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Thursday, July 9, 2026, 6:58 am

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वर्ल्ड स्ट्रोक डे पर विशेष : भारत में हर 4 मिनट में 1 व्यक्ति को डस रहा स्ट्रोक…एक पल की लापरवाही, ज़िंदगी भर की परेशानी

स्ट्रोक कोई अचानक आने वाली लाइलाज बीमारी नहीं, बल्कि जागरूकता और सही जीवनशैली से पूरी तरह नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति है।…स्ट्रोक आने पर हर सेकंड कीमती है…तुरंत रोगी को अस्पताल ले जाएं और इलाज शुरू करवाएं…।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

“समय ही मस्तिष्क है — हर सेकंड कीमती है।” यह वाक्य स्ट्रोक (Stroke) जैसी गंभीर स्थिति के लिए बिलकुल सही बैठता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्ट्रोक दुनिया में मौत और विकलांगता का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। हर साल लगभग 1.3 करोड़ लोग स्ट्रोक से प्रभावित होते हैं और करीब 60 लाख लोग अपनी जान गंवा देते हैं। भारत में हर चार मिनट में एक व्यक्ति स्ट्रोक से पीड़ित होता है। लेकिन सुखद बात यह है कि—स्ट्रोक को रोकना, पहचानना और समय पर इलाज करना संभव है।

इसी संदेश को फैलाने के लिए हर वर्ष 29 अक्टूबर को ‘वर्ल्ड स्ट्रोक डे’ (World Stroke Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य है — लोगों को यह बताना कि स्ट्रोक कोई अचानक आने वाली लाइलाज बीमारी नहीं, बल्कि जागरूकता और सही जीवनशैली से पूरी तरह नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति है।

स्ट्रोक क्या है?

साधारण भाषा में स्ट्रोक यानी “मस्तिष्काघात” तब होता है जब मस्तिष्क (Brain) के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह अचानक रुक जाता है या वहां रक्तस्राव (Bleeding) हो जाता है। मस्तिष्क की कोशिकाएं ऑक्सीजन की कमी से मरने लगती हैं, जिससे व्यक्ति के शरीर के किसी हिस्से में लकवा, बोलने में कठिनाई, याददाश्त में कमी या मृत्यु तक हो सकती है।

स्ट्रोक के दो मुख्य प्रकार हैं:

  1. इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke):

    • यह सबसे आम प्रकार है (लगभग 85% मामलों में)।

    • इसमें मस्तिष्क की रक्त वाहिका में थक्का (Clot) जम जाता है, जिससे रक्त का प्रवाह बाधित होता है।

  2. हेमरेजिक स्ट्रोक (Hemorrhagic Stroke):

    • इसमें मस्तिष्क की रक्त वाहिका फट जाती है और रक्तस्राव होने लगता है।

    • यह स्थिति अधिक गंभीर होती है और तुरंत चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।

तीसरा प्रकार “ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक” (TIA) या मिनी स्ट्रोक कहलाता है। इसमें लक्षण कुछ मिनटों या घंटों के लिए दिखाई देते हैं और फिर ठीक हो जाते हैं, लेकिन यह भविष्य में बड़े स्ट्रोक का संकेत होता है।

स्ट्रोक के लक्षण — पहचानें और तुरंत कार्रवाई करें

स्ट्रोक का असर अचानक होता है। इसलिए इसके प्रारंभिक लक्षणों की पहचान ही जीवन बचा सकती है। याद रखने के लिए एक सरल सूत्र है — “BE FAST”

अक्षर अर्थ संकेत
B Balance अचानक चक्कर आना या संतुलन बिगड़ना
E Eyes एक या दोनों आंखों की दृष्टि धुंधली होना
F Face चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा पड़ना
A Arms एक हाथ या पैर में कमजोरी या सुन्नपन
S Speech बोली लड़खड़ाना या शब्द अस्पष्ट होना
T Time समय गंवाए बिना तुरंत डॉक्टर या अस्पताल पहुँचना

याद रखिए — हर मिनट की देरी मस्तिष्क की लाखों कोशिकाओं को नष्ट कर सकती है।

स्ट्रोक के प्रमुख कारण और जोखिम कारक

स्ट्रोक एक दिन में नहीं होता; यह धीरे-धीरे पनपता है। इसके पीछे जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े कई कारण होते हैं। प्रमुख जोखिम कारक इस प्रकार हैं:

  • उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) – स्ट्रोक का सबसे बड़ा कारण।

  • शुगर (Diabetes) – रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है।

  • उच्च कोलेस्ट्रॉल (High Cholesterol) – धमनियों में अवरोध पैदा करता है।

  • धूम्रपान और शराब का सेवन – रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं।

  • मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली – हृदय और मस्तिष्क दोनों पर दबाव बढ़ाते हैं।

  • तनाव और नींद की कमी – हार्मोनल असंतुलन से रक्तचाप बढ़ता है।

  • आयु और आनुवंशिक कारण – 55 वर्ष से अधिक उम्र और पारिवारिक इतिहास भी जोखिम बढ़ाते हैं।

स्ट्रोक की रोकथाम — छोटी आदतें, बड़ा फर्क

स्ट्रोक से बचाव किसी दवाई से नहीं, बल्कि जीवनशैली सुधार से होता है। यह रोकथाम पांच मूल सिद्धांतों पर आधारित है:

1. संतुलित आहार अपनाएं
  • भोजन में ताजे फल, हरी सब्जियाँ, साबुत अनाज, ओट्स और प्रोटीन शामिल करें।

  • नमक, चीनी और तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें।

  • लाल मांस की जगह दालें और मछली जैसे विकल्प अपनाएं।

2. नियमित व्यायाम करें
  • रोज़ाना कम से कम 30 मिनट तेज़ चाल से चलें।

  • योग, प्राणायाम और ध्यान मन और शरीर दोनों को संतुलित रखते हैं।

3. धूम्रपान और शराब से दूरी
  • निकोटिन और अल्कोहल मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं को संकुचित करते हैं।

  • इनसे बचना स्ट्रोक की संभावना को आधा कर देता है।

4. नियमित स्वास्थ्य जांच
  • हर छह महीने में रक्तचाप, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच करवाएं।

  • यदि आप पहले से हृदय रोगी हैं, तो चिकित्सक की सलाह से दवाओं का नियमित सेवन करें।

5. तनाव कम करें, नींद पूरी लें
  • स्ट्रोक के कई मामले मानसिक दबाव से जुड़े पाए गए हैं।

  • पर्याप्त नींद और खुशहाल जीवनशैली भी दवा से कम नहीं होती।

स्ट्रोक का उपचार — समय पर इलाज से बचाई जा सकती है ज़िंदगी

स्ट्रोक का उपचार “गोल्डन ऑवर” यानी घटना के पहले 3 से 4 घंटे में शुरू किया जाए तो व्यक्ति पूरी तरह ठीक हो सकता है। उपचार की दिशा स्ट्रोक के प्रकार पर निर्भर करती है।

  1. इस्केमिक स्ट्रोक के लिए:

    • खून के थक्के को घोलने वाली दवाएं (Thrombolytic therapy) दी जाती हैं।

    • कई अस्पतालों में ‘क्लॉट बस्टर’ इंजेक्शन (tPA) का उपयोग किया जाता है।

  2. हेमरेजिक स्ट्रोक के लिए:

    • रक्तस्राव को नियंत्रित करने और मस्तिष्क के दबाव को कम करने की सर्जरी की जाती है।

  3. रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास):

    • फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मानसिक परामर्श के ज़रिए रोगी को सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिलती है।

बेहतर देखभाल — रोगी और परिवार दोनों की भूमिका

स्ट्रोक के बाद व्यक्ति को केवल दवा नहीं, बल्कि समझ और सहानुभूति की ज़रूरत होती है। परिवार के सदस्यों का सहयोग पुनर्वास की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • रोगी को धीरे-धीरे बोलने, चलने और हाथ-पैर चलाने के लिए प्रोत्साहित करें।

  • घर में गिरने या चोट लगने से बचाव के लिए सुरक्षित वातावरण बनाएं।

  • नियमित डॉक्टर परामर्श और दवा का पालन अनिवार्य करें।

  • मानसिक रूप से हिम्मत बढ़ाएं — “तुम ठीक हो जाओगे” ये शब्द चमत्कार कर सकते हैं।

जागरूकता और सामुदायिक पहल — समाज की ज़िम्मेदारी

वर्ल्ड स्ट्रोक डे केवल डॉक्टरों या अस्पतालों का दिन नहीं है। यह हम सबकी सामूहिक चेतना का प्रतीक है। समाज स्तर पर स्ट्रोक से लड़ने के लिए कुछ कदम जरूरी हैं —

  • स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित करना।

  • गांव-गांव तक ‘BE FAST’ जैसी जागरूकता मुहिम चलाना।

  • डिजिटल माध्यमों पर हेल्थ एजुकेशन वीडियो और पोस्टर प्रसारित करना।

  • सरकार और NGO द्वारा स्ट्रोक सेंटरों की संख्या बढ़ाना।

भारत में “इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन” और “नेशनल हेल्थ मिशन” जैसी संस्थाएँ लगातार स्ट्रोक जागरूकता कार्यक्रम चला रही हैं।

वर्ल्ड स्ट्रोक डे 2025 की थीम और संदेश

हर वर्ष वर्ल्ड स्ट्रोक डे एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है। हाल के वर्षों की थीम रही —

“Together we are greater than stroke”
यानी “हम मिलकर स्ट्रोक से बड़े हैं।”

इसका अर्थ है कि यदि समाज, चिकित्सक, परिवार और व्यक्ति — सभी एकजुट हों, तो स्ट्रोक जैसी भयावह बीमारी को हराया जा सकता है।

भारत की स्थिति और आगे की राह

भारत में स्ट्रोक रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 1990 के दशक में जहां स्ट्रोक दर 100,000 आबादी पर लगभग 60 थी, वहीं अब यह 130 से अधिक हो गई है। इसका कारण है — बदलती जीवनशैली, शहरी तनाव, जंक फूड और शारीरिक निष्क्रियता।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति सुधार की ओर भी है।

  • मेट्रो शहरों में स्ट्रोक अलर्ट सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।

  • टेलीमेडिसिन सुविधाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन परामर्श उपलब्ध करा रही हैं।

  • सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष्मान भारत स्ट्रोक पीड़ितों को मुफ्त इलाज मुहैया करा रही हैं।

आशा का संदेश — समय रहते संभलें

स्ट्रोक से बचाव कठिन नहीं है। यह वही बीमारी है जो हमें जीवन की प्राथमिकताओं पर फिर से सोचने का अवसर देती है।

  • क्या हम अपने शरीर की चेतावनियों को अनदेखा कर रहे हैं?

  • क्या हमने अपने स्वास्थ्य को ‘समय न होने’ के बहाने टाल दिया है?

उत्तर यदि ‘हाँ’ है, तो यही पल सुधार का है।

“सावधानी ही सुरक्षा”

स्ट्रोक का कोई पूर्वाभास नहीं देता, लेकिन इसकी रोकथाम हमारे हाथ में है। यदि हम संतुलित जीवनशैली, नियमित व्यायाम, मानसिक शांति और समय पर चिकित्सा को अपनाएँ — तो हम न केवल स्ट्रोक से बल्कि अनेक बीमारियों से बच सकते हैं।

वर्ल्ड स्ट्रोक डे 2025 हमें यही याद दिलाता है कि —

“स्ट्रोक एक चुनौती है, पर उससे लड़ने की ताकत हमारे भीतर है।”

आइए, इस दिन हम संकल्प लें —

-अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्वयं उठाएँ,
-परिवार और समाज में जागरूकता फैलाएँ,
-और हर व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचाएँ कि —
“समय पर पहचान, समय पर उपचार — यही है स्ट्रोक से जीत का रहस्य।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor