से — एक दूरदर्शी फैसला

दिलावर का दूसरा बड़ा निर्णय — नया शैक्षणिक सत्र अब 1 जुलाई की बजाय 1 अप्रैल से शुरू होगा।
इस फैसले की प्रशंसा की जानी चाहिए।

लंबे समय से शिक्षा विशेषज्ञ यह मांग कर रहे थे कि राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में जुलाई से सत्र शुरू करना अव्यावहारिक है। अप्रैल में सत्र शुरू होने से

  • बच्चों को गर्मी की छुट्टियों से पहले पाठ्यक्रम की शुरुआती समझ मिल जाएगी,

  • शिक्षकों को नए सत्र की तैयारी और मूल्यांकन के लिए पर्याप्त समय मिलेगा,

  • और सबसे महत्वपूर्ण — बोर्ड परीक्षाओं और प्रवेश प्रक्रियाओं का कैलेंडर राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप हो जाएगा।

अक्सर राज्य के छात्र CBSE और अन्य राष्ट्रीय बोर्डों के मुकाबले पीछे रह जाते थे क्योंकि उनका सत्र देर से शुरू होता था। यह बदलाव बच्चों के भविष्य के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

इस फैसले को शिक्षा मंत्री की दूरदर्शी पहल माना जा सकता है — बशर्ते इसे सही तरीके से लागू किया जाए।

3. अनुपस्थित विद्यार्थियों की सूचना अभिभावकों को: सराहनीय पहल

शिक्षा मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि अब से अनुपस्थित विद्यार्थियों की सूचना सीधे अभिभावकों के मोबाइल पर भेजी जाएगी।

यह कदम निश्चित रूप से तकनीकी पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में बड़ा सुधार है।
अब तक सरकारी स्कूलों में “हाजिरी-पंजी” अक्सर औपचारिकता भर थी। कई बार बच्चे स्कूल नहीं जाते, पर हाजिरी लगी रहती।
अब यदि रोज़ाना की अनुपस्थिति की सूचना सीधे अभिभावक के मोबाइल पर जाएगी, तो

  • बालक की शिक्षा पर नियंत्रण बढ़ेगा,

  • टीचर्स की जवाबदेही तय होगी,

  • और सबसे अहम — ड्रॉपआउट दर घटेगी।

यह फैसला सरकारी स्कूलों में डिजिटल पारदर्शिता का नया अध्याय खोल सकता है।

4. सरकारी और निजी स्कूलों की एक जैसी यूनिफॉर्म — समानता या भ्रम?

अब बात करते हैं उस फैसले की, जिसने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी —
शिक्षा मंत्री का आदेश कि अब सरकारी और निजी स्कूलों के विद्यार्थियों की यूनिफॉर्म एक जैसी होगी।

पहली नज़र में यह फैसला “असमानता खत्म करने” की दिशा में उठाया गया कदम लगता है, लेकिन वास्तविकता कहीं गहरी है।

क्या सिर्फ एक जैसी ड्रेस से बच्चों के बीच का सामाजिक-आर्थिक अंतर मिट जाएगा?
निश्चित ही नहीं। गरीब परिवार का बच्चा चाहे महंगे कपड़े पहन ले, पर जब उसे पता होगा कि उसके स्कूल में लैब नहीं है, डिजिटल बोर्ड नहीं है, और किताबें पुरानी हैं — तब समानता केवल भ्रम बनकर रह जाएगी। शिक्षा में समानता का अर्थ है समान संसाधन, समान अवसर और समान गुणवत्ता। ड्रेस समान करना केवल बाहरी दिखावा है।

दरअसल, इस तरह के आदेशों से शिक्षा विभाग का ध्यान असली मुद्दों से हट जाता है —

  • सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें,

  • शिक्षकों की कमी,

  • अधूरी लैब्स,

  • डिजिटल शिक्षा की अनुपलब्धता,

  • और लगातार घटता नामांकन दर।

इन समस्याओं के बीच यदि मंत्री केवल “ड्रेस एक जैसी कर दो” कहें, तो यह नीति नहीं, प्रतीकवाद बनकर रह जाता है।

5. समान शिक्षा का सवाल — असली सुधार यहीं है

दरअसल, शिक्षा मंत्री को यह घोषणा करनी चाहिए थी कि

“अब राजस्थान में सरकारी और निजी स्कूलों की पढ़ाई एक समान होगी।”

यही वह निर्णय है जो वास्तविक समानता ला सकता था।

यदि सरकारी और निजी स्कूलों में

  • एक जैसा पाठ्यक्रम,

  • समान गुणवत्ता के शिक्षक,

  • समान लैब और खेल सुविधा,

  • और समान तकनीकी साधन उपलब्ध हों,
    तो किसी गरीब विद्यार्थी को यह महसूस नहीं होगा कि वह “सरकारी स्कूल” में पढ़ रहा है।

आज निजी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, रोबोटिक्स लैब, और डिजिटल लर्निंग है, जबकि सरकारी स्कूलों में कई जगह ब्लैकबोर्ड तक धुंधले हैं। इस खाई को ड्रेस या टाई हटाकर नहीं भरा जा सकता। गरीब को सम्मान तब मिलेगा जब उसे अमीर की तरह अवसर मिलेंगे। शिक्षा मंत्री को “यूनिफॉर्म समान” की जगह “शिक्षा समान” की घोषणा करनी चाहिए थी।

6. शिक्षा नीति नहीं, प्रयोगशाला बन गया शिक्षा विभाग

पिछले कुछ महीनों में शिक्षा विभाग द्वारा लिए गए फैसले — कभी टाई हटाना, कभी यूनिफॉर्म बदलना, कभी एजेंसी व्यवस्था लागू करना — यह दिखाता है कि विभाग स्थायी नीति की बजाय प्रयोगशाला में बदल गया है। हर मंत्री अपनी “नवाचार नीति” लेकर आता है, और कुछ वर्षों बाद नई सरकार उसे पलट देती है। इसका खामियाजा भुगतते हैं — बच्चे और शिक्षक। स्थिरता और दीर्घकालिक सोच के बिना शिक्षा नीति केवल घोषणाओं का पुलिंदा बनकर रह जाती है।

7. ड्रेस नहीं, दिशा बदलनी होगी

शिक्षा मंत्री दिलावर की कुछ पहलें सराहनीय हैं —

  • 1 अप्रैल से नया सत्र,

  • अनुपस्थिति सूचना प्रणाली,

  • और शिक्षा में अनुशासन पर ध्यान।

लेकिन टाई पर रोक और यूनिफॉर्म समान करने जैसे आदेशों से वास्तविक शिक्षा सुधार की दिशा धुंधली हो जाती है।

राजस्थान को आज जिस नीति की जरूरत है, वह है —

“समान अवसर, समान शिक्षा, समान गुणवत्ता।”

यदि सरकार यह सुनिश्चित करे कि

  • हर बच्चे को आधुनिक तकनीकी शिक्षा मिले,

  • हर शिक्षक प्रशिक्षित और प्रेरित हो,

  • और हर स्कूल में बुनियादी सुविधाएं हों,
    तो न टाई जरूरी है, न ड्रेस का रंग।

क्योंकि शिक्षा का असली लक्ष्य दिखावट नहीं, विकास है।
आज समय है कि हम अपने बच्चों को यह सिखाएं कि

“समान कपड़े नहीं, समान पढ़ाई ही असली समानता है।”


(लेखक का मत: शिक्षा मंत्री को चाहिए कि वे कपड़ों की बजाय शिक्षा के कंटेंट और गुणवत्ता पर समानता की दिशा में ठोस कदम उठाएं। तभी राजस्थान का हर बच्चा — चाहे सरकारी स्कूल का हो या निजी — आत्मविश्वास के साथ कह सकेगा, ‘मैं भी आधुनिक भारत का विद्यार्थी हूं।’)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor