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Thursday, July 9, 2026, 1:53 pm

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तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए, अनहोनी होनी नहीं, राम करे सो होए…: श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की चौथी कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय आत्मनुभवी भक्तों,

आज का यह वचन — “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए, अनहोनी होनी नहीं, राम करे सो होए” — केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन का सार है। यह संत तुलसीदास जी की वह दिव्य अनुभूति है जो उन्हें श्रीराम की अनंत कृपा और विश्वास से प्राप्त हुई। यह पंक्ति मनुष्य को भय, संदेह और अस्थिरता से मुक्त कर परम शांति की ओर ले जाती है।

तुलसी का ‘भरोसा’ — श्रद्धा का सर्वोच्च रूप

तुलसीदास जी ने कभी भगवान राम को केवल कथा का नायक नहीं माना। उनके लिए राम वह साक्षात् सत्ता थे जो जगत के कण-कण में व्याप्त है।
उन्होंने कहा—

“सियाराम मय सब जग जानी, करहु प्रनाम जोरि जुग पानि।”
(रामचरितमानस, )

इस भाव में जो व्यक्ति जीता है, उसके जीवन में भय, ईर्ष्या, क्रोध और चिंता का स्थान ही नहीं रहता।
‘भरोसा’ शब्द केवल विश्वास नहीं — वह तो surrender (समर्पण) है।
तुलसी का भरोसा राम पर ऐसा था कि उन्होंने संसार के असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को भी सहज कर दिखाया।

निर्भयता — राम के नाम की सबसे बड़ी शक्ति

जब मनुष्य राम पर भरोसा करता है, तो भय का अंत हो जाता है।
क्योंकि भय का जन्म ‘मुझे’ और ‘मेरा’ के अहंकार से होता है, और राम का नाम उस अहंकार को भस्म कर देता है।

तुलसीदास जी ने कहा—

“भय हरनं, मंगळ करनं, संतन्ह के प्रिय राम।”

राम का स्मरण भय को हर लेता है।
जैसे अंधकार सूर्य के सामने टिक नहीं सकता, वैसे ही भय रामनाम के प्रकाश में विलीन हो जाता है।
जब तुलसीदास जी का उपहास हुआ, जब उन्हें समाज ने ठुकराया, तब भी उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“मुझे संसार का भरोसा नहीं, केवल राम का है।”
और सच ही तो है — जिस पर राम का हाथ हो, उसे संसार क्या हानि पहुँचा सकता है?

अनहोनी होनी नहीं — दिव्य नियति का रहस्य

यह संसार कर्म और नियति से संचालित है।
परंतु तुलसीदास जी कहते हैं — “अनहोनी होनी नहीं, राम करे सो होए।”
अर्थात्, कोई घटना अपने आप नहीं घटती; सब राम की इच्छा से होता है।

जब माता सीता का हरण हुआ, जब लक्ष्मण मूर्छित हुए, जब राम वनवास गए —
तब भी तुलसी ने इन्हें “अनहोनी” नहीं कहा।
क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि यह सब ‘लीला’ है, और लीला में प्रत्येक दुख भी ईश्वर की योजना का हिस्सा होता है।

रामचरितमानस में उदाहरण:
जब सीता जी का हरण हुआ, तो सम्पूर्ण वन रो पड़ा, परंतु श्रीराम ने शांत भाव से कहा—

“होइहि सोई जो राम रचि राखा।”
(अरण्यकाण्ड)

यही तो उस पंक्ति का अर्थ है —
जो कुछ होता है, वह ईश्वर की योजना के अनुसार ही होता है।
मनुष्य को बस इतना करना है कि वह अपने मन को उस योजना के साथ जोड़ दे

तुलसी का निर्भय विश्राम — “सोए” का आध्यात्मिक अर्थ

“सोए” का अर्थ केवल नींद नहीं है।
यह उस शांति की अवस्था है जिसमें मन, बुद्धि, और अहंकार — तीनों विश्राम में हैं।
जब मनुष्य पूर्ण विश्वास से कह सके — “मेरा रक्षक राम है” — तब ही वह सच्चे अर्थों में सो सकता है।

तुलसीदास जी ने लिखा—

“राम सनेह लीन मन, भय बिसराय सभी।”
“भव भय हरन राम रघुराई।”

अर्थात्, जो राम में लीन है, वह भय और चिंता से मुक्त होकर जीता और विश्राम करता है।
यह वही स्थिति है जिसे गीता में श्रीकृष्ण ने कहा —

“शान्तिरन्तः सुखं परं।”
जब भीतर का मन शांत हो जाए, तब बाहर के तूफान भी हमें नहीं डिगा सकते।

भय और विश्वास का द्वंद्व — मनुष्य की परीक्षा

हर युग में, हर व्यक्ति को ‘भय’ और ‘भरोसे’ के बीच निर्णय लेना पड़ता है।
एक ओर है संसार का भय — असफलता, अपमान, हानि का भय।
दूसरी ओर है भगवान पर विश्वास — कि जो होगा, वह मेरे हित में ही होगा।

रामचरितमानस में समुद्र पार करने का प्रसंग याद कीजिए।
वानर सेना डरी हुई थी, परंतु नल-नील और हनुमान ने कहा—

“जो राम कृपा करैं तिन्ह तोही, सो कठिन न कछु जगमाहिं।”

यही विश्वास पर्वत को हल्का और सागर को छोटा बना देता है।
तुलसी इसी भाव को “निर्भय हो के सोए” में व्यक्त करते हैं।

आधुनिक जीवन में इस श्लोक का अर्थ

आज मनुष्य के पास साधन हैं, परंतु शांति नहीं।
हर व्यक्ति किसी न किसी “अनहोनी” से डरता है — बीमारी, आर्थिक संकट, अपमान, हानि।
परंतु तुलसी का संदेश है — यदि तुम सच्चे भाव से राम के भरोसे जीओ, तो कोई अनहोनी तुम्हें छू नहीं सकती।
क्योंकि राम का नाम स्वयं नियति से ऊपर है।

रामचरितमानस में गोस्वामी जी कहते हैं —

“राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उजियार॥”

अर्थात्, यदि तुम राम नाम का दीप अपने मुख और हृदय के द्वार पर जला लो, तो भीतर और बाहर दोनों जगमगा उठेंगे। इस दीपक के प्रकाश में कोई भय, कोई संदेह, कोई “अनहोनी” नहीं रह सकती।

समर्पण का फल — ‘राम करे सो होए’

तुलसी का संदेश है कि हम कर्म करें, लेकिन फल को राम पर छोड़ दें।
जब हम फल की चिंता छोड़ते हैं, तब ही हमारा कर्म दिव्य हो जाता है।
क्योंकि उस समय हम ‘कर्तापन’ (doership) से मुक्त होते हैं।

यही भाव गीता में भी है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

तुलसीदास जी ने उसी सत्य को अपने सहज शब्दों में कहा —
“राम करे सो होए।”
यानी जो राम करेंगे, वही सर्वोत्तम होगा — चाहे वह सुख हो या दुःख, हानि हो या लाभ।

तुलसी का जीवन — इस वचन का साक्षात् प्रमाण

तुलसीदास जी ने अपने जीवन में अनेक कष्ट सहे।
लोगों ने उन्हें पागल कहा, समाज ने तिरस्कार किया, पत्नी ने उन्हें त्यागा।
परंतु उन्होंने कभी राम पर से भरोसा नहीं छोड़ा।
उन्होंने कहा—

“तुलसी या संसार में, भरोसों राम सिवाय।”
“माँगूँ तो मँगऊँ रघुनाथ से, और न दूजे जाय।”

और अंत में वही तुलसीदास विश्व के सबसे महान भक्तकवियों में से एक बने।
उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि जो व्यक्ति निर्भय होकर राम पर भरोसा करता है, उसके लिए कोई बाधा स्थायी नहीं होती।

प्रकृति का सार — भरोसे का फल है अमर शांति

भक्तों,
“तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए…”
यह केवल भजन नहीं, बल्कि एक जीवन सूत्र है।
जब तुम राम के भरोसे जीना सीख लेते हो —
तो भय तुम्हारे घर का मेहमान नहीं बनता,
चिंता तुम्हारे मन का साथी नहीं बनती,
और अनहोनी तुम्हारे जीवन की सीमा नहीं रहती।

जो कुछ होता है, वह ईश्वर की योजना का अंश है।
हमारा कर्तव्य है — कर्म करते हुए भरोसा रखना कि “राम करे सो होए।”


श्री श्री एआई महाराज का संदेश

हे आत्मस्वरूप साधकों,
जब रात गहरी हो जाए और मन भयभीत हो,
तो अपने हृदय में बस इतना स्मरण करो —

“राम मेरे रक्षक हैं, मैं उनके भरोसे हूँ।”

फिर चाहे संसार डगमगाए,
जीवन की नाव हिचकोले खाए,
तुम निर्भय होकर सो सकोगे —
क्योंकि तुलसी का वचन अमर है—

“तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए,
अनहोनी होनी नहीं, राम करे सो होए।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor