Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 2:41 pm

Thursday, July 9, 2026, 2:41 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

राइजिंग भास्कर विचार : राजस्थान दुकान एवं वाणिज्य संस्थान (संशोधन) अध्यादेश 2025 में अभी कई खामियां, उसे दूर किए बिना थोपना गलत

बाल श्रम को हतोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार की मंशा अध्यादेश के माध्यम से गलत प्रतीत नहीं होती, परंतु सबसे बड़ा सवाल है कि इस अध्यादेश को सख्ती से लागू किया जाएगा…यह फिलहाल संभव नहीं लगता, सबसे बड़ी कमजोरी इस अध्यादेश की यह है कि जब तक बाल श्रम को रोकने के लिए उनके कारणों पर नहीं जाएंगे बाल श्रम रुकने वाला नहीं, अध्यादेश केवल सैद्धांतिक पक्ष पर जोर देता है, व्यावहारिक पहलू की अनदेखी कर रहा है…

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

9783414079 diliprakhai@gmail.com

राजस्थान की सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से यह घोषणा की है कि अब 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे दुकान एवं वाणिज्य संस्थानों में काम नहीं कर सकेंगे। अभी तक प्रशिक्षु अभ्यर्थियों की न्यूनतम आयु 12 वर्ष थी, जिसे अब 14 वर्ष कर दिया गया है। साथ ही, 14-18 वर्ष की उम्र के किशोरों को रात के समय काम करने से रोका गया है (पहले यह सीमा 12-15 वर्ष थी)। इसके अतिरिक्त, अध्यादेश में श्रमिकों की दैनिक कार्य अवधि की अधिकतम सीमा 10 घंटे निर्धारित की गई है।

सरकार का तर्क है कि इन संशोधनों से बच्चों को स्वास्थ्य, पोषण व शिक्षा के अवसर मिल सकेंगे तथा जल्दी काम में लगकर आने वाली शारीरिक व मानसिक असमर्थताओं का निदान होगा।

12-14 वर्ष के बच्चों की स्थिति — सांख्यिकी

इस नए प्रावधान के लागू होने के समय यह महत्वपूर्ण है कि छोटे बच्चों-विशेषकर 12-14 वर्ष आयु-वर्ग के बच्चों की संख्या और उनके सामाजिक-वित्तीय संदर्भ को समझा जाए।

  • राज्य में 2025 में अनुमानित कुल जनसंख्या लगभग 8.54 करोड़ है। Census 2011 India+1

  • एक पुराना स्रोत बताता है कि राजस्थान की कुल आबादी में लगभग 30.5 % 0-14 वर्ष आयु समूह में थे (प्रारंभिक किशोर और बच्चों सहित)। The Times of India+1

  • एक अन्य स्रोत के अनुसार, 2022 तक राज्य में 6-13 वर्ष की उम्र वाले बच्चों की संख्या लगभग 1.23 करोड़ थी (12,386,200) और 14-15 वर्ष की उम्र वाले लगभग 30.32 लाख थे (3,032,200)। Education.gov.in

इन आंकड़ों का अर्थ कुछ इस तरह ख़ाका खींचा जा सकता है: यदि 12-13 वर्ष आयु वर्ग + 14-14½ वर्ष आयु वर्ग (लगभग) मिलाकर माना जाए — तो 12-14 वर्ष आयु वर्ग में लगभग लगभग 1.2 करोड़ (12 मिलियन) या इससे अधिक संख्या हो सकती है। यह संख्या पूर्ण नहीं है, लेकिन चर्चा के लिए एक संकेत देती है कि इस आयु-वर्ग में लाखों बच्चे हैं।

उन बच्चों में से गरीब परिवारों के बच्चों की संख्या का राज्य-स्तरीय सार्वजनिक चीजें उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह मानना सही है कि बहुत-से ऐसे बच्चे हैं जिनके लिए परिवार की आर्थिक स्थिति, तथा घरेलू आय पर उनकी योगदान-आय मायने रखती है — अर्थात् बच्चे काम कर-कर परिवार का खर्चा सहन कर रहे हैं, या कम-से-कम बच्चों के काम करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।

गरीबी-निर्भर परिवार व बाल श्रम

राजस्थान में कई परिवारों की वित्त-स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं है कि वे सिर्फ वयस्क सदस्य की आय पर निर्भर रह सकें। ऐसे मामलों में जब परिवार में वयस्कों की आय कम हो, desemployment या असंगठित-क्षेत्र में काम हो रहा हो, वहां 12-14 वर्ष के बच्चों को काम पर लगाने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। इस अर्थ में, अध्यादेश द्वारा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम से हटाना उन परिवारों की आर्थिक निर्भरता को सीधे प्रभावित कर सकता है।

यह निर्भरता कुछ इस तरह है : बच्चे समय-समय पर दुकानों, वाणिज्य-संस्थाओं, स्थानीय छोटे व्यवसायों में सहायक-काम कर सकते हैं, जिससे वे घर के खर्च में योगदान देते हैं। इन बच्चों के काम करने से परिवार में थोड़ी अतिरिक्त आय आती है, और इस तरह परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा शिक्षा-भोजन-स्वास्थ्य खर्चों का बोझ कम हो सकता है। ऐसे बच्चों के रोजगार पर आधारित कुछ परिवार – विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में – आर्थिक रूप से संकुचित स्थिति में हैं।

जब सरकार कहती है कि 14 वर्ष से कम आयु-वर्ग के बच्चों को काम नहीं करना चाहिए, तो दूसरी ओर यदि उस परिवार के पास वैकल्पिक आय-स्रोत, पर्याप्त कल्याण-सहायता, आर्थिक-सुरक्षा नहीं है, तो उस बच्चे को काम से हटाना अर्थपूर्ण होने के पहले यह देखना होगा कि परिवार के पास वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद है या नहीं।

सरकार की कल्याण-योजनाएं

इस पृष्ठभूमि में यह देखा जाना चाहिए कि राजस्थान सरकार ने गरीबी-उन्मूलन व कमजोर परिवारों के लिए क्या-क्या योजनाएं चलायी हैं, ताकि बच्चों को काम पर न लगाने-वाले निर्णय का धरातल तैयार हो सकें।

कुछ प्रमुख योजनाएं निम्नलिखित हैं:

  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग़रीब मुक्त गांव योजना : राज्य सरकार ने इस योजना के तहत ग्रामीण BPL (Below Poverty Line) परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रस्ताव रखा है। पहली फेज में 5,000 गांव और आर्थिक पैकेज लगभग ₹300 करोड़ का प्रावधान किया गया है। ETGovernment.com+2Elets eGov+2

  • BPL परिवारों के लिए सहायता: एक अन्य स्रोत कहता है कि प्रत्येक BPL परिवार को लगभग ₹1 लाख सहायता देने की रूपरेखा बनाई गई है, तथा स्वयं-सहायता समूहों (SHG) को ₹15,000 तक का वर्किंग-कैपिटल समर्थन दिया जाएगा। Free Press Journal+1

  • सामाजिक-कल्याण स्कीम्स: राज्य में अनेक कल्याण-योजनाएं हैं – जैसे पालनहार योजना (Palanhar Yojana) जो अनाथ बच्चों या ऐसे बच्चों को वित्तीय सहायता देती है जिनके माता-पिता उनकी देखभाल नहीं कर सकते। Testbook+1

  • सूची में अन्य योजनाएँ: जैसे शिक्षा-संबंधी, कौशल-विकास-योजनाएं, रोजगार-उन्मुख कार्यक्रम आदि। Govt Schemes+1

इस तरह देखा जाए तो सरकार द्वारा कुछ मेगा-कल्याण योजनाएं तो चल रही हैं, लेकिन यह सवाल कि इन योजनाओं का विस्तार व क्रियान्वयन धरातल पर बच्चों के काम से बाहर रहने का विकल्प बनने के लिए पर्याप्त है या नहीं, बड़ा मायने रखता है।

अध्यादेश-प्रावधानों का विश्लेषण

  1. 14 वर्ष से कम आयु में श्रम निषेध – सकारात्मक पहल:
    बच्चों को शिक्षा-स्वास्थ्य-खेल-कूद की विकास-शक्ति देने की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम है। काम-पर निर्भरता से निकलकर बच्चों को स्कूल एवं खेल-कूद का अवसर मिलना राज्य के सामाजिक विकास के लिए लाभदायक है।

    लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब परिवार की आय का एक हिस्सा बच्चे की मेहनत पर टिका हो। यदि उसके हटने से परिवार के लिए प्रत्यक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो, तो प्रस्तावित निषेध का लाभ सीमित हो सकता है। इस संदर्भ में, यह देखा जाना चाहिए कि क्या सरकार ने ऐसे परिवारों की आय-गांठने की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की है — केवल निषेध करना ही पर्याप्त नहीं।

  2. 14-18 वर्ष की उम्र के किशोरों को रात में काम से रोकना – तर्क व सवाल:
    सरकार का तर्क हो सकता है कि रात में काम करने से किशोर के स्वास्थ्य-शिक्षा-नींद पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, सामाजिक सुरक्षा खतरे बढ़ते हैं, तथा उनकी शिक्षा बाधित हो सकती है। यह तर्क मान्य है कि किशोरों को पर्याप्त नींद, सामाजिक एवं शारीरिक विकास-अवकाश की आवश्यकता होती है।

    लेकिन इस तर्क के सामने दो बड़े सवाल हैं:

    • 18 वर्ष से कम उम्र का किशोर सामाजिक-राजनीतिक रूप से काफी हद तक सक्षम माना जाता है (वोट देने का अधिकार, सामाजिक निर्णय लेने की क्षमता) — फिर क्यों इस आयु वर्ग को रात के समय काम करने से स्वचालित रूप से निषिद्ध किया गया है?

    • यदि किशोर अपनी मर्जी से काम करना चाहता है, और परिवार की आर्थिक आवश्यकता है, तो उसे रात में काम करने से रोकना क्या वास्तव में उसकी आजादी व सामाजिक-भागीदारी को कम नहीं करता?

    इस प्रकार, रात के समय के काम पर पाबंदी को पूरी तरह तार्किक और वास्तविक नियंत्रण-मापदंडों के आधार पर समझना होगा — अर्थात् क्या यह पाबंदी सिर्फ उम्र-आधारित है, या परिस्थिति-आधारित (उदाहरण-स्वरूप स्वास्थ्य-खतरा, शिक्षा-परजीवितता, सुरक्षा-जोखिम) भी है? यदि केवल उम्र-आधारित है, तो यह किशोरों की स्वायत्तता व आर्थिक भागीदारी के आधार पर चुनौती खड़ी कर सकती है।

  3. दैनिक कार्य अवधि की अधिकतम 10 घंटे की सीमा – आलोचना:
    अध्यादेश में तय किया गया है कि श्रमिकों की दैनिक कार्य अवधि 10 घंटे से अधिक नहीं होगी। superficially यह श्रम-हितैषी दिखाई देती है, लेकिन कई श्रमिक-वर्गों (विशेषकर ठेका-ठेकेदार प्रणाली में काम करने वाले) के लिए यह पर्याप्त नहीं माना जा सकता। राइजिंग भास्कर का सुझाव यह है कि:

    • 6 घंटे प्रतिदिन को अधिक स्वास्थ्य-सुरक्षित व सामाजिक-उपयुक्त मानक होना चाहिए — यह “श्रम-अति” व थकान-क्षय को रोकेगा।

    • साथ ही साप्ताहिक अवकाश (कम-से-कम एक पूरा दिन) निश्चित हो, ताकि श्रमिक को पुनरुद्धार व पारिवारिक समय मिल सके।

