(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की सत्रहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय भक्तों, साधकों और सत्य प्रेमियों,
आज का यह पवित्र सत्संग एक अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन-सिद्धांत पर आधारित है —“छोटे-बड़े का विचार त्याग कर, अच्छे गुण सभी से ग्रहण करने की कोशिश करें।”
यह वाक्य केवल एक नैतिक सलाह नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का मूल तत्व है। हमारे शास्त्रों, उपनिषदों, पुराणों तथा महान संतों ने बार-बार कहा है कि ज्ञान, सद्गुण और प्रेरणा किसी एक वर्ग, आयु, जाति, पद या स्थिति की बपौती नहीं है। प्रकृति हम सबको सिखाती है, दुनिया में हर व्यक्ति हमारे लिए एक गुरु है—बशर्ते हमारे भीतर विनम्रता हो, ग्रहणशीलता हो।
1. विनम्रता—सद्गुण ग्रहण करने का द्वार
महाभारत में युधिष्ठिर से पूछा गया—“धर्म क्या है?”
उन्होंने कहा—“धर्म वही है जो अहंकार को घटाए और विनम्रता को बढ़ाए।”
जब मनुष्य अपने भीतर बड़े-छोटे का भेद रखता है, वह सीखने की क्षमता खो देता है।
अहंकारी व्यक्ति की समस्या यह है कि वह सोचता है—”मैं जानता हूँ”;
विनम्र व्यक्ति का आशीर्वाद यह है कि वह कहता है—”मैं सीख सकता हूँ।”
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—
“विद्या विनयेन शोभते।”
ज्ञान विनम्रता से ही शोभा पाता है।
जब विनम्रता आती है, तब व्यक्ति हर किसी से सीखने लगता है—कभी बच्चें से, कभी बूढ़े से, कभी किसान से, कभी संत से, कभी यहाँ तक कि एक अज्ञानी व्यक्ति से भी।
2. छोटी-सी चींटी भी गुरु है
हमारे ग्रंथों में कहा गया है—
“पंचतंत्र की कथाएं दर्शाती हैं कि प्राणी कोई भी क्यों न हो, उसके भीतर सीख का खजाना छिपा है।”
चींटी जैसी छोटी प्राणी हमें क्या सिखाती है?
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निरंतर परिश्रम
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टीमवर्क
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कभी हार न मानने का संकल्प
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भविष्य के लिए तैयारी
क्या हम इन गुणों को स्वयं में उतार पाए हैं?
कई बार एक प्रोफेसर भी यह नहीं सिखा सकता, जो एक मूक जीव अपनी मेहनत से सिखा देता है।
इसीलिए प्राचीन ऋषियों ने कहा—
“निंदक से विनम्रता, मूर्ख से धैर्य, ज्ञानी से ज्ञान, और बालक से सरलता ग्रहण करो।”
3. भगवान दत्तात्रेय का 24 गुरुओं का रहस्य
दत्तात्रेय भगवान को “आदिगुरु” कहा जाता है।
लेकिन उनके गुरु कौन थे?
किसी एक महर्षि, किसी एक आश्रम या किसी एक परंपरा के नहीं,
बल्कि उन्होंने पूरी प्रकृति को अपना गुरु बनाया।
उनके 24 गुरु थे—
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, समुद्र, पर्वत, सर्प, मकड़ी, कबूतर, हाथी, हिरण… यहाँ तक कि एक वेश्या भी!
इनमें कुछ छोटे भी थे, कुछ बड़े भी, कुछ निर्जीव भी।
पर दत्तात्रेय जी ने छोटे-बड़े का विचार नहीं किया;
उन्होंने केवल गुण देखा।
यदि भगवान स्वयं प्रकृति के सबसे सरल प्राणियों से सीख सकते हैं,
तो हम मनुष्य क्यों नहीं?
4. महान संतों की परंपरा—सबसे सीखना
कबीरदासजी कहते हैं—
“साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सिरीत,
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय।”
सूप की तरह बनो—जो गेहूँ रखता है, भूसा उड़ा देता है।
अर्थात हर जगह से केवल गुण ग्रहण करो, दोष नहीं।
महात्मा गांधी को देखें—
उन्होंने सत्य मुसलमान मित्र अबुल कलाम से सीखा,
अहिंसा जैन साधुओं से सीखी,
आत्मबल गीता से लिया,
सरल जीवन सेवा-समाज से सीखा।
उन्होंने कभी नहीं कहा—”मैं केवल इस धर्म या इस वर्ग से ही सीखूँगा।”
स्वामी विवेकानंद भी कहते हैं—
“क्षमता किसी की भी हो सकती है,
ज्ञान किसी के भी भीतर हो सकता है।
बुद्धिमान वही है जो हर किसी से सीख लेता है।”
5. छोटे से छोटे व्यक्ति में अद्भुत सीख
जीवन में कभी-कभी सबसे मूल्यवान सीख उन लोगों से मिलती है जिन्हें समाज “छोटा” मानता है।
दर्जी सिखाता है — हर चीज़ को जोड़ने से ही आकार बनता है।
कुम्हार सिखाता है — मिट्टी को गूंथे बिना आकार नहीं मिलता।
मांझी सिखाता है — नदी पार करनी हो तो संतुलन और धैर्य जरूरी है।
माली सिखाता है — फूल तभी खिलते हैं जब रोज निगरानी और पोषण मिले।
बच्चा सिखाता है — मुस्कुराने के लिए कोई कारण नहीं चाहिए।
अगर हम इनसे सीखना शुरू कर दें तो जीवन कितना सहज, सरल और सुंदर हो जाएगा।
6. बड़े-बड़े का अभिमान हमें छोटा कर देता है
अहंकार व्यक्ति को गिराता है।
सीखने की प्रक्रिया वहीं से रुक जाती है जहाँ अहंकार शुरू होता है।
शास्त्र कहते हैं—
“जिसे लगता है कि वह जान गया, वही सबसे अज्ञानी है।”
एक कहानी आती है—
एक विद्वान नदी पार करने के लिए नाव में बैठा।
उसने नाविक से पूछा—“क्या तुमने वेद पढ़े हैं?”
नाविक बोला—“नहीं।”
विद्वान हँसा और बोला—“तो तुम्हारा आधा जीवन व्यर्थ गया।”
कुछ देर बाद नाव तूफान में फँस गई।
नाविक बोला—“क्या आपने तैरना सीखा है?”
विद्वान बोला—“नहीं।”
नाविक ने कहा—“तो आपका पूरा जीवन व्यर्थ होने वाला है!”
ज्ञान केवल पुस्तकों का नहीं, अनुभव का भी होता है।
7. गुण ग्रहण करना—जीवन बदलने की कला
हम लोग अक्सर व्यक्ति को उसके पद, वेशभूषा, पहचान, जाति या आयु से आंक लेते हैं।
लेकिन गुण तो वहाँ भी मिल जाते हैं जहाँ हम उन्हें देखने की सोचते ही नहीं।
याद रखिए—
सूरज हर किसी पर चमकता है—छोटे पर भी, बड़े पर भी।
बारिश हर खेत को सींचती है—उपजाऊ भी, बंजर भी।
हवा सबके लिए बहती है।
प्रकृति हमें सिखाती है—
जो गुणवान है, वही महान है,
जो विनम्र है, वही ज्ञानी है,
जो सीखता है, वही आगे बढ़ता है।
8. सद्गुण ग्रहण करने का अभ्यास
अगर आप वास्तव में इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं, तो तीन अभ्यास अपनाएँ—
(1) प्रतिदिन किसी एक व्यक्ति से एक अच्छाई सीखें
चाहे वह परिवार का सदस्य हो, सहकर्मी हो, बच्चा हो, रिक्शावाला हो, दुकानदार हो—
हर किसी से एक गुण लें।
(2) अपनी प्रशंसा कम, दूसरों की प्रशंसा अधिक करें
जहाँ नम्रता आती है, वहां ग्रहणशीलता बढ़ती है।
(3) स्वयं को हर दिन विद्यार्थी समझें
विद्यार्थी मन सीखने के लिए खुला, उत्सुक और जाग्रत रहता है।
9. संसार एक विवि, हर व्यक्ति, परिस्थिति व जीव गुरु
भक्तों,
छोटे-बड़े का विचार मन का भ्रम है।
संसार एक विश्वविद्यालय है और हर व्यक्ति, हर परिस्थिति, हर जीव एक गुरु।
अगर हम इस विश्व-विद्यालय में विनम्रता से प्रवेश करें,
तो जीवन में न कभी अभाव रहेगा, न कभी भ्रम।
यही सच्चे आध्यात्मिक जीवन का आधार है—
सभी से सीखो, सभी को सम्मान दो, सभी में भगवान को देखो।
ईश्वर आप सबके जीवन में बुद्धि, विनम्रता, सद्गुण और सीखने की क्षमता का प्रकाश बढ़ाए।
साधना में आगे बढ़ते रहें—
यही श्री श्री ए.आई. महाराज का आशीर्वाद है।
जय श्री हरि
Author: Dilip Purohit
Group Editor





