Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 6:06 pm

Thursday, July 9, 2026, 6:06 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

लोभ सर्व गुणों का नाश कर डालता है : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की छयालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

आत्मीय साधकों,

आज हम एक ऐसे विषय पर चिंतन कर रहे हैं, जो मनुष्य के भीतर चुपचाप जन्म लेता है और धीरे-धीरे उसके सभी सद्गुणों को निगल जाता है—लोभ। शास्त्रों में कहा गया है कि लोभ वह अग्नि है, जो स्वयं कभी तृप्त नहीं होती और जिसके संपर्क में जो आता है, उसे भी भस्म कर देती है।

गीता का उद्घोष
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥”

अर्थात काम, क्रोध और लोभ—ये तीन आत्मा के पतन के द्वार हैं। लोभ मनुष्य को अंधा बना देता है। वह यह भूल जाता है कि क्या उचित है, क्या अनुचित, क्या धर्म है और क्या अधर्म।

लोभ कैसे गुणों को नष्ट करता है
लोभ सबसे पहले संतोष को मारता है। जहाँ संतोष नहीं, वहाँ शांति नहीं। शांति के बिना विवेक नष्ट हो जाता है, और विवेक के बिना मनुष्य पशु समान हो जाता है। लोभ बुद्धि को गिरवी रख देता है और मनुष्य तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक हानि को स्वीकार कर लेता है।

रामायण से उदाहरण
रामायण में रावण विद्वान था, वेदों का ज्ञाता था, महान तपस्वी था। परंतु एक सीता के प्रति लोभ ने उसके समस्त गुणों को नष्ट कर दिया। लोभ ने उसके विवेक पर पर्दा डाल दिया और वही रावण, जो शिवभक्त था, अपने कुल के विनाश का कारण बन गया। तुलसीदास जी लिखते हैं—
“लोभ मूल सब पापन्ह केर।”
अर्थात लोभ ही सभी पापों की जड़ है।

महाभारत की चेतावनी
महाभारत में कौरवों का पतन भी लोभ का ही परिणाम है। दुर्योधन के भीतर राज्य, धन और अधिकार का लोभ इतना प्रबल था कि उसने अपने ही भाइयों, गुरुजनों और संबंधियों का विनाश कर दिया। पांडवों से केवल पाँच गाँव भी देने को वह तैयार नहीं हुआ। परिणाम क्या हुआ? पूरा वंश समाप्त हो गया।

बुद्ध का उपदेश
भगवान बुद्ध ने कहा—“तृष्णा ही दुःख का कारण है।”
तृष्णा अर्थात लोभ। जितना अधिक मिलता है, उतना ही अधिक पाने की इच्छा बढ़ती जाती है। लोभी व्यक्ति कभी वर्तमान में नहीं जीता। वह हमेशा भविष्य के सपनों में उलझा रहता है और वर्तमान की शांति खो देता है।

कबीर का तीखा व्यंग्य
संत कबीरदास जी कहते हैं—
“लोभ बुरी बला है, सकल व्याधि को मूल।”
कबीर यह स्पष्ट करते हैं कि लोभ केवल धन का नहीं होता, पद का, प्रतिष्ठा का, प्रशंसा का भी होता है। यह सभी रूपों में मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है।

आधुनिक जीवन में लोभ
आज का मनुष्य तकनीक, सुविधा और भोग-विलास के बीच फँसकर लोभ का गुलाम बन चुका है। ज्यादा पैसा, ज्यादा नाम, ज्यादा फॉलोअर्स—यह दौड़ अंतहीन है। इस लोभ ने रिश्तों को व्यापार बना दिया, सेवा को स्वार्थ से जोड़ दिया और धर्म को प्रदर्शन बना दिया।

महापुरुषों का जीवन संदेश
महात्मा गांधी के पास न धन का लोभ था, न पद का। सादगी में ही उन्होंने अपार शक्ति पाई। उन्होंने कहा—“धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं।”
संत तुकाराम, मीरा, दादू—इन सभी ने त्याग और संतोष के बल पर अमरता पाई।

लोभ से मुक्ति का मार्ग
“लोभ का इलाज उपदेश नहीं, अभ्यास है।”
संतोष का अभ्यास, दान का अभ्यास, सीमाओं का अभ्यास। जब मनुष्य अपनी आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझ लेता है, तभी लोभ कमजोर पड़ता है।

उपसंहार

प्रिय आत्मन्, याद रखो—

लोभ वह दीमक है, जो भीतर से खोखला कर देती है। बाहर से व्यक्ति सफल दिख सकता है, पर भीतर से वह खाली होता है। जो लोभ को जीत लेता है, वही सच्चा विजेता है। गुण, शांति, प्रेम और करुणा—ये सब तभी टिकते हैं, जब लोभ पर लगाम हो।

अतः लोभ को त्यागो, संतोष को अपनाओ और जीवन को सरल बनाओ। यही सच्चा धर्म है, यही सच्ची साधना है।
ॐ शांति।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor