वात्सल्यपुरम बाल आश्रम के चेयरमैन मदन जांगिड़ ने एमए बीएड करने के बाद स्कूल लेक्चरर बनने की ठानी थी, मगर समाज में ऐसे बच्चे जिनके सिर पर माता-पिता का साया नहीं था और वे नशे की गिरफ्त में जा रहे थे तो जांगिड़ ने ऐसे बच्चों के लिए कुछ करने का सोचा और यहीं से उनकी सोच बदल गई…आज वे वात्सल्यपुरम बाल आश्रम के माध्यम से अनाथ बच्चों के पोषक और भविष्य निर्माता बन चुके हैं…
दिलीप कुमार पुरोहित. पंकज जांगिड़. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां दीवारें ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि करुणा, विश्वास और अपनत्व की होती हैं। जहां छत सिर्फ सिर ढंकने के लिए नहीं, बल्कि टूटे हुए बचपन को सहलाने के लिए होती है। जहां भोजन की थाली केवल पेट नहीं भरती, बल्कि आत्मसम्मान और भावी जीवन की भूख मिटाती है। ऐसा ही एक स्थान है—वात्सल्यपुरम बाल आश्रम। उन बच्चों के लिए एक सुरक्षित संसार, जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है, पर सपनों की लौ अभी बुझी नहीं है।
वात्सल्यपुरम आज 45 ऐसे बच्चों का घर है, जिनकी कहानी दर्द से शुरू होकर उम्मीद पर ठहरती है। ये वे बच्चे हैं, जो कभी फुटपाथ पर, कभी कच्ची बस्तियों में, कभी झुग्गी-झोपड़ियों के तंग अंधेरों में जीवन जीने को मजबूर थे। जिनमें से कई दादा-दादी, नाना-नानी या ताऊ-ताई के सहारे पल रहे थे—जहां संसाधनों से ज्यादा अभाव थे, और संरक्षण से ज्यादा संघर्ष। इन्हीं बच्चों के लिए वात्सल्यपुरम आश्रम ने एक माँ का आँचल बनकर अपने द्वार खोले।
अनाथ बच्चों को सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ा :
इस सेवा-साधना के पीछे खड़ा एक नाम है—मदन जांगिड़। आश्रम के चेयरमैन मदन जांगिड़ के लिए यह संस्था सिर्फ एक सामाजिक परियोजना नहीं, बल्कि एक जीवन-संकल्प है। वे बताते हैं, “हमारे यहाँ वे बच्चे हैं, जिनके सिर पर माता-पिता का साया नहीं है। हमने उन्हें कच्ची बस्तियों, सेवा बस्तियों और झुग्गी झोपड़ियों में जाकर पहचाना। हमारा उद्देश्य स्पष्ट था—इन बच्चों को सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ना।”
पढ़ाई के साथ-साथ संस्कारों की सीख :
वात्सल्यपुरम में बच्चों को खेमे का कुआं स्थित भवानी आदर्श विद्या मंदिर में शिक्षा दिलाई जाती है। स्कूल बस हर रोज आश्रम से बच्चों को लेकर जाती है और शाम को सुरक्षित वापस छोड़ती है। पढ़ाई के साथ-साथ आश्रम में संस्कारों की सीख दी जाती है—अनुशासन, स्वच्छता, आत्मसम्मान और भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टि। यह आश्रम उन बच्चों के लिए “वात्सल्य” की भूमिका निभाता है, जो बनना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर जिनकी शुरुआत बहुत कठिन रही है।
वात्सल्युपरम का बीज कोरोना काल में पड़ा, शिक्षा-आवास-संरक्षण से बच्चों को जोड़ा
वात्सल्यपुरम का बीज कोरोना काल में पड़ा। वह दौर, जब पूरी दुनिया ठहर सी गई थी, तभी कुछ लोगों के भीतर सेवा की गति तेज हो गई। मदन जांगिड़ बताते हैं कि कोरोना काल में वे सेवा बस्तियों में भोजन वितरण के लिए जाते थे। वहीं पहली बार उन्होंने करीब से देखा कि कितने बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता-पिता नहीं रहे, और जिनके जीवन में अनिश्चितता ही स्थायी बन चुकी है। “उसी समय मन में यह विचार आया कि इन बच्चों के लिए कुछ स्थायी करना चाहिए। भोजन वितरण से आगे बढ़कर—शिक्षा, आवास और संरक्षण।” कोरोना के बाद यह सेवा और सघन हुई। फुटपाथों पर, झुग्गियों के बीच, सेवा बस्तियों में पढ़ाने की शुरुआत हुई। मदन जांगिड़ के नेतृत्व में 10–15 युवाओं की टीम नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने जाती थी। खुद मदन जांगिड़ ने एमए, बीएड किया है और स्कूल लेक्चरर बनने का सपना देखा था। पर कहते हैं, कुछ सपने रास्ता बदल लेते हैं। “जब इन वंचित बच्चों को करीब से देखा, तो लगा कि मेरा स्थान कक्षा के मंच से ज्यादा इनके बीच है। समाजसेवा में रुचि तो पहले से थी, पर यह निश्चय अब विश्वास में बदल गया।”
350 से अधिक बच्चों का स्कूलों में नामाकंन करवाया :
इस विश्वास के फल धीरे-धीरे दिखने लगे। उनकी टीम के प्रयासों से 350 से अधिक बच्चों का सरकारी और निजी स्कूलों में नामांकन हुआ। यह राह आसान नहीं थी। जिन बच्चों के सिर पर माता-पिता का साया नहीं था, उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना संघर्षपूर्ण रहा। लेकिन—जहां चाह, वहां राह। मुश्किलें आईं, पर हर चुनौती ने रास्ता बनाया। इसी क्रम में वात्सल्यपुरम बाल आश्रम का औपचारिक स्वरूप सामने आया। वात्सल्यपुरम ने न सिर्फ बच्चों को छत दी, बल्कि उन्हें अंधेरे से बाहर भी निकाला। मदन जांगिड़ बताते हैं कि कई बच्चे भिक्षावृत्ति में लिप्त थे। कुछ बच्चे नशे की दुनिया के दरवाजे पर खड़े थे—बीडी, सिगरेट, शराब, गुटखा, तंबाकू उनके जीवन की आदत बन चुकी थी। आश्रम ने धैर्य, प्रेम और निरंतर संवाद से इन बच्चों को नशे से दूर किया और शिक्षा की ओर लौटाया। आज वही बच्चे किताबों के सपने देखते हैं—डॉक्टर, शिक्षक, खिलाड़ी, कलाकार बनने के।
जन सहयोग से होता है आश्रम का संचालन :
आश्रम गायत्री नगर पाल रोड पर स्थित है। यहां 6 कमरे, कार्यालय, भोजनशाला और बच्चों के खेलने के लिए मैदान है। चार सदस्यीय स्टाफ पूरे समर्पण के साथ बच्चों की दिनचर्या संभालता है। आश्रम का संचालन जन सहयोग से होता है। हर साल ड्रेस, शिक्षण सामग्री, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों पर लाखों रुपये खर्च होते हैं। यह सहयोग भामाशाहों और दानदाताओं की संवेदनशीलता से संभव हो पाता है।
ठाकुरजी के नाम चिट्ठी लिखते ही पूरी जाती है डिमांड :
आश्रम की व्यवस्था पूरी पारदर्शिता के साथ चलती है। एक समय के भोजन के लिए 2500 रुपये, नाश्ते के लिए 1100 रुपये, और दो समय के भोजन व नाश्ते के लिए 6100 रुपये की सहयोग राशि तय है, जिसका उल्लेख आश्रम में लगे बोर्ड पर है। खास बात यह है कि आश्रम में हर सुबह ठाकुरजी के नाम चिट्ठी लिखी जाती है—आज की आवश्यकता, आज की प्रार्थना। यह ‘रिक्वायरमेंट’ सोशल मीडिया पर साझा की जाती है। जन्मदिन, शादी की सालगिरह या पुण्यतिथि जैसे अवसरों पर लोग बच्चों के लिए सेवा कार्य करवाते हैं। सहयोग स्वतः आने लगता है।
मदन जांगिड़ कहते हैं, “यह सब हमारी ईश्वर में गहन आस्था से संभव हुआ है। ठाकुरजी के नाम चिट्ठी लिखते ही मनोकामना पूरी हो जाती है। खुद ठाकुरजी किसी न किसी भामाशाह को निमित्त बनाकर भेज देते हैं।” यह विश्वास ही है, जो आश्रम की ऊर्जा है।
पालनहार योजना को लेकर सुझाव :
मदन जांगिड़ ने एक गंभीर सुझाव भी रखा है—पालनहार योजना के तहत मिलने वाली सहयोग राशि बच्चों के अभिभावकों को देने के बजाय सीधे स्कूल के खाते में जमा करवाई जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि राशि वास्तव में बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो, क्योंकि वर्तमान में यह पूरी तरह बच्चों तक नहीं पहुंच पा रही है।
कथाएं व भजन संध्या कर धन एकत्रित करते हैं ताकि बच्चों को परेशानी ना हो : देवड़ा
संस्था के सचिव पंडित राजेश दवे बताते हैं कि आश्रम में बच्चों को स्नेह-सिंचित वातावरण मिलता है। “हम सिर्फ उनकी आज की जरूरतें नहीं देखते, बल्कि उनके भविष्य के सपनों को साकार करने का प्रयास करते हैं।” वहीं सह सचिव अनिल देवड़ा, जो कथा-वाचक हैं, रामकथा, नानी बाई का मायरा, भजन संध्या और अन्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से धन संग्रह करते हैं। आस्थावान लोग जुड़ते हैं, और सेवा की गाड़ी चलती रहती है। वात्सल्यपुरम बाल आश्रम दरअसल एक विचार है—कि कोई बच्चा सिर्फ इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि उसके माता-पिता नहीं हैं। कि समाज, अगर चाहे, तो माता-पिता का अभाव भी जिम्मेदारी में बदल सकता है। यहां बच्चे डरकर नहीं, भरोसे के साथ सोते हैं। यहां सुबह किताबों की खुशबू से होती है और शाम मैदान की किलकारियों से। इन बच्चों की आंखों में आज भी अतीत की छाया है, पर उसके साथ भविष्य की रोशनी भी है। वात्सल्यपुरम ने उन्हें यह विश्वास दिया है कि वे अकेले नहीं हैं। कि उनका जीवन केवल संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि सफलता का अध्याय भी बन सकता है।
वात्सल्यपुरम, सचमुच, वात्सल्य का वह पुरम है—जहां टूटे हुए बचपन फिर से मुस्कुराना सीखते हैं, और जहां करुणा एक संस्था नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बनकर धड़कती है।
ऐसा काम करो कि लोग याद करे कि बच्चा कहां से आया : निरूपा पटवा
संस्थान की उपाध्यक्ष निरूपा पटवा अक्सर यहां सेवा कार्य करती हैं। बच्चों को उपहार देना और वस्त्र वितरण आदि गतिविधियां उनकी ओर से जारी रहती है। निरूपा पटवा ने बच्चों से आह्वान किया कि बड़े होकर देश का नाम रोशन करें और जब लोग पूछे कि बच्चा कहां से आया तो वात्सल्यपुरम बाल आश्रम की पहचान उनके दिल में होनी चाहिए। पटवा ने सभी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
अनाथ बच्चों की शिक्षा, भोजन एवं विकास के लिए यहां सहयोग कर सकते हैं :
VATSALYAPURAM SEVA SANSTHAN JODHPUR
A/c No. 2245104000008372
IFSC: IBKL0002245
IDBI Bank, PAL ROAD, JODHPUR
Author: Dilip Purohit
Group Editor












