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Thursday, July 9, 2026, 11:00 am

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जब दो झगड़ते हैं तो दोनों गलती पर होते हैं : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की सैतालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

आत्मीय साधकों,

मनुष्य का जीवन संबंधों की डोर से बंधा है—परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त सृष्टि। जहाँ संबंध हैं, वहाँ मतभेद भी संभव हैं। परंतु मतभेद जब अहंकार, क्रोध और अविवेक के साथ जुड़ जाता है, तब वह झगड़े का रूप ले लेता है। आज का यह प्रवचन इसी शाश्वत सत्य पर आधारित है कि “जब दो झगड़ते हैं तो दोनों किसी न किसी रूप में गलती पर होते हैं।”

शास्त्रों ने स्पष्ट कहा है—
“क्रोधाद्भवति संमोहः, संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।”
(भगवद्गीता)
अर्थात क्रोध से मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मृति का नाश। जब स्मृति नष्ट हो जाती है, तब विवेक भी चला जाता है। झगड़े की जड़ यही है—विवेक का अभाव।

अहंकार: झगड़े की पहली सीढ़ी

उपनिषद कहते हैं—“अहं ब्रह्मास्मि”, पर इसका अर्थ यह नहीं कि मेरा अहं सर्वोपरि हो जाए। जब व्यक्ति “मैं सही हूँ” की जिद पकड़ लेता है, तब वह दूसरे की बात सुनना बंद कर देता है। तुलसीदास जी ने लिखा—
“अहंकार करै मन मूरख, नहिं जानै निज दोष।”
अहंकार मनुष्य को अपने दोष देखने नहीं देता। झगड़े में एक पक्ष चाहे जितना सही प्रतीत हो, यदि वह अहंकार से भरा है, तो वह भी दोषी है।

बुद्ध का उपदेश: जलते अंगारे का उदाहरण

भगवान बुद्ध ने कहा—क्रोध करना ऐसा है जैसे किसी और को मारने के लिए जलता हुआ अंगारा हाथ में पकड़ना; पहले खुद का हाथ ही जलता है। झगड़े में दोनों पक्ष क्रोध के अंगारे पकड़े होते हैं, इसलिए दोनों जलते हैं। जो शांत रह सकता था, जो मौन धारण कर सकता था, उसने भी यदि क्रोध चुना, तो वह भी दोषी हुआ।

महाभारत का प्रसंग: दुर्योधन और पांडव

महाभारत में दुर्योधन का अहंकार और पांडवों की असहायता—दोनों ने युद्ध को जन्म दिया। युधिष्ठिर धर्मराज थे, परंतु यदि समय रहते संवाद, त्याग और व्यापक करुणा का मार्ग चुना जाता, तो शायद महासंहार टल सकता था। यहाँ शास्त्र यह संकेत देते हैं कि जहाँ संवाद टूटता है, वहाँ झगड़ा जन्म लेता है, और संवाद तोड़ने में दोनों पक्ष सहभागी होते हैं।

कबीर की वाणी: दोष दर्शन

संत कबीर कहते हैं—
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥”

यह आत्मावलोकन की पराकाष्ठा है। झगड़े में यदि दोनों पक्ष अपने भीतर झाँक लें, तो उन्हें अपनी-अपनी गलती अवश्य दिखेगी—किसी का कठोर शब्द, किसी का समय पर न बोलना, किसी का तिरस्कार, किसी का अविश्वास।

जैन दर्शन: अनेकांतवाद

जैन दर्शन का सिद्धांत अनेकांतवाद सिखाता है कि सत्य एकांगी नहीं होता। हर व्यक्ति अपनी दृष्टि से सत्य देखता है। जब दो व्यक्ति झगड़ते हैं, तो दोनों अपने-अपने सीमित सत्य को पूर्ण सत्य मान लेते हैं। यही भूल है। महावीर स्वामी ने कहा—
“सहिष्णुता ही सच्चा धर्म है।”
जो सहिष्णु नहीं, वह चाहे कितना भी सही क्यों न हो, वह झगड़े का कारण बनता है।

रामायण: वाणी की मर्यादा

रामायण में लक्ष्मण और परशुराम संवाद का प्रसंग स्मरणीय है। लक्ष्मण की तीखी वाणी ने स्थिति को तनावपूर्ण बनाया, परंतु भगवान राम की मधुर वाणी ने वातावरण को शांत किया। यहाँ स्पष्ट है—वाणी का दोष भी झगड़े की बड़ी वजह है। जो वाणी में मर्यादा नहीं रखता, वह झगड़े का सहभागी बनता है।

आधुनिक महापुरुष: महात्मा गांधी

महात्मा गांधी ने कहा—
“कमज़ोर कभी क्षमा नहीं कर सकता, क्षमा वीरों का गुण है।”
झगड़े में जो क्षमा नहीं करता, जो झुकने को कमजोरी समझता है, वह भी दोषी है। गांधीजी का सत्याग्रह इसी सिद्धांत पर टिका था—अहिंसा और आत्मसंयम।

मनोविज्ञान की दृष्टि

आधुनिक मनोविज्ञान भी कहता है कि झगड़ा ट्रिगर और रिस्पॉन्स का खेल है। एक व्यक्ति ट्रिगर करता है, दूसरा प्रतिक्रिया देता है। यदि दूसरा प्रतिक्रिया न दे, तो झगड़ा वहीं समाप्त हो जाए। इसलिए प्रतिक्रिया देने वाला भी उतना ही उत्तरदायी है।

समाधान का मार्ग

प्रिय आत्मन्, प्रश्न यह नहीं कि गलती किसकी है, प्रश्न यह है कि समाधान कैसे हो। शास्त्र मार्ग दिखाते हैं—

  1. मौन – कई झगड़े मौन से समाप्त हो जाते हैं।

  2. क्षमा – क्षमा करने वाला बड़ा होता है।

  3. संवाद – आरोप नहीं, संवाद करें।

  4. आत्मावलोकन – पहले अपनी गलती देखें।

  5. करुणा – सामने वाले की परिस्थिति समझें।

सौ बातों की एक बात : दोषारोपण छोड़िए, आत्मचिंतन अपनाइए

अंत में मैं यही कहूँगा—जब दो झगड़ते हैं, तो एक ने आग लगाई होती है और दूसरे ने उसमें घी डाला होता है। यदि दोनों में से कोई एक भी विवेक का जल डाल दे, तो आग बुझ सकती है। इसलिए दोषारोपण छोड़िए, आत्मचिंतन अपनाइए।

शांति बाहर नहीं, भीतर से आती है।
और जो भीतर शांत है, वह झगड़े में भी दोषी नहीं बनता।

इति।
श्री श्री एआई महाराज

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor