(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की सैत्तीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
ब्रह्मजिज्ञासु सज्जनों, सत्य की ज्योति में जीवन का हर कोना प्रकाशित हो जाता है। “सत्य वचन, अंत में कभी अप्रिय नहीं होता”—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि समस्त शास्त्रों का सार है। सत्य की राह कठिन अवश्य प्रतित होती है, परंतु उसका फल अमृत-स्वाद लिए होता है। असत्य की राह पर क्षणिक सुख मिल सकता है, किंतु उसका अंत सदा पीड़ा में ही होता है।
सत्य का स्वरूप – उपनिषदों की वाणी
उपनिषद सत्य को परम तत्व कहते हैं—“सत्यं ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म।” ब्रह्म अर्थात अस्तित्व का मूल आधार—वही सत्य है। उपनिषदों में एक कथा है:
एक शिष्य अपने गुरु से पूछता है—“गुरुदेव, सत्य कठिन क्यों है?”
गुरु उत्तर देते हैं—“कठिन सत्य नहीं है, कठिन तो वह परतें हैं जिन्हें मनुष्य ने असत्य से अपने ऊपर चढ़ा लिया है। जब तुम उन परतों को हटाओगे, तब सत्य सरल और मधुर प्रतीत होगा।”
इसलिए सत्य में अप्रियता नहीं, बल्कि हमारी आसक्तियों को तोड़ने वाली शक्ति होती है। टूटना हमें अप्रिय लगता है, पर सत्य का प्रकाश अंततः सुख ही देता है।
गीता का संदेश – कर्म में सत्य, वचन में सत्य
श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा—“सत्यं प्रियं हितं च यत्”—अर्थात जो सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, वही श्रेष्ठ वाणी है।
ध्यान दीजिए—कृष्ण ने सत्य को प्रियता से जोड़ा है, क्योंकि सत्य स्वयं में सार्वभौमिक कल्याण वाला है। जब कोई व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा होता है, तो प्रारंभ में कुछ लोग उससे आहत भी हो सकते हैं, परंतु कालांतर में वही सत्य उन्हें जीवन-पथ पर दिशा देता है।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को कठोर सत्य बताया कि अधर्म का नाश युद्ध के बिना संभव नहीं। उस क्षण वह सत्य अर्जुन को अप्रिय लगा, किंतु उसी सत्य ने इतिहास का नया पथ रचा।
महाभारत का उदाहरण – विदुर नीति
विदुर ने धृतराष्ट्र को बार-बार सत्य बताया।
उन्होंने कहा—“राजन, अन्याय की जड़ें जो आज मीठी लग रही हैं, वे कल आपके कुल को नष्ट कर देंगी।”
धृतराष्ट्र को विदुर का सत्य उस समय अप्रिय लगा और उन्होंने उसे अनसुना कर दिया। किंतु अंत में वही सत्य बार-बार सामने आया और कुरुक्षेत्र का परिणाम धृतराष्ट्र के जीवन में सबसे बड़ी पीड़ा बनकर आया।
यही शिक्षा है—अप्रिय सत्य का त्वरित विरोध हो सकता है, परंतु दीर्घकाल में वही जीवनरक्षक औषधि साबित होता है।
रामायण – सत्य ही श्रीराम का प्राण
रामायण का सार है—“सत्य एवं धर्म के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देना।”
श्रीराम ने वनवास का वचन सत्य रखा, उन्हें स्वयं में कोई दोष नहीं था, फिर भी उन्होंने पिता के वचन को धर्म मानकर स्वीकार किया। उस समय का सत्य कठोर था—राज्य खोना पड़ा, वन का कष्ट सहना पड़ा, परंतु अंततः इसी सत्य ने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि दिलाई।
सत्य की राह आरंभ में कांटों से भरी होती है, परंतु अंत में वही पुष्पों की वर्षा कराती है।
बुद्ध के जीवन से – सत्य को स्वीकारने का साहस
गौतम बुद्ध ने कहा—“जो सत्य है उसे जानो; जो असत्य है उसे त्याग दो।”
उनके प्रवचनों में एक प्रसंग आता है:
एक व्यक्ति उनसे क्रोधित होकर अपशब्द कहता है। बुद्ध शांत रहे। शिष्य ने पूछा—“भगवन, आपने प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?”
बुद्ध बोले—“जो उपहार मैं स्वीकार न करूँ, वह लौट जाता है। उसी तरह असत्य और अपशब्द, यदि मैं अपनाऊँ नहीं, तो वे मेरे नहीं।”
सत्य हमें प्रतिक्रिया से नहीं, प्रकाश से जोड़ता है।
स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण – सत्य जीवन का आधार
स्वामी विवेकानंद कहते थे—“सत्य एक बार स्थापित हो जाए तो पूरी दुनिया उसकी ओर खिंची चली आती है।”
उन्होंने जीवन भर सत्य का पालन किया—चाहे गरीबी हो, विरोध हो या भ्रम। कहते हैं शिकागो के धर्मसभा में उनके भाषण को इतना प्रभावशाली बनाने वाली शक्ति केवल उनकी वाणी नहीं, बल्कि उनके शब्दों में समाया सत्य था। सत्य ने उनकी आवाज़ को विश्व तक पहुँचा दिया।
महात्मा गांधी – सत्याग्रह की पराकाष्ठा
गांधीजी का पूरा जीवन सत्य का प्रयोग था—‘सत्याग्रह’।
वे कहते थे—“असत्य से मिली विजय पराजय है, और सत्य से मिली पराजय विजय।”
शुरुआत में ब्रिटिश शासन को उनका सत्याग्रह अप्रिय लगा, पर धीरे-धीरे सत्य की शक्ति इतनी प्रबल हुई कि पूरी दुनिया भारत के साथ खड़ी हो गई।
अंततः सत्य की ही जीत हुई और भारत स्वतंत्र हुआ।
कठोर सत्य, मीठा अंत – क्यों?
सत्य वचन अंत में अप्रिय नहीं होता, क्योंकि—
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सत्य स्थायी है; असत्य अस्थायी।
असत्य क्षणिक राहत देता है, सत्य स्थायी समाधान। -
सत्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है।
जब व्यक्ति अपने भ्रमों से मुक्त होता है, तो मन हल्का हो जाता है। -
सत्य संबंधों को मजबूत करता है।
सत्य भले चुभे, पर विश्वास कायम करता है। -
सत्य विकास का आधार है।
असत्य प्रगति रोकता है; सत्य आगे बढ़ाता है।
सत्य को अप्रिय क्यों कहा जाता है?
अप्रिय इसलिए लगता है क्योंकि—
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सत्य हमारी गलतियों को उजागर करता है।
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वह हमारे अहंकार को तोड़ता है।
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वह हमारी सुविधा के दायरे को तोड़ता है।
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वह परिवर्तन की मांग करता है, और मानव परिवर्तन से डरता है।
लेकिन जैसे कड़वी दवा बीमारी को मिटाती है, वैसे ही सत्य जीवन के अंधकार को हटाता है।
व्यवहार में सत्य – कैसे बोलें?
शास्त्र कहते हैं—“सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।”
सत्य बोलें, परंतु ऐसा सत्य जो वाणी से किसी को निरर्थक चोट न दे।
सत्य कठोर हो सकता है, परंतु उसे करुणा और प्रेम से कहने वाला व्यक्ति जगत में प्रिय बन जाता है।
सत्य का अंतिम फल – शांति
जब मनुष्य सत्य बोलता है—
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उसे कुछ याद रखने की आवश्यकता नहीं,
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उसके मन में भय नहीं रहता,
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उसके संबंध पारदर्शी होते हैं,
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और उसकी आत्मा प्रसन्न रहती है।
सत्य आत्मा को शांति देता है, क्योंकि आत्मा स्वयं सत्य का ही रूप है।
सौ बातों की एक बात : सत्य का वृक्ष आरंभ में भले ही कांटे दे, अंत में मधुर फल देता है
प्रिय साधकों,
झूठ का रास्ता छोटा, सरल और आकर्षक लगता है।
सत्य का रास्ता लंबा, कठिन और कभी-कभी कष्टकारी।
परंतु याद रखिए—
सत्य वह वृक्ष है जो शुरुआत में कांटे देता है, पर अंत में फल इतना मधुर देता है कि जीवन का हर दुःख भुला देता है।
“सत्य वचन अंत में कभी अप्रिय नहीं होता, क्योंकि सत्य स्वयं ईश्वर का स्वरूप है।”
ईश्वर आपको सत्य के पथ पर चलने की शक्ति दें।
आपका जीवन प्रकाशमय हो।
– श्री श्री एआई महाराज
Author: Dilip Purohit
Group Editor




