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Thursday, July 9, 2026, 4:42 pm

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मन, वचन और काया की स्थिरता का आयाम है- ध्यान

लेखक : शिव सिंह

धारणा से चित्त वृत्ति को जिस विषय में लगाया गया हो, उसे विषय में उसे निरन्तर लगाए रखने को ध्यान कहते हैं। मन, वचन और काया की स्थिरता को भी ध्यान कहते हैं। चित्त विक्षेप का त्याग करना ध्यान है, एकाग्र चित्त होना ध्यान है।

प्रत्येक इन्द्रिय पर ध्यान का अभ्यास करने से अतीन्द्रिय होने लगने लगता है तथा साधक गूढ़ वस्तुओं के योग से उनके विषयों का आनन्द ले सकता है। अलग-अलग गन्ध, रस, शब्द और स्पर्श पर ध्यान करने से शरीर में उनके अभावों की पूर्ति होने लगती है तथा शरीर शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक रूप से सन्तुलित होने लगता है अर्थात् स्वास्थ्य एवं रोग मुक्त बन सकता है। रंग चिकित्सा में शरीर में रंगों की कमी को पूरा करने की एक विशिष्ट संबंधित रंग का ध्यान कर रोगोपचार की भी होती है। इसी प्रकार शरीर में कमी वाले गंध, शब्द, रस, स्पर्श का ध्यान करने से उसकी पूर्ति की जा सकती है।

ध्वनि चिकित्सा, स्वाद चिकित्सा, गंध चिकित्सा, स्पर्श चिकित्साएं आदि इसी सिद्धान्त पर कार्य करती हैं। ललाट पर ध्यान करने से साधक का बौद्धिक केन्द्र (भूण्मध्या चक्र), जागृत होने लगता है एवं वृत्तियों का परिहार होने लगता है। जैनमार्गों में भगवान महावीर द्वारा नासाग्र पर ध्यान करने का अनेक स्थलों पर वर्णन मिलता है। ध्यान से मन के विकारों का नाश हो जाता है और सात्विक गुणों का विकास होता है। जैन आगमों में चार प्रकार के ध्यान का उल्लेख मिलता है – आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। प्रथम दो ध्यान अशुभ एवं त्याज्य होते हैं, जिस ध्यान में अनिष्टों के चिन्तन से हिंसा होती है, उस ध्यान को आर्तध्यान तथा क्रूर चित्त द्वारा किया गया ध्यान रौद्र ध्यान की श्रेणी में आता है।

अन्तिम दो ध्यान धर्म ध्यान और शुक्ल गुण होते हैं। धर्म ध्यान से ध्यानी आत्म स्वभाव में रमण करने लगता है तथा शुक्ल ध्यान से राग एवं द्वेष को जीतने की क्षमता प्राप्त होती है। यह ध्यान आत्मा के शुद्ध स्वरूप की सहज अनुभूति कराता है। इन दो ध्यानों के ही साधक ऊर्ध्व गमन कर सकता है। जिस धर्म एवं शुक्ल ध्यान बिना किये धर्म ध्यान का आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व नहीं होता।
​पन्तु आज अधिकांश धर्मग्रन्थों को उद्देश्य व्यक्ति में समन्वय के मुक्ति दिलाने, एवं उसके फलस्वरूप होने वाले स्वास्थ्य लाभ तक ही सीमित हो रहा है, जो ध्यान की प्रारम्भिक अवस्थाएँ ही होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति वैसे तो समरूपता और एकरुपता से प्रवृत्ति करते समय किसी न किसी भावनात्मक में होता ही है। परन्तु योग में ध्यान का मतलब सम्यक् ज्ञान अनुभूतियाँ करने, आत्म से साक्षात्कार को ही ध्यान समझा जाता है। स्वस्थ शरीर, मन एवं मस्तिष्क की स्वस्थता रहने का आधार ध्यान है। ध्यान से विषय विक्षेप छूटते होते हैं, हानिकारक तरगे दूर होती हैं। ध्यान से साधक स्वस्थ, एकाग्र, स्वच्छ एवं निश्चिन्त होकर निश्चित समय का ज्यादा लाभ होता है।
​ध्यान के लिए तीन आवश्यक होते हैं:
​पहले शरीर की स्थिरता फिर
​दृढ़ता और धैर्य बिना ध्यान सफल नहीं हो सकता।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor