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Thursday, July 9, 2026, 6:51 am

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“ईर्ष्या नहीं, उत्साह रखो; तुलना नहीं, तपस्या करो; दूसरों से नहीं, स्वयं से बेहतर बनो — यही सच्चा धर्म है।”

ईर्ष्या से मुक्ति : आत्मविकास की सच्ची साधना- गीता, उपनिषद, वेद और दर्शन के आलोक में एक मानवीय आलेख

लेखिका : राखी पुरोहित. एडिटर इन चीफ

मनुष्य जब स्वयं की तुलना दूसरों से करने लगता है, तो उसकी शांति क्षीण होने लगती है। यह तुलना ही आगे चलकर ईर्ष्या (Jealousy) के रूप में प्रकट होती है। ईर्ष्या कोई बाहरी शत्रु नहीं, यह तो भीतर की वह आग है जो स्वयं के ही अस्तित्व को धीरे-धीरे भस्म करती जाती है।
भारतीय शास्त्रों ने इसे ‘आत्मदाहक दोष’ कहा है। महाभारत में कहा गया है —

“अन्यस्य सुखे दुःखी, परदुःखे सुखी नरः।
स पापी नरकं याति, ईर्ष्यालुर्भूतदु:खदः॥”

अर्थात जो दूसरों के सुख में दुःखी और उनके दुःख में सुखी होता है, वह नरक में गिरता है, क्योंकि ईर्ष्या से किसी और का नहीं, स्वयं का अहित होता है।

गीता का दृष्टिकोण : स्वधर्म और आत्म-संतोष का मार्ग

भगवद्गीता  में श्रीकृष्ण अर्जुन को यही सिखाते हैं कि मनुष्य को दूसरों से नहीं, स्वयं से स्पर्धा करनी चाहिए।
गीता (अध्याय 3, श्लोक 35) में कहा गया है –

“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।”
— अर्थात, अपना धर्म चाहे दोषयुक्त हो, पर दूसरों के धर्म का अनुकरण करने से श्रेष्ठ है।

यहाँ “धर्म” से आशय केवल कर्म नहीं, बल्कि व्यक्ति की अंतर्निहित प्रकृति से है। प्रत्येक मनुष्य की अपनी गति, अपनी क्षमता और अपना मार्ग होता है। जब हम दूसरों से तुलना करते हैं, तब हम अपनी ही स्वाभाविकता को खो देते हैं।

गीता (अध्याय 12, श्लोक 13-14) में भगवान कहते हैं —

“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”
“निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।”

यहाँ “अद्वेष्टा” शब्द का अर्थ है — किसी से द्वेष या ईर्ष्या न करना। सच्चा भक्त वही है जो दूसरों से द्वेष नहीं रखता, बल्कि मैत्री और करुणा के भाव से देखता है।

इस प्रकार, गीता हमें सिखाती है कि जब हम तुलना छोड़ देते हैं, तो भीतर का संतोष (संतोषः परं सुखम्) जाग्रत होता है। संतोष ही वह अवस्था है जहाँ आत्मा को स्थिरता और प्रसन्नता मिलती है।

उपनिषदों का दृष्टिकोण : आत्मज्ञान की ज्योति

ईर्ष्या की जड़ अज्ञान में है — जब व्यक्ति यह भूल जाता है कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा का अंश है। ईशोपनिषद का प्रथम मंत्र कहता है —

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत्।”

अर्थात, यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है। जब सबमें ईश्वर ही विद्यमान है, तो ईर्ष्या का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
कठोपनिषद कहता है —

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”
अर्थात, उठो, जागो और सत्य को जानो।

यह जागरण केवल बाहरी नहीं, भीतरी है। जब व्यक्ति भीतर की ज्योति को पहचान लेता है, तब वह समझ जाता है कि तुलना करना व्यर्थ है, क्योंकि प्रत्येक आत्मा का मार्ग अलग है।

छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है —

“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
— “तू वही है” — अर्थात, जो ब्रह्मांड में सर्वोच्च है, वही तुझमें भी विद्यमान है।

यह ज्ञान मिलते ही ईर्ष्या का स्थान आत्मविश्वास ले लेता है। तुलना का स्थान स्वीकार्यता ले लेती है, और मनुष्य अपने मार्ग पर निश्चिंत होकर चलता है।

वेदों का संकेत : एकता में आत्मबोध

वेदों में बार-बार यह भाव व्यक्त किया गया है कि समस्त सृष्टि एक ही ब्रह्म का विस्तार है। ऋग्वेद में कहा गया —

“एकोऽहम् बहुस्याम्।”
— “मैं एक हूँ, अनेक रूपों में प्रकट हूँ।”

यदि सबमें वही परम सत्ता है, तो ईर्ष्या करना उसी सत्ता का अपमान है जो हमारे भीतर भी है।
वेद हमें यह सिखाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक जीव अपने स्तर पर ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है।
जिस क्षण यह अनुभूति होती है, ईर्ष्या मिट जाती है और स्थान लेता है “सहअस्तित्व” का भाव।

दार्शनिक दृष्टिकोण : तुलना की व्यर्थता

1. आदिशंकराचार्य का अद्वैत दर्शन

शंकराचार्य का कहना था —

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
जब जीव और ब्रह्म में भेद नहीं, तब किसी से ईर्ष्या कैसी?
दूसरे का उत्कर्ष, अपने ही स्वरूप का उत्कर्ष है। अतः तुलना नहीं, अनुभव आवश्यक है।

2. स्वामी विवेकानंद

उन्होंने कहा था —

“आप अपने आप में विश्वास कीजिए और यह समझिए कि आपके भीतर असीम शक्ति है।”
स्वामीजी का मानना था कि ईर्ष्या आत्मविश्वास की कमी से जन्म लेती है। जब व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेता है, तब वह किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करता, बल्कि अपनी क्षमताओं को निखारने लगता है।

3. महात्मा गांधी

गांधीजी ने कहा —

“दुनिया में सबके लिए पर्याप्त है, पर किसी एक की ईर्ष्या या लालच के लिए नहीं।”
गांधी का अपरिग्रह सिद्धांत इसी बात का प्रतीक है कि जब हम दूसरों की संपत्ति, स्थिति या प्रतिभा से ईर्ष्या करते हैं, तब हम अपने भीतर की शांति खो देते हैं।

4. अरस्तू और सुकरात

पाश्चात्य दर्शन में भी यह बात प्रतिध्वनित होती है।
अरस्तू ने कहा था —

“Envy is the pain at the sight of another’s good fortune.”
सुकरात का मत था कि तुलना मनुष्य की आत्मा को अस्थिर करती है।
उनके अनुसार सच्ची बुद्धिमत्ता तब आती है जब मनुष्य जानता है कि “मुझे स्वयं को जानना है”, न कि “दूसरों जैसा बनना है।”

मानवीय दृष्टि से : ईर्ष्या के परिणाम

ईर्ष्या का प्रभाव केवल आध्यात्मिक नहीं, मानसिक और शारीरिक स्तर पर भी पड़ता है।
आज मनोविज्ञान भी मानता है कि ईर्ष्या से तनाव, अनिद्रा, अवसाद, और आत्महीनता बढ़ती है।
यह व्यक्ति को अपने उद्देश्य से भटकाकर दूसरों के जीवन में उलझा देती है।
जबकि सफलता और सुख का मूल सूत्र है —

“Focus on your path, not on your neighbor’s garden.”

आत्म-विकास की राह : स्वयं से प्रतिस्पर्धा

स्वयं से प्रतिस्पर्धा करना ही सच्चा विकास है।
गीता का एक और सूत्र कहता है —

“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” (अध्याय 6, श्लोक 5)
— “मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपने द्वारा ही अपने को ऊपर उठाए, न कि नीचे गिराए।”

जब व्यक्ति अपनी क्षमताओं को सुधारने में लग जाता है, तब दूसरों की सफलता उसे प्रेरणा लगती है, न कि जलन का कारण।
स्वयं के भीतर झांकना, स्वयं को समझना, और अपने दोषों को सुधारना — यही आत्म-साधना का मार्ग है।

कथाओं के माध्यम से समझें

1. अर्जुन और कर्ण की कथा

कर्ण अर्जुन से श्रेष्ठ योद्धा था, परंतु ईर्ष्या ने उसके जीवन को विषाक्त कर दिया।
दूसरी ओर अर्जुन ने कभी कर्ण की तुलना नहीं की, वह केवल अपने गुरु के आदेशों पर केंद्रित रहा।
इसलिए अर्जुन विजयी हुआ, और कर्ण अपने ही द्वेष में पराजित।

2. एक बौद्ध कथा

एक बार बुद्ध से एक शिष्य ने पूछा — “गुरुदेव, मैं अपने मित्र की सफलता देखकर जलता हूँ, क्या करूँ?”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले —

“जिसे तुम अपना शत्रु समझ रहे हो, वह तुम्हारा शिक्षक है। वह तुम्हें बता रहा है कि अभी तुम्हें कितना बढ़ना है।”
यह उत्तर सुनते ही शिष्य की ईर्ष्या मिट गई और उसने मित्र को गुरु समान मानकर आत्म-सुधार का संकल्प लिया।

ईर्ष्या से मुक्ति के उपाय

  1. स्वीकार्यता (Acceptance): हर व्यक्ति की यात्रा अलग है। कोई जल्दी पहुँचता है, कोई देर से। परंतु सबका गंतव्य एक ही है — आत्म-बोध।

  2. कृतज्ञता (Gratitude): जो मिला है, उसके लिए आभार व्यक्त करें। कृतज्ञ व्यक्ति कभी ईर्ष्यालु नहीं होता।

  3. ध्यान और साधना: ध्यान से मन स्थिर होता है और तुलना की प्रवृत्ति घटती है।

  4. सेवा का भाव: जब हम दूसरों की भलाई में लगते हैं, तो ईर्ष्या स्वतः मिट जाती है।

  5. अभ्यास (Practice of Self-Reflection): रोज रात स्वयं से पूछें — “आज मैंने किससे तुलना की? क्या मैंने स्वयं को बेहतर बनाया?”

समाज के लिए संदेश : ईर्ष्या से सहयोग की ओर

यदि समाज में हर व्यक्ति यह समझ ले कि दूसरों की सफलता, समाज की सामूहिक प्रगति का प्रतीक है, तो प्रतिस्पर्धा सहयोग में बदल जाएगी।
वेदों का मंत्र है —

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
— “मिलकर चलो, मिलकर बोलो, मिलकर सोचो।”

जब यह भावना हृदय में आती है, तो समाज में न ईर्ष्या रहती है, न द्वेष — केवल प्रगति, प्रेम और शांति का प्रसार होता है।

अपने भीतर का दीपक जलाएं

मनुष्य के भीतर अनंत संभावनाएँ हैं। पर ईर्ष्या उस दीपक पर कालिख की तरह है जो प्रकाश को धुंधला कर देती है।
गीता, वेद और उपनिषद हमें यही सिखाते हैं —

“स्वयं को जानो, स्वयं को साधो, और स्वयं को निखारो।”

दूसरों की सफलता से प्रेरणा लो, पर अपने मार्ग पर अडिग रहो।
क्योंकि अंततः,

“तुलना आत्मा को बाँधती है, और आत्मज्ञान उसे मुक्त करता है।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor