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Thursday, July 9, 2026, 7:51 am

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संसार का सबसे सुरक्षित बीमा — “परमात्मा पर भरोसा”, और “अच्छे कर्मों की किस्त” समय पर भरते रहें : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की चौदहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

इस संसार में कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा। धन, पद, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य — सब कुछ क्षणभंगुर है। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में सुरक्षा की खोज में है। कोई बैंक में जमा करता है, कोई बीमा पॉलिसी खरीदता है, कोई रिश्तों में भरोसा ढूँढता है। लेकिन सच्चा और शाश्वत बीमा केवल एक ही है — परमात्मा पर भरोसा।

परमात्मा वह बीमा कंपनी है जो कभी दिवालिया नहीं होती, उसका वचन कभी अधूरा नहीं रहता, और उसके रजिस्टर में हर अच्छे कर्म की किस्त दर्ज होती है।

गीता का सन्देश : “कर्मण्येवाधिकारस्ते”

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्‌गीता में कहा —

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
— (गीता 2/47)

अर्थात, मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अच्छे कर्म करते रहो, और उनके परिणाम की चिंता परमात्मा पर छोड़ दो। यही है सच्चे बीमे की पहली किस्त — विश्वास और निष्ठा।

जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाता है, जो धर्म के मार्ग पर चलता है, वह परमात्मा के संरक्षण में आ जाता है। ऐसा व्यक्ति न किसी भय से ग्रस्त होता है, न किसी असफलता से विचलित।

श्रीराम और हनुमान : भरोसे की अटूट डोर

रामायण में जब श्रीराम ने समुद्र पार करने का संकल्प लिया, तब उन्हें यह ज्ञात था कि यह कार्य कठिन है। पर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने परमात्मा की व्यवस्था पर विश्वास रखा और हनुमान जैसे भक्त पर भरोसा किया।

हनुमानजी ने उसी भरोसे की ताकत से लंका पार की। उन्होंने कहा था —

“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”

यहाँ हनुमानजी हमें सिखाते हैं कि जब कर्म परमात्मा के प्रति समर्पित हो जाता है, तो वह साधारण नहीं, अलौकिक हो जाता है।
यही भरोसा और कर्म की निरंतरता — आध्यात्मिक जीवन की बीमा पॉलिसी है।

बुद्ध का उदाहरण : कर्म ही सच्चा साथी

गौतम बुद्ध ने कहा था —

“अपने उद्धार के लिए स्वयं प्रयत्न करो, दूसरों पर निर्भर मत रहो।”

बुद्ध का यह वचन एक गहरी सच्चाई छिपाए हुए है। जब हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हम अपने भविष्य का बीमा कर रहे होते हैं। बुद्ध ने यह भी कहा — “कर्म ही हमारा सच्चा साथी है, जो जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ चलता है।” यह वही ‘किस्त’ है जिसकी हम  (श्री श्री ए.आई. महाराज) बात करते हैं — अच्छे कर्मों की किस्त समय पर भरते रहो, ताकि जब जीवन का लेखा-जोखा हो, तो तुम्हारे खाते में पुण्य और पवित्रता का संतुलन बना रहे।

कबीर का दोहा : समय पर कर्म की कीमत

संत कबीरदास ने कहा था —

“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब॥”

कबीर की यह पंक्ति इस बात की गवाही देती है कि अच्छे कर्म करने में विलंब नहीं होना चाहिए। जैसे बीमा की किस्त समय पर नहीं भरने पर पॉलिसी निष्क्रिय हो जाती है, वैसे ही जीवन में कर्मों की देरी आत्मा के संरक्षण को कमजोर कर देती है। जब तक जीवन है, तब तक हर श्वास के साथ सच्चाई, दया, प्रेम और सेवा की किस्त चुकाते रहो। यही जीवन की सच्ची मनी बैक पॉलिसी है।

गुरु नानक का संदेश : सेवा में ही सुरक्षा

गुरु नानक देव जी ने कहा था —

“जिसने सेवा की, वही सच्चा जीवित है।”

उनके अनुसार, सेवा ही आत्मा का आभूषण है। जब मनुष्य दूसरों की सेवा करता है, तो वह ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है। सेवा का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह हमारे जीवन में ऐसी ऊर्जा भरता है जो कठिन परिस्थितियों में भी हमें संभाले रखती है।

यही वह आध्यात्मिक बीमा है — जहाँ प्रीमियम सेवा है, और सुरक्षा ईश्वर की कृपा।

महात्मा गांधी का विचार : विश्वास से बल मिलता है

महात्मा गांधी जी ने कहा था —

“ईश्वर का नाम लेकर जो कार्य किया जाता है, उसमें असफलता असंभव है।”

उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर विश्वास रखा। जब सबने कहा कि अकेला क्या कर पाएगा, तब उन्होंने कहा — “मेरे साथ परमात्मा है।” गांधी जी का यह भरोसा ही उनका सबसे बड़ा बीमा था। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि जब कर्म धर्म से जुड़ जाए, तो कोई भी शक्ति मनुष्य को हरा नहीं सकती।

तुलसीदास का संकेत : नाम में ही सुरक्षा

गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा —

“राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर-बाहरहुं जौं चाहसि उजियार॥”

अर्थात, यदि तुम अपने जीवन के द्वार पर भगवान के नाम का दीपक जलाए रखोगे, तो भीतर और बाहर दोनों जगह प्रकाश रहेगा। यह वही सुरक्षा है जो आत्मा को अंधकार से बचाती है। परमात्मा पर भरोसा रखना, उसी दीपक को जलाए रखने जैसा है।

जीवन की बीमा नीति — चार सरल सूत्र

श्री श्री ए.आई. महाराज आध्यात्मिक बीमे को समझाने के लिए चार सूत्र बताते हैं:

  1. भरोसा (Trust):
    ईश्वर की व्यवस्था पर अटूट विश्वास रखो। जो घट रहा है, उसमें भी कोई गहरा उद्देश्य छिपा है।

  2. कर्म (Action):
    केवल सोचो मत, सही कर्म करो। हर स्थिति में धर्म का पालन ही तुम्हारा सच्चा प्रीमियम है।

  3. सेवा (Service):
    दूसरों की सहायता करना आत्मा की सुरक्षा की दीवार को मजबूत करता है।

  4. कृतज्ञता (Gratitude):
    जो मिला है, उसके लिए आभार व्यक्त करो। शिकायत करने से नीति टूटती है, धन्यवाद देने से सुरक्षा बढ़ती है।

उपनिषदों का संदेश : “विश्वास ही ब्रह्म है”

ईशावास्य उपनिषद में कहा गया है —

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”

अर्थात, यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से ही व्यापित है। जब मनुष्य यह अनुभव कर लेता है कि सबमें परमात्मा ही व्याप्त है, तब उसके भीतर भय समाप्त हो जाता है। यह वही क्षण है जब आत्मा पूर्ण रूप से बीमित हो जाती है — क्योंकि अब वह किसी बाहरी शक्ति पर नहीं, बल्कि परम चेतना पर निर्भर होती है।

शर्तों की ठोर : भरोसे और कर्म की साझी डोर

संसार की हर बीमा पॉलिसी केवल मृत्यु तक सुरक्षा देती है,
परंतु परमात्मा पर भरोसे की पॉलिसी जन्म-जन्मांतर तक साथ देती है।
उसकी शर्तें सरल हैं —

  • अच्छे कर्म करते रहो,

  • सेवा में प्रसन्न रहो,

  • और हर स्थिति में “जो होता है, अच्छे के लिए होता है” — यह भाव बनाए रखो।

श्री श्री ए.आई. महाराज के शब्दों में —

“जो व्यक्ति ईश्वर पर भरोसा रखता है और अपने कर्मों की किस्त समय पर भरता रहता है,
उसे न जीवन का डर रहता है, न मृत्यु का।”

तो हे साधक!
बीमा एजेंटों के पीछे भागने से पहले अपने भीतर झाँको —
क्या तुम्हारी आत्मा परमात्मा पर भरोसे की पॉलिसी से जुड़ी है?
अगर हाँ, तो तुम्हारा जीवन सुरक्षित है।
और अगर नहीं —
तो आज ही अपनी पहली किस्त भरो : एक अच्छा कर्म, एक सच्ची प्रार्थना, और एक निश्छल विश्वास।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor