(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की इकतालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय आत्मन्,
आप सभी साधकों को प्रेमपूर्वक स्मरण कराते हैं कि मनुष्य का जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि एक सुंदर चरित्र, उदार हृदय और निर्मल भावनाओं का विकास ही वास्तविक साधना है। इसी साधना के मार्ग में सबसे बड़ा विघ्न है—लोभ। शास्त्रों ने कहा है कि लोभी व्यक्ति स्वयं को भी दुख देता है और समाज में भी प्रिय नहीं बन पाता।
लोभ क्या है?
लोभ का अर्थ है—आवश्यकता से अधिक चाहना, बिना संतोष के संग्रह करना, और दूसरों के हिस्से पर भी अपनी दृष्टि जमाए रखना। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः—कामः क्रोधस्तथा लोभः।”
अर्थात काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं। लोभ आत्मा का नाश करता है, विवेक हर लेता है और मनुष्य को अंधा बना देता है।
लोभी व्यक्ति किसी को अच्छा क्यों नहीं लगता?
क्योंकि लोभी मनुष्य संबंधों में लाभ देखता है, प्रेम नहीं। वह हर व्यवहार को हिसाब-किताब की तराजू पर तौलता है। मित्रता में स्वार्थ, सेवा में भी सौदा, और दान में भी प्रदर्शन दिखाई देता है। ऐसे व्यक्ति पर न कोई भरोसा करता है, न कोई आत्मीयता अनुभव करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है—
“अलोभः परमं धनम्”
अर्थात अलोभ ही परम धन है। परंतु लोभी व्यक्ति यह सत्य नहीं समझता। वह धन को धन बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन का लक्ष्य बना लेता है।
महाभारत का उदाहरण
महाभारत में दुर्योधन का चरित्र लोभ का जीवंत उदाहरण है। उसके पास राज्य था, सुख-सुविधाएँ थीं, फिर भी उसे पाण्डवों का छोटा सा भाग भी स्वीकार नहीं था। उसका लोभ अंततः पूरे कुल के विनाश का कारण बना। श्रीकृष्ण ने उसे समझाया, भीष्म और विदुर ने उपदेश दिया, पर लोभ ने उसके कान बंद कर दिए। परिणाम—न वह प्रिय बना, न सुखी रहा।
इसके विपरीत—राजा जनक
राजा जनक के पास अपार वैभव था, पर उन पर लोभ का लेश मात्र भी नहीं था। उपनिषदों में उन्हें “विदेह” कहा गया—जिसका देह और धन से आसक्ति समाप्त हो चुकी हो। वे राजसी वैभव में रहकर भी भीतर से संन्यासी थे। इसलिए वे जन-जन में पूज्य बने।
संत कबीर का वचन
संत कबीरदास कहते हैं—
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय॥”
यह संतोष और अलोभ का अद्भुत भाव है। न अधिक चाहिए, न कम—बस इतना कि जीवन सहज चले। ऐसा व्यक्ति सभी को अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें भय नहीं, छल नहीं, लालच नहीं होता।
लोभ और भय साथ-साथ
—लोभ हमेशा भय को जन्म देता है। जो अधिक जमा करता है, वह खोने से डरता है। जो दूसरों को दबाकर आगे बढ़ता है, वह हमेशा असुरक्षित रहता है। इसलिए लोभी व्यक्ति भीतर से कभी शांत नहीं होता। उसका हृदय अशांत रहता है, चेहरा कठोर हो जाता है और वाणी कड़वी हो जाती है।
बुद्ध का प्रसंग
गौतम बुद्ध के पास एक सेठ आया जिसने बहुत धन कमाया था, पर मन अशांत था। बुद्ध ने उससे पूछा—“क्या तुम्हारा धन तुम्हारे साथ मृत्यु के बाद जाएगा?” सेठ मौन हो गया। बुद्ध बोले—“तो फिर उसे पकड़े क्यों बैठे हो?” उसी क्षण सेठ के भीतर त्याग का बीज अंकुरित हुआ। लोभ घटा, शांति बढ़ी।
लोभी व्यक्ति समाज में अकेला रह जाता है
इतिहास और वर्तमान, दोनों गवाह हैं—जो मनुष्य उदार होता है, वह कम साधनों में भी प्रिय बन जाता है; और जो लोभी होता है, वह अपार धन के बाद भी अकेला रह जाता है। लोग उसके पास आते तो हैं, पर मन से नहीं—स्वार्थ से आते हैं।
रामायण में रावण
रावण महान विद्वान था, पर सीता के प्रति लोभ ने उसे पतन की ओर धकेल दिया। उसके पास सब कुछ था, फिर भी एका की लालसा ने उसे समाज और इतिहास में घृणित बना दिया। विद्या भी लोभ से ढकी हो तो वह कल्याणकारी नहीं रहती।
समाधान क्या है?
—लोभ को मिटाने का एक ही उपाय है—संतोष।
संतोष का अर्थ है आलस्य नहीं, बल्कि यह बोध कि जो मिला है, वह पर्याप्त है। कर्म करते रहो, पर संग्रह में विवेक रखो। देने की आदत डालो, बाँटने का आनंद लो।
दान केवल धन का नहीं
दान मुस्कान का भी हो सकता है, समय का भी, ज्ञान का भी। जब मनुष्य बाँटना सीखता है, तो लोभ अपने आप कम होने लगता है।
प्रिय साधकों, याद रखिए—लोभी व्यक्ति किसी को अच्छा नहीं लगता, क्योंकि लोभ मनुष्य को छोटा बना देता है। और अलोभ मनुष्य को महान। धन से बड़ा चरित्र है, संग्रह से बड़ा संतोष है, और स्वार्थ से बड़ा प्रेम है।
—“जो हाथ खोलकर देता है, वही हाथ अंत में ईश्वर से भरता है।” इसी भाव के साथ अपने जीवन में लोभ कम करें, संतोष और उदारता बढ़ाएँ—यही सच्ची साधना है, यही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।