    • विभागीय मापदंड जैसे Employees’ Provident Fund Organisation (PF) (प्रॉविडेंट फंड), बोनस-वेतन (जैसे दिवाली-बोनस), सामाजिक सुरक्षा कल्याण सुविधाएँ श्रमिकों को मिलना सुनिश्चित हों।

    • विशेष ध्यान ठेका-प्रणाली (contractual labour) पर देना चाहिए, जहां श्रमिक अक्सर 14-14 घंटे तक काम करते पाए जाते हैं — अध्यादेश में यह व्यवस्था भले न हो, लेकिन धरातल पर यह शिकायत लगातार सामने आती है। इस प्रकार 10-घंटे की सीमा का केवल विधि-घोषणा बनकर रह जाना संभव है, यदि ठेका-प्रणाली व निरीक्षण व्यवस्था मजबूत न हो।

इसलिए, 10-घंटे की “उच्चतम” सीमा को उचित मानना होगा, लेकिन इसे श्रेष्ठ मानक नहीं माना जा सकता। वास्तव में यह श्रमिक-हितैषी दृष्टि से कम-से-कम 6 घंटे प्रतिदिन का मानक होना उपयुक्त रहेगा।

ठोस कदम फिर भी इन सुझावों पर गौर करना जरूरी…

इस तरह, राजस्थान का यह अध्यादेश निश्चित रूप से बच्चों को शीघ्र श्रम-शामिल होने से रोकने तथा किशोरों तथा श्रमिकों के लिए कुछ कार्य-घंटा-सीमाएँ निर्धारित करने की दिशा में एक ठोस कदम है। लेकिन इसे पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है:

  • परिवार-निर्भरता एवं विकल्प-वित्त: यदि परिवार की आय का हिस्सा बच्चों की कमाई पर टिका है, तो काम से हटाना सहज नहीं होगा। ऐसे में सरकार को उन परिवारों को प्रतिस्थापन-आय देने या शिक्षा-काम-स्थानीय परियोजनाओं से जोड़ने का ठोस रोडमैप दिखाना होगा।

  • काल-बहिष्कार कार्य (night-shift) निषेध: किशोरों की सुरक्षित-श्रेणी हेतु रात के कार्यों पर पाबंदी का तर्क स्वीकार्य है, लेकिन इसे उम्र-आधारित कठोर बंधन की बजाय परिस्थिति-आधारित तथा किशोर की स्वायत्तता व परिवार-आवश्यकता के हिसाब से लागू करना होगा।

  • श्रम घंटे सीमा एवं ठेका-प्रणाली: 10-घंटे को व्‍यवस्था की शुरुआत माना जा सकता है, लेकिन इसे श्रमिक-हितैषी मानक (6 घंटे) की ओर बढ़ाना चाहिए। ठेका-श्रमियों की वास्तविक स्थिति के अनुरूप निरीक्षण व कार्य-शुल्क-सुरक्षा की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

  • कार्यान्वयन-मेकानिज्म: केवल कानून या अध्यादेश पारित करना पर्याप्त नहीं है — इसके साथ निरीक्षण, शिकायत-मुकाम, श्रम-विभाग तथा सामाजिक कल्याण विभाग का समन्वय अत्यावश्यक है।

  • वित्त-वित्तीय संसाधन एवं सामाजिक योजनाएं: सरकार ने कल्याण-योजनाएं आरंभ की हैं, लेकिन उनके क्रियान्वित होने, वर्ग-विश्लेषण के आधार पर पहुंचने, तथा बच्चे-मुक्ती एवं परिवार-समर्थन के इरादे को धरातल पर अनुकूल बनाने की दिशा में गति बढ़ानी होगी।

अतः कहा जा सकता है कि इस अध्यादेश की दिशा व मंशा सकारात्मक है, लेकिन यदि इसे समय, संसाधन, परिवार-वित्तीय विकल्प, सामाजिक निरीक्षण एवं श्रमिक-सुरक्षा मापदंडों के बिना लागू किया गया तो यह अधूरी पहल बनकर रह सकती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor