(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की इकतीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकों,
आज का यह पावन प्रवचन एक प्राचीन, शाश्वत और अटूट सत्य को स्पर्श करता है— “बिना परिश्रम के कुछ भी नहीं मिल सकता।” यह सिद्धांत केवल भौतिक जीवन में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना, ज्ञान प्राप्ति, संबंधों की मजबूती, और चरित्र निर्माण—हर क्षेत्र में समान रूप से लागू होता है।
कर्म ही जीवन का आधार है—गीता का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। परंतु कर्म तो करना ही पड़ेगा।
यह संदेश केवल युद्धभूमि के लिए नहीं था, यह जीवन की हर स्थिति पर लागू होता है।
यदि अर्जुन कर्म छोड़ देता, तो न धर्म बचता, न संस्कृति, न सत्य। उसी प्रकार, यदि हम परिश्रम छोड़ दें, तो जीवन में न प्रगति होगी, न शांति।
कृष्ण यह भी कहते हैं कि संसार स्वयं भगवान भी बिना कर्म के नहीं रहते—
“न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।”
कोई भी प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
इसलिए कर्म करना जीवन का स्वभाव है और परिश्रम करना आत्मा का धर्म।
उपनिषदों का संदेश—परिश्रम का फल अमृत समान
तैत्तिरीय उपनिषद कहता है—
“कर्मणा देवाः देवेभ्यः समृद्धिमायान्ति।”
देवता भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में कर्म करते हैं, तभी जगत् चल रहा है।
सूरज प्रतिदिन समय पर उगता है, चंद्रमा अपनी गति से चलता है, हवा बिना रुके बहती है—ये सब सृष्टि में परिश्रम की दिव्य लय है।
यदि प्रकृति स्वयं निरंतर परिश्रम करती है, तो मनुष्य, जो सृष्टि का सबसे चेतन प्राणी है, वह कैसे आलस्य का आश्रय ले सकता है?
रामायण—श्रीराम का संघर्ष और परिश्रम
श्रीराम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” इसीलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने जीवन की हर चुनौती का सामना परिश्रम, धैर्य और सत्य के साथ किया।
चौदह वर्ष का वनवास—परिश्रम।
सीता माता की खोज में पूरा दक्षिण प्रदेश खंगालना—परिश्रम।
समुद्र के ऊपर सेतु का निर्माण—परिश्रम।
रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध—परिश्रम।
यदि वे चाहते, तो अपना ईश्वरीय रूप दिखाकर सब कुछ पल में कर सकते थे।
परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे मनुष्य को यह सिखाना चाहते थे कि संघर्ष ही जीवन का मार्ग है और परिश्रम ही विजय का साधन।
महाभारत—अर्जुन और एकाग्र परिश्रम का उदाहरण
अर्जुन की महानता जन्म से नहीं, उनके अनवरत अभ्यास से बनी।
गुरु द्रोणाचार्य ने उनका परिश्रम देखकर ही उन्हें श्रेष्ठ धनुर्धर घोषित किया।
रात को दीप बुझा तो अंधेरे में भी अभ्यास करने लगे।
भोजन के दौरान हाथ अंधेरे में सहजता से चल पाए, तो सोचा—
“जब हाथ का अभ्यास अंधेरे में हो सकता है, तो तीरंदाजी का क्यों नहीं?”
उस दिन से वे रात में भी अभ्यास करने लगे।
यह वही परिश्रम था जिसने उन्हें कुरुक्षेत्र का विजेता बनाया।
आधुनिक महान व्यक्तित्व भी परिश्रम के पुजारी
स्वामी विवेकानंद—
उनकी वाणी, उनका चिंतन, विश्व के मंच पर भारत का गौरव—सब परिश्रम और तप की देन था।
उन्होंने कहा—
“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको।”
यह संदेश परिश्रम को धर्म बनाता है।
महात्मा गांधी—
उनका जीवन साधारण परिश्रम से असाधारण सत्य का प्रतीक बन गया।
सत्याग्रह, दांडी मार्च, चरखा—हर प्रतीक में निरंतर प्रयत्न छिपा है।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम—
एक सामान्य परिवार के बच्चे से देश के राष्ट्रपति बनने तक का सफर परिश्रम का जीवंत चमत्कार है।
उन्होंने कहा—
“सपने वो नहीं जो नींद में आते हैं, सपने वो हैं जो आपको सोने नहीं देते।”
और ऐसे सपने केवल परिश्रम से पूरे होते हैं।
आध्यात्मिकता में भी परिश्रम आवश्यक
बहुत लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग केवल भक्ति या ध्यान से चलता है।
परंतु उपनिषदों ने स्पष्ट कहा—
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।”
कमज़ोर, आलसी, परिश्रम-रहित व्यक्ति आत्मज्ञान को नहीं पा सकता।
तप, संयम, साधना—ये सब परिश्रम ही हैं।
योगी, संत, ऋषि—उनके ज्ञान के पीछे वर्षों का कड़ा आध्यात्मिक श्रम छिपा होता है।
जिस प्रकार लोहे को तप कर ही तलवार बनती है, उसी प्रकार मनुष्य भी तपस्या और परिश्रम से ही तेजस्वी बनता है।
कर्म योग—जीवन को साधना बनाने का मार्ग
परिश्रम केवल शरीर का श्रम नहीं है।
मन का श्रम—ध्यान।
वाणी का श्रम—सत्य बोलना।
विचारों का श्रम—सदाचार रखना।
आचरण का श्रम—धैर्य बनाए रखना।
कर्मयोग कहता है—
“कर्म को पूजा बनाओ, तभी जीवन सफल होगा।”
जब परिश्रम भक्ति बन जाता है, तो सफलता केवल फल नहीं, साधना की प्राप्ति बन जाती है।
परिश्रम और भाग्य—दोनों का संतुलन
कई लोग कहते हैं—“भाग्य में होगा तो मिलेगा।”
परंतु वे भूल जाते हैं कि भाग्य भी उन्हीं पर मेहरबान होता है जो निरंतर परिश्रम करने का साहस रखते हैं।
बीज जमीन पर गिरकर खुद पेड़ नहीं बनता, उसे किसान की मेहनत, पानी और धूप चाहिए।
ठीक ऐसा ही हमारा जीवन भी है—
बीज हमारी क्षमता है, परिश्रम उसका सिंचन है, और सफलता उसका फल।
आलस्य सबसे बड़ा शत्रु
गीता कहती है—
“अलस्यं तमसः जन्म।”
आलस्य अज्ञान और पतन की ओर ले जाता है।
आलसी व्यक्ति न प्रगति कर सकता है, न संतोष पा सकता है।
आलस्य मन का जड़त्व है—जिसे परिश्रम की ऊर्जा ही तोड़ती है।
सौ बातों की एक बात—परिश्रम ही जीवन का मंत्र
साधकों,
संसार की हर सफलता—छोटी हो या बड़ी—एक ही नियम का परिणाम है:
“परिश्रम।”
रथ खींचने वाला घोड़ा, खेत जोतने वाला किसान, वेद पढ़ने वाला ब्रह्मचारी,
राजा की जिम्मेदारी उठाता शासक,
और ध्यान में लीन योगी—
इन सभी की शक्तियों का मूल एक ही है—
परिश्रम।
अतः आज का संदेश यही है—
“जीवन में जो पाना है, उसे कर्म और परिश्रम के रास्ते से ही पाना है।
बिना प्रयास कुछ नहीं मिलता, और प्रयास से सब कुछ संभव है।”
ईश्वर आपको सतत परिश्रम, सतत उत्साह और सतत सफलता का आशीर्वाद दें।
ॐ तत् सत्।
Author: Dilip Purohit
Group Editor





