शिव सिंह
9784092381
स्वस्थ का मतलब होता है रोग-मुक्त जीवन। स्वस्थ तन, मन और आस-पड़ोस के समन्वय का नाम है। जब शरीर, मन, इंद्रियाँ और आत्मा ताल-से-ताल मिलाकर संतुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है अर्थात् शरीर की समस्त प्रणालियाँ और सभी अवयव स्वभावानुकूल अपना-अपना कार्य करें, किसी के भी कार्य में, किसी भी प्रकार का अवरोध, आलस्य अथवा निष्क्रियता न हो तथा न उनको चलाने हेतु किसी बाह्य दवा अथवा उपकरणों की आवश्यकता पड़े। मन और पाँचों इंद्रियाँ सशक्त हों। स्मरण शक्ति अच्छी हो। क्षमताओं का ज्ञान हो। विवेक जागृत हो। लक्ष्य सही और विकासोन्मुख हो तब जीवन में स्थायी आनंद, शांति, प्रसन्नता बढ़ने वाला हो, न कि तनाव, चिंता, भय, अनैतिकता, हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, तृष्णा आदि दुष्ट कारणों को बढ़ाने वाला। प्राथमिकताएँ सही हों एवम् उसके अनुरूप स्व-नियमित, नियोजित, नियंत्रित जीवन चर्चा हो। आवश्यक स्व की क्रियान्विति और अनावश्यक की उपेक्षा का स्वाभाविक ही मन। मन का चिंतन और आचरण सम्यक् एवं संयमित हो। मन में बेचैनी न हो। इंद्रियों की विषय-विकारियों में आसक्ति न हो। समस्त प्रवृत्तियाँ सहज और स्वाभाविक हो, अस्वाभाविक न हो अर्थात् जिसका पाचन और श्वसन बराबर हो, निर्बाधित हो, सन्तुलित हो, अनुपयोगी अनावश्यक विषयादि तत्वों का शरीर से विसर्जन सही हो। भूख प्राकृतिक लगती हो। निद्रा स्वाभाविक आती हो। पसीना गन्ध-हीन हो। त्वचा मुलायम हो, बदन गठीला हो। सीधी कमर, खिला हुआ चेहरा और आँखों में तेज हो। नाड़ी, मज्जा, अस्थि, प्रजनन, लासिका, रक्तत परिभ्रमण आदि मन शक्तिशाली हो तथा अपना कार्य पूर्ण क्षमता से करने में सक्षम हो। जो स्फूर्ति तथा निरंकारिता हो। जो आत्म-विश्वासी, दृढ़ मनोबली, सहनशील, धैर्यवान, निर्भय, साहसी और जीवन के प्रति उत्साही हो। जिसके सभी कार्य समय पर होते हों तथा जीवन नियन्त्रण हो। वास्तव में पूर्ण स्वच्छता के मापदण्ड तो यही हैं। जितने-जितने अंशों में उपरोक्त तत्वों की प्राप्ति होती है उसी अनुपात में व्यक्ति स्वस्थ होता है। इसके विपरीत स्थिति पैदा होने पर आपको स्वस्थ मानना अथवा स्वस्थ बनाने का दावा करना न्याय-संगत नहीं माना जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की स्थिति पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए। जो-जो बातें उसके स्वयं के नियन्त्रण में होती हैं, उसके अनुरूप अपनी जीवनशैली बनाने का प्रयास करना चाहिए।
परन्तु आज स्वास्थ्य का परामर्श देते समय अथवा रोग की अवस्था में निदान करते समय प्रायः कोई भी चिकित्सक अथवा स्वास्थ्य विशेषज्ञ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले उपरोक्त प्रभावों की सक्षमता से विश्लेषण नहीं करते।
स्वस्थ की पूर्णतः अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती। वह तो व्यक्ति के ‘स्व’ की अनुभूति का विषय होता है। जो भी देखा जाता है, सुना जाता है, वचनों अथवा परीक्षणों से पता लगाया जाता है वह सत्यांश ही होता है। ऐसा अधूरा निदान और परामर्श कैसे शत-प्रतिशत सत्य और पूर्ण हो सकता है, अपने आपको स्वस्थ रखने की कामना रखने वालों के सम्मुख चिन्तन की अपेक्षा रखता है। अतः स्वस्थ रहने हेतु व्यक्ति के स्वयं की सन्तुलना, विवेक, बुद्धि बलवान जीवन पद्धति तथा स्वयं की स्वयं द्वारा नियमित समीक्षा, पूर्ण स्वस्थता की प्राप्ति के लिए अनिवार्य होती है। पराधीन अथवा दूसरों पर आश्रित रहने वाला व्यक्ति स्थायी स्वास्थ्य को प्राप्त नहीं कर सकता है।





