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Thursday, July 9, 2026, 8:12 am

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“जहां पीड़ा भी पूजा है: 140 साल पुरानी रामकुमार–पन्नालाल गोशाला में सेवा का जीवंत संसार”

मंडोर की धरती पर बसे 3500 से अधिक गोधन—अंधी, अपंग, घायल, बेसहारा—सबको मिलता है नया जीवन…

निस्वार्थ सेवा और जन-सहयोग से चल रही है 140 साल पुरानी जोधपुर की पहली गोशाला। गोशाला में वर्तमान में दस आजीवन ट्रस्टी हैं।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

जोधपुर के इतिहास की धूल में कई कहानियां दबकर रह जाती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो समय के साथ और उजली हो जाती हैं। ब्रह्मचारी रामकुमार पन्नालाल गोशाला भी ऐसी ही एक कहानी है—एक ऐसी कथा जिसमें पीड़ा है, करुणा है, तपस्या है और सेवा का अद्भुत संकल्प है। आज से 140 साल पहले जब इस गोशाला की नींव कागा क्षेत्र में रखी गई थी, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह स्थान एक दिन हजारों गोधन का आश्रय-स्थल बन जाएगा।

ब्रह्मचारी रामकुमार पन्नालाल जी ने केवल 30 गायों से इसे शुरू किया था। वे साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनका संकल्प असाधारण था। कहा जाता है कि जिस दिन गायों के लिए चारे का इंतज़ाम नहीं होता था, उस दिन वे स्वयं भी उपवास कर लेते थे। उनकी तपस्या, उनका संयम और उनका निष्ठापूर्ण व्रत ही था जिसने गोशाला को जनमानस में एक पवित्र स्थान बना दिया। गोशाला में वर्तमान में 10 आजीवन ट्रस्टी हैं।

मंडोर का नया पता, लेकिन वही पुरानी करुणा

1984 में गोशाला को कागा से स्थानांतरित करके मंडोर क्षेत्र में स्थापित किया गया। आज इस विशाल परिसर में 50 बीघा क्षेत्र में लगभग 3500 गोधन का परिवार रहता है। इनमें से अधिकतर गायें—
अंधी हैं
तीन टांगों पर चलती हैं
किसी दुर्घटना में घायल हुई हैं
अपंग हैं
या बेसहारा होकर सड़क से उठाई गई हैं

दूध देने वाली गायों की संख्या बेहद कम है, जिससे प्रतिदिन मात्र 40 किलो दूध प्राप्त होता है—और वह भी बेचने के लिए नहीं, बल्कि अनाथ बच्चों को पिलाने के लिए उपयोग होता है। गोबर से कुछ आमदनी होती है, लेकिन वह आवश्यकता की तुलना में नगण्य है।

दूसरी गोशाला भूरि बेरी में 93 बीघा क्षेत्र में स्थित है, जहाँ 1000–1200 गोधन रहते हैं। इन दोनों गोशालाओं के संचालन में ट्रस्ट की दृष्टि केवल सेवा है, व्यवसाय नहीं।

जब रिपोर्टर पहुंचा—करुणा की आंखें नम कर देने वाली तस्वीरें

मंडोर स्थित गोशाला में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो दृश्य सामने आता है वह मन को भीतर तक हिला देता है। कई गायें पूरी तरह अंधी होकर दीवार से टिककर खड़ी हैं। लगभग 400 गायें ऐसी हैं जो इतनी बीमार या घायल हैं कि ज्यादातर समय लेटी ही रहती हैं। कई गायें ग्लूकोज की बोतलों से जुड़ी हुई हैं, कुछ की मरहम–पट्टी ताज़ी है, कुछ की सांसें भारी। उनकी आंखों से बहते आंसू देखकर रिपोर्टर की आंखें भी नम हो गईं।

यह दृश्य पीड़ा का नहीं, बल्कि मानवीयता की सबसे जीवंत मिसाल का था—क्योंकि उनके पास दर्द तो है, लेकिन उन्हें छोड़ दिया नहीं गया; उनके पास अपंगता है, लेकिन उन्हें तिरस्कृत नहीं किया गया; उनके पास जीवन की उम्मीद कम है, लेकिन उन्हें स्नेह, दवा और देखभाल भरपूर मिल रही है।

निस्वार्थ सेवा—जहाँ हर कर्मचारी एक सेवक बन जाता है

गोशाला में कुल 100 कर्मचारी हैं जो चौबीसों घंटे सेवा में लगे रहते हैं। कोई मरहम पट्टी करता है, कोई चारा डालता है, कोई बूढ़ी गायों की पीठ सहलाता है, तो कोई तीन-पैर वाली गायों को सहारा देकर खड़ा करना सिखाता है। उनके चेहरे पर न श्रम का तनाव है, न थकान की शिकायत—मानो सेवा उनकी दिनचर्या नहीं, बल्कि पूजा हो।

विकास कार्य: नंदी, बछड़े, अंधी गायें—सबके लिए अलग वार्ड

गोशाला में कुल 82 प्रकार के वार्ड बने हुए हैं—

  • नंदी वार्ड (700 नंदी)

  • नंदी के बच्चे (300)

  • अंधी गायें (600)

  • तीन टांगों वाली गायें (500)

  • दुर्घटनाग्रस्त गायें

  • बुजुर्ग गोधन

  • कैंसर से पीड़ित गायें

यहाँ का एयर कंडीशनर्ड ऑपरेशन थिएटर कई आधुनिक अस्पतालों की तरह सुसज्जित है। जयपुर के प्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ डॉ. सुरेश जीरवाल हर दो महीने में विशेष कैंप आयोजित करते हैं। वे दो दिनों में 5–6 गायों का ऑपरेशन करते हैं। अब तक 120 गायों को ऑपरेशन हो चुका है जिनमें अधिकतर गायें अपनी नेत्रज्योति वापस पा चुकी हैं।

खर्च बड़ा, मन बड़ा—जन-सेवा से चलती है यह आश्रयभूमि

गोशाला का मासिक खर्च लगभग 1 करोड़ रुपए है। सालाना निवेश लगभग 12 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है।
यह राशि आती है—
सरकारी अनुदान से
जोधपुर के भामाशाहों से
जन-सहयोग से

यह गोशाला किसी बड़े उद्योग समूह की निजी सुविधा नहीं है। यह जनता की गोशाला है, जनता के सहयोग से चलती है और जनता के प्यार पर टिकी है।

“हर गाय जीना चाहती है”—यह वाक्य यहां सच होता दिखा

कई बार लोग पूछते हैं—
“इन घायल, अपंग, बूढ़ी गायों का जीने का क्या अर्थ?”

लेकिन जो व्यक्ति गोशाला के किसी भी वार्ड में कुछ मिनट खड़ा हो जाए, वह इस प्रश्न का उत्तर स्वयं पा लेता है। हर गाय जब आवाज निकालती है, जब दर्द में भी पूंछ हिलाती है, जब अपंगता के बावजूद खाने की ओर बढ़ती है—तो साफ दिखता है कि जीने की इच्छा हर जीवन की देन है

और इसी जीवन को पकड़कर रखने में गोशाला का हर सेवक, हर कर्मचारी, हर भामाशाह और हर दानदाता अपना योगदान देता है।

ट्रस्ट की भूमिका—सेवा का वटवृक्ष

ट्रस्ट के सचिव जवरीलाल सालेचा और मुख्य ट्रस्टी पुरुषोत्तम दास वैद्य बड़े विनम्र स्वर में कहते हैं—
“हम कुछ नहीं कर रहे, बस वही सेवा आगे बढ़ा रहे हैं जिसका बीज ब्रह्मचारी रामकुमार पन्नालाल जी ने बोया था।”

उनका कहना है कि गोधन की सेवा केवल धार्मिक दायित्व नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना का सबसे ऊंचा रूप है। वे बताते हैं कि हर दानदाता, हर भामाशाह, हर साधारण नागरिक—सभी मिलकर इस गोशाला की धड़कनों को चालू रखते हैं।

सेवा के संस्कार —यह गोशाला केवल पशुओं का आश्रय नहीं, मानवीयता का चिराग है

आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, जब लोग सुविधाओं की दौड़ में संवेदनाएँ खोते जा रहे हैं, तब मंडोर स्थित ब्रह्मचारी रामकुमार पन्नालाल गोशाला हमें याद दिलाती है कि सेवा अब भी जीवित है।
यह गोशाला हमें यह भी सिखाती है कि—
“दर्द बड़ा नहीं होता, उसे देख लेने वाला मन बड़ा होना चाहिए।”

यही कारण है कि यह गोशाला आज भी केवल एक संस्था नहीं, बल्कि जीवित धरोहर, संवेदना की शरणस्थली और निस्वार्थ सेवा का दिव्य उदाहरण बनी हुई है।

शादी-ब्याह और मांगलिक अवसरों पर सहयोग की पेटी :

ट्रस्ट के सचिव जवरीलाल सालेचा और मुख्य ट्रस्टी पुरुषोत्तम दास वैद्य ने बताया कि गोधन की सेवा के संस्कार जोधपुर के सेवा-भावी लोगों में आज भी जीवित है। जोधपुर के लोग गायों के लिए सर्वस्व त्याग को तैयार रहते हैं। गाय हमारी आस्था का विषय है। जब शादी-ब्याह और मांगलिक अवसर होते हैं तो गौ के लिए भी राशि रखी जाती है। शादी-ब्याह, जनेऊ और पुण्य अवसर पर भी गौ दान का भारतीय संस्कारों में उल्लेख होता है। यही वजह है कि गोशाला ने पेटी सिसटम शुरू किया है। हम इस पेटी के माध्यम से गोशाला के निमित्त सहयोग राशि एकत्रित करते हैं। यह राशि गऊदान की परंपरा के साथ गोशाला को सहयोग का एक छोटा सा विनम्र प्रयास है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor