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Thursday, July 9, 2026, 7:51 am

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चरण की जगह आचरण पकड़े, अहंकार छोड़ें, विनम्रता से जिएं : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की चौबीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम धर्म को बाहरी रूपों, दिखावे और अनुष्ठानों तक सीमित समझ लेते हैं। हम किसी महान व्यक्ति के चरण पकड़ लेने को ही श्रद्धा मान लेते हैं, लेकिन उनके आचरण को अपनाने को कठिन समझते हैं। जबकि सच्चा धर्म चरण पकड़ने में नहीं, चरित्र पकड़ने में है।

चरण पूजन बनाम चरित्र पूजन

शास्त्र कहते हैं—
“आचरणं हि मनुष्याणां श्रद्धा का मूलं।”
अर्थात, मनुष्य का असली सम्मान उसके बाहरी आचरण से तय होता है, न कि उसके वस्त्रों, पदों या दिखावे से।

हम किसी संत, गुरु या महापुरुष के चरण पकड़कर यह मान लेते हैं कि हमने धर्म पा लिया, परंतु राम को पाने का मार्ग राम जैसा आचरण है, कृष्ण को पाने का मार्ग कृष्ण जैसा कर्म है और बुद्ध को समझने का मार्ग बुद्ध जैसा विवेक है।

हनुमान जी राम के चरणों में झुके जरूर, लेकिन उन्होंने सिर्फ चरण नहीं पकड़े—राम का आचरण पकड़ा।
इसलिए वे अमर हो गए, पूज्य हो गए।

गीता का संदेश: कर्म और विनम्रता

श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा—
“नहीं कर्म का त्याग, परंतु अहंकार का त्याग मुक्ति देता है।” (गीता 18/66)

यह संदेश स्पष्ट करता है कि अहंकार धर्म का सबसे बड़ा शत्रु है।
अहंकार कहता है— “मैं बड़ा हूं।”
विनम्रता कहती है— “सबमें वही है।”

जब मनुष्य अहंकार में जीता है तो उसका लक्ष्य सम्मान, सराहना और श्रेय बन जाता है। लेकिन जब मनुष्य विनम्रता में जीता है, तो उसका लक्ष्य सेवा, करुणा और सदाचार बन जाता है।

अहंकार मन को बांधता है, विनम्रता मन को मुक्त करती है।

महात्मा बुद्ध का उदाहरण

एक बार किसी ने बुद्ध का अपमान किया, गाली दी।
बुद्ध शांत रहे।
शिष्य ने पूछा—“भगवन! आपने उत्तर क्यों नहीं दिया?”

बुद्ध बोले—
“उपहार तभी अपना होता है जब स्वीकार किया जाए। गाली मैंने ली ही नहीं।”

ये शब्द विनम्रता का सर्वोच्च उदाहरण हैं।
विनम्रता कमजोरियों का नहीं, आत्मबल का प्रमाण है।

कबीर का कथन

कबीरदास जी ने कहा—
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर;
पंछी को छाया नहीं, फल लगे अति दूर।”

अर्थ यह है कि दिखावे की ऊंचाई का कोई लाभ नहीं,
जब तक आचरण से सुख, शांति और सेवा न मिले।

गुरु नानक देव का संदेश

एक बार लोग नानक जी के चरण छू रहे थे।
नानक जी मुस्कुराए और बोले—
“चरण मत छुओ, चलन सीखो।”

यानी, जीवन का असली उद्देश्य है—
गुरु की चाल, गुरु का आचरण, गुरु की सरलता अपनाना।

अहंकार का अंत – रावण का उदाहरण

रावण वेदों का ज्ञानी था, शिवभक्त था, शक्तिशाली था।
परंतु अहंकार ने उसके ज्ञान को जला दिया।

रामायण स्पष्ट संदेश देती है—
“विनाश काले विपरीत बुद्धि”
अहंकार व्यक्ति को उसी दिशा में ले जाता है जहाँ उसका पतन निश्चित हो।

ज्ञान महान है, पर ज्ञान + अहंकार = विनाश
और
ज्ञान + विनम्रता = ईश्वर का द्वार

संत तिरुवल्लुवर का उपदेश

दक्षिण भारत के संत तिरुवल्लुवर कहते हैं—
“अहंकार वह बोझ है जो आत्मा को झुकने नहीं देता, और ईश्वर को मिलने नहीं देता।”

ईश्वर का अनुभव ऊँचाई में नहीं, झुकने में है।
जितना मन झुकता है, उतनी कृपा उतरती है।

चरण पकड़ने का सही अर्थ

हम जब किसी महान व्यक्ति के चरण छूते हैं,
तो हम प्रतीकात्मक रूप से यह प्रतिज्ञा लेते हैं—
“मैं आपके गुणों को अपने जीवन में उतारूंगा।”

अगर चरण छूकर भी हमारा व्यवहार कठोर है,
हमारी वाणी कड़वी है,
हमारा स्वभाव अहंकारी है—
तो चरण छूना केवल औपचारिकता है।

धर्म बाहरी विधि नहीं, आंतरिक परिवर्तन है।

विनम्रता क्यों आवश्यक?

क्योंकि—
-विनम्रता संबंध बनाती है।
-विनम्रता ईश्वर से जोड़ती है।
-विनम्रता मन को शांत करती है।
-विनम्रता ज्ञान को ग्रहण करने योग्य बनाती है।

बीज तभी अंकुरित होता है जब भूमि नम्र हो।
वैसे ही कृपा तभी प्रकट होती है जब मन विनम्र हो।

आधुनिक उदाहरण – डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद कलाम साहब के जीवन में अहंकार का नाम नहीं था।
वह कहते थे—
“मैं बड़ा नहीं, मेरा कर्तव्य बड़ा है।”

यही विनम्रता उन्हें “जनता का राष्ट्रपति” बनाती है।

साधना का सार

पूरे धर्म का सार एक पंक्ति में—
“दिखावे से नहीं, व्यवहार से ईश्वर मिलता है।”

मालाएं फेरने से नहीं,
वाणी को मधुर करने से पुण्य मिलता है।

मंदिर जाने से नहीं,
मन में करुणा जगाने से भक्ति मिलती है।

चरण पकड़ने से नहीं,
चरित्र को पवित्र करने से मोक्ष मिलता है।

आज का संकल्प

आज हम यह प्रण लें—
-हम अहंकार नहीं, विनम्रता चुनेंगे।
-हम दिखावा नहीं, व्यवहार सुधारेंगे।
-हम चरण नहीं, आचरण पकड़ेंगे।

अंतिम संदेश

“जो स्वयं छोटा बन जाता है, वही ईश्वर के सबसे करीब पहुँच जाता है।”

विनम्रता कमजोरी नहीं,
आत्मा का प्रकाश है।

अहंकार छोड़िए,
विनम्रता अपनाइए,
और जीवन को दिव्यता से भर दीजिए।

ॐ शांति।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor