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Thursday, July 9, 2026, 1:23 pm

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अगर सुखी रहना चाहते हैं तो दूसरों की खुशियों का ख्याल रखें, चाहे थोड़ा त्याग ही क्यों न करना पड़े : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की उन्नीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

जीवन के पथ पर चलने वाला हर मनुष्य “सुख” की खोज में है। कोई धन में सुख ढूँढता है, कोई सम्मान में, कोई परिवार में, तो कोई भौतिक सुविधाओं में। परंतु शास्त्रों और संतों की दृष्टि में सच्चा सुख कहाँ है?
आज के प्रवचन का संदेश सरल है—यदि वास्तव में सुखी रहना है, तो दूसरों की खुशियों का ध्यान रखें। उनकी प्रसन्नता में ही अपना सुख खोजें। भले इसके लिए थोड़ा त्याग करना पड़े, लेकिन वही त्याग आगे चलकर अमूल्य आनंद का स्रोत बनता है।

वेद और उपनिषदों का संदेश—परार्थ बुद्धि ही श्रेष्ठ है

वेद कहते हैं:

“परहित सरिस धर्म नहि भाई।”
अर्थात् “दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं।”

उपनिषदों में भी एक गहन सत्य मिलता है—
“आत्मवत् सर्वभूतेषु।”
यानी सब प्राणियों को अपने समान समझना। जब हम सामने वाले की प्रसन्नता को अपनी प्रसन्नता मानने लगते हैं, तब हमारे भीतर स्वाभाविक दया, प्रेम और करुणा प्रस्फुटित होती है। यही भाव सुख का मूल है।

भगवान श्रीराम—त्याग में आनंद, परहित में प्रसन्नता

रामचरितमानस में भगवान राम का चरित्र “परहित” का सर्वोच्च उदाहरण है।
राजपाट छोड़कर, जंगल का कठोर जीवन अपनाना—यह त्याग बाहरी रूप से कठिन लगता है पर संकट भी आया तो रामजी ने कभी शिकायत नहीं की। क्योंकि उनका मन परहित और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग था।
सीता माता की रक्षा, भाई भरत का स्नेह, प्रजा के प्रति प्रेम—रामजी ने हर जगह दूसरों की खुशी में अपना सुख देखा।

भगवान श्रीकृष्ण—दूसरों को आनंद देना ही उनका परम सुख

भगवान कृष्ण का जीवन लीलामय है।
उनकी बांसुरी की धुन से गोकुल आनंदित होता था। वे स्वयं कहते थे—

“लोको हितं मम सुखं।”
यानी “लोक का हित ही मेरा सुख है।”

कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई, सुदामा का मान रखा, पांडवों का साथ दिया—हर स्थिति में दूसरों की प्रसन्नता को प्राथमिकता दी।
यही कारण है कि वे पूर्ण आनंद के प्रतीक कहलाए।

महात्मा बुद्ध—करुणा ही शांति का मूल स्रोत

महात्मा बुद्ध ने कहा:

“हजार दीपक जलाने से अंधेरा कम नहीं होता, लेकिन एक करुणामय हृदय सबका अंधेरा मिटा देता है।”

बुद्ध ने अपना राजमहल छोड़कर संसार के दुखों को समझने के लिए त्याग का मार्ग चुना।
उन्होंने अपने जीवन से सिखाया—
जब हम अपने मन की सीमाओं से बाहर आकर दूसरों की भलाई सोचते हैं, तब आंतरिक शांति अपने आप प्राप्त हो जाती है।

महावीर स्वामी—अहिंसा और अपरिग्रह का संदेश

महावीर स्वामी का संपूर्ण जीवन त्याग और परहित की शिक्षा देता है।
उन्होंने कहा—
“अहिंसा केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी होनी चाहिए। किसी को दुख पहुँचाने वाले भाव भी छोड़ दो।”

जब व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरों को कष्ट देना बंद कर देता है, तब भीतर अद्भुत शांति का अनुभव होता है।

गुरु नानक देव—सेवा में ही सर्वोच्च सुख

गुरु नानक जी ने कहा:

“वंड छको, किरत करो, नाम जपो।”
(कमाओ, बांटो, सेवा करो)

लंगर की परंपरा इसी भावना का जीवंत उदाहरण है—अपना समय, श्रम और संसाधन त्यागकर दूसरों को भोजन देना।
इससे मिलने वाला आनंद और संतोष किसी भी सांसारिक वस्तु से बड़ा है।

आधुनिक संतों का अनुभव—देने वाला ही सबसे अमीर

स्वामी विवेकानंद कहते थे:

“सुख का रास्ता एक ही है—दूसरों को सुख दो। इसी में तुम्हारी आत्मा का विस्तार होता है।”

मदर टेरेसा हर पीड़ित चेहरे में ईश्वर को देखती थीं।
वे कहतीं—
“जो लोग देने के लिए जीते हैं, वे सबसे खुश होते हैं।”

छोटी-छोटी त्याग की बातें—लेकिन परिणाम अद्भुत

थोड़ा-सा त्याग जीवन को बदल सकता है:

  • घर में अपनी सुविधा छोड़कर किसी का मन रख दिया

  • रास्ते में किसी की मदद कर दी

  • अपनी जरूरत टालकर किसी की समस्या सुलझा दी

  • किसी के दुख में साथ खड़े हो गए

  • बच्चों, बूढ़ों, परिवार या समाज के लिए छोटा-सा त्याग कर दिया

ये त्याग हमें नुकसान नहीं देते—बल्कि हमारी आत्मा को विशाल बनाते हैं।

जब अहंकार कम होता है, जब मन प्रेम से भरता है—तभी सच्चा सुख प्राप्त होता है।

क्यों दूसरों की खुशी से हमारा सुख बढ़ता है?

  1. क्योंकि मन का विस्तार होता है।
    स्वार्थ मन को छोटा करता है; परहित मन को विशाल।

  2. क्योंकि दान और सेवा से ‘अंतर्मन’ हल्का होता है।

  3. क्योंकि त्याग से अहंकार टूटता है।

  4. क्योंकि बनाया हुआ सुख अकेला रहता है, बाँटा हुआ सुख लाख गुना हो जाता है।

  5. क्योंकि ईश्वर का नियम है—जो देता है, उसे लौटकर अवश्य मिलता है।

सौ बातों की एक बात — सच्चा सुख त्याग और परहित में है

यदि आप सच में सुखी परिवार, सुखी समाज और सुखी जीवन चाहते हैं,
तो हमेशा याद रखें—

“दूसरों की खुशियों में ही हमारी असली खुशी छिपी है।”
“थोड़ा-सा त्याग, अनंत आनंद।”
“सेवा, करुणा और प्रेम—यही जीवन की असली संपत्ति है।”

जब हम दूसरों को मुस्कुराने की वजह बनते हैं,
तभी वास्तव में ईश्वर हमारे भीतर* मुस्कुराता है।

ईश्वर आप सभी के जीवन में स्नेह, सेवा और खुशियों का प्रकाश फैलाए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor