शाबास रीना शारड़ा…
50 किलोमीटर मैराथन में 1100 रनर्स दौड़ पर मारवाड़ की बेटी रीना शारड़ा सिरमौर रहीं…6 घंटे 57 मिनट और 38 सेकंड में पूरी की रेस
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
हार उसके सिरहाने पर थी, पर जीत का जुनून था, सपनों को पूरा करने की जिद्द थी और सफलता मैराथन रनर रीना शारड़ा के कदमों में थी। 50 किलोमीटर का ड्रिम रन उसने पूरा किया। यह सपना पहली बार में पूरा हुआ। हर वो काम जो पहली बार में पूरा होता है- उसके पीछे केवल और केवल दृढ़ निश्चय ही होता है। जैसलमेर की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में शनिवार-रविवार को द हेल रेस की ओर से द बॉर्डर अल्ट्रा मैराथन आयोजित की गई। इसमें 1100 रनर्स ने हिस्सा लिया। पर इसमें कामयाबी का सेहरा रनर रीना शारड़ा के सिर पर बंधा।
कौन है रीना शारड़ा :
जोधपुर में पली-बढ़ी। अभी मुंबई में चीफ कॉम्पिलयंस ऑफिसर के रूप में काम कर रही हैं। रीना जोधपुर की जाई-जन्मी है। रीना शारड़ा ने भी अपने पहले ड्रिम रन में हिस्सा लिया और 50 किलोमीटर का यह अल्ट्रा रन 6 घंटे 57 मिनट और 38 सेकंड में पूरा किया। इसे देश की सबसे मुश्किल अल्ट्रा मैराथन में से एक बताया जाता है। 50 किलोमीटर के लिए प्रतिभागियों को 8 घंटे का समय दिया गया था।
ऊबड़-खाबड़ रास्ते, तापमान-परिस्थितियां विपरीत, एंबुलेंस में साथियों को ले जाते देखा…फिर भी कदम बढ़ते रहे…
रीना ने बताया कि रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे। तापमान और परिस्थितियां विपरीत थीं। कई साथियों को बीच रास्ते में एंबुलेंस से ले जाते देखा। पल भर के लिए मन हार को सहन करने वाला था। मगर जीतना मेरा स्वभाव है। मैं कभी अपनी मंजिल को बीच में नहीं छोड़ती। शायद यही जज्बा मेरी कामयाबी का राज है। जब मैंने पहली बार बॉर्डर हेल रेस का नाम सुना, तो अचंभा भी हुआ और उत्साह भी। तभी तय कर लिया था कि अपना पहना 50 किलोमीटर अल्ट्रा रन अपने ही घर मारवाड़ में पूरा करना है।
दौड़ की शुरुआत से ही तापमान और परिस्थितियां विपरीत थीं। हर 10 किलोमीटर पर ही पानी मिल सकता था और रास्ते की कठिनाइयां मुंह बांये खड़ी थीं। यह दौड़ खासी चुनौतीपूर्ण थीं। मैंने दो-दो लीटर की पानी की बोतल साथ रखी। पहले 20 किलोमीटर सहज रहे, लेकिन अगले हिस्से में एंबुलेंस को रनर्स को ले जाते देख और 5 किलोमीटर के ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने उन्हें विचलित किया। हार मानने की सोच रही थी, मगर मेरे सपने मेरी हार पर भारी पड़ने वाले थे। जब-जब मैं हारती हूं मेरे सपने मुझे हारने नहीं देते। बस यही ख्याल मुझे आगे बढ़ाता रहा। अपने ड्रिम रन को याद करते हुए हिम्मत नहीं छोड़ी। 40 किलोमीटर तक पहुंच गई। अंत में वन वे सड़क, चलती गाड़ियां और रेतीली हवा मुश्किलें बढ़ा रही थीं, लेकिन रास्ते में मुस्कुराते बच्चे उनकी प्रेरणा बने। घर तो कहीं दिखते नहीं थे, लेकिन बच्चे जाने कहां से आ जाते और चॉकलेट मांगते। उनके लिए यह रन सिर्फ दूरी नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जु़डने का अनुभव था। …आखिर, मारवाड़ की बेटी ने देश के अधिकतर ट्रैक पर दौड़ने के बाद अपने घर में ही अपना एक ड्रिम रन पूरा किया।





