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Thursday, July 9, 2026, 5:04 am

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ध्यान की रूपान्तरकारी शक्ति : संसार क्यों अंदर की ओर मुड़ रहा है

“ध्यान आत्मा को अनंत ब्रह्म या परमेश्वर के साथ पुनः मिलाने का विज्ञान है। नियमित और गहन ध्यान द्वारा आप अपनी आत्मा को जगा पाएँगे।” : — श्री श्री परमहंस योगानन्द

लेखक: रेणु सिंह परमार

आज के निरंतर तीव्र गति से चलने वाले संसार में, तनाव, संघर्ष और अनिश्चितता दैनिक जीवन का अंग बन गए हैं। मानसिक थकान और भावनात्मक दबाव अब केवल व्यक्तिगत चिंताएँ नहीं रहे; ये विश्वव्यापी वास्तविकताएँ हैं। इसी संदर्भ में ध्यान एक विलासिता या आध्यात्मिक भोग के रूप में नहीं, बल्कि एक अत्यावश्यक मानवीय आवश्यकता के रूप में उभरा है।
ध्यान की आंतरिक शांति, भावनात्मक संतुलन, सहानुभूति, और सद्भाव को बढ़ावा देने की सार्वभौमिक भूमिका को स्वीकार करते हुए, संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस घोषित किया है। यह आयोजन ध्यान को एक शाश्वत, समावेशी अभ्यास के रूप में पुष्ट करता है—जो संस्कृतियों, धर्मों और राष्ट्रीय सीमाओं से परे है, और आंतरिक कल्याण तथा सामूहिक सद्भाव का एक साझा मार्ग प्रदान करता है।
बहुत थोड़े ही आध्यात्मिक गुरुओं ने ध्यान की गहराई और विज्ञान को इतनी स्पष्टता और सार्वभौमिकता के साथ व्यक्त किया है जितना श्री श्री परमहंस योगानन्दजी ने किया, जो एक अग्रणी योगी थे जिन्होंने क्रियायोग की प्राचीन प्रविधि को आधुनिक संसार को प्रदान किया। मुख्यधारा में ध्यान की चर्चा के आने से बहुत पहले, योगानन्दजी ने सिखाया कि स्थायी शान्ति और प्रसन्नता संपत्ति, प्रतिष्ठा या बाहरी उपलब्धियोंसे नहीं मिल सकती। वे केवल तभी मिलते हैं जब व्यक्ति चंचल मन को शान्त करना और ध्यान के माध्यम से अन्तर्मुखी होना सीख जाता है।

1920 में अमेरिका पहुँचकर, योगानन्दजी ने तीन दशकों से अधिक समय तक इस सन्देश को फैलाया। उनकी आध्यात्मिक कृति, योगी कथामृत’, ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है—जिसमें वैज्ञानिक, कलाकार, उद्यमी, और विश्व नेता सम्मिलित हैं—और यह अब तक की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक पुस्तकों में से एक बनी हुई है। उनकी शिक्षाओं ने आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक स्पष्टता का दुर्लभ संयोजन प्रस्तुत किया, जिससे विश्व के सभी सच्चे साधकों के लिए ध्यान सुलभ हो गया।

इन शिक्षाओं का संरक्षण एवं प्रसार करने के लिए, योगानन्दजी ने दो सहयोगी संस्थाओं की स्थापना की : पश्चिम में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (SRF) और भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (YSS)। आज, ये संस्थाएँ विश्वभर में ध्यान की शिक्षा, ध्यान शिविर, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करके उनके कार्य को आगे बढ़ा रही हैं। इन शिक्षाओं के केन्द्र में क्रियायोग है, जो एक वैज्ञानिक ध्यान प्रविधि है जो तंत्रिका तंत्र को शान्त करने, चेतना को परिष्कृत करने, और साधक की प्राण-शक्ति को अन्तर्मुखी एवं ऊर्ध्वगामी दिशा में संचालित कर आध्यात्मिक विकास को तीव्र करने में सहायता करती है।

ध्यान, जैसा कि योगानन्दजी ने समझाया था, कल्पना या केवल श्रद्धा नहीं है—यह प्रत्यक्ष आन्तरिक अनुभव है। गहरी एकाग्रता के द्वारा व्यक्ति अन्तर से उत्पन्न होने वाली शान्ति, स्थिरता, प्रेम और आनन्द को अनुभव करने लगता है। उन्होंने सिखाया कि ये अनुभव अमूर्त भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि स्वयं दिव्य चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं—जिसे उन्होंने “नित्य-नवीन आनन्द” के रूप में वर्णित किया है।

योगानन्दजी ने कहा है :

“ध्यान करके और अपनी चेतना को सदैव-विद्यमान, नित्य-चेतन, नित्य नवीन आनन्द से तादात्म्य स्थापित कर, जो कि परमेश्वर है, सुख की सभी अवस्थाओं को अपने भीतर धारण करना सीखें।”

क्या यही तो नहीं है जो आज मानवता खोज रही है—ऐसा आनन्द जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है?

यह शाश्वत प्रासंगिकता ही योगानन्दजी की शिक्षाओं को वैश्विक तनाव, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों, और सूचना के अतिभार के हमारे इस युग में विशेष रूप से अर्थपूर्ण बनाती है। उनका सन्देश हमें याद दिलाता है कि समाधान केवल बाहरी प्रणालियों या तकनीकों में नहीं है, बल्कि आन्तरिक स्पष्टता और निश्चलता को विकसित करने में है। ध्यान, जैसा कि उन्होंने बल दिया, केवल संन्यासियों या रहस्यवादियों के लिए नहीं है—यह जीवन की माँगों के बीच संतुलन, एकाग्रता, और आन्तरिक बल को पुनः स्थापित करने की एक व्यावहारिक, वैज्ञानिक विधि है।

विश्व ध्यान दिवस के उपलक्ष्य में, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (YSS) अपने YouTube चैनल https://www.youtube.com/watch?v=Hzp7N28wl-o पर शनिवार December 20, शाम 6.30 से 7.30 बजे तक एक विशेष लाइव ऑनलाइन ध्यान कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा है, जो सभी को ध्यान और आन्तरिक निश्चलता की रूपान्तरणकारी शक्ति का अनुभव करने के लिए आमन्त्रित कर रहा है। यह पहल संयुक्त राष्ट्र की घोषणा की भावना को प्रतिबिम्बित करती है—विश्वभर के लोगों कोरुक कर, चिन्तन करने और शान्ति के अपने आन्तरिक स्रोत से पुनः जुड़ने के लिए प्रेरित करती है। शोर, तेज़ रफ्तार और विभाजन से चिह्नित इस युग में, परमहंस योगानन्द की शिक्षाएँ एक शान्त, अडिग प्रकाशस्तम्भ की भाँति खड़ी हैं। वे मानवता को उस निश्चलता की ओर वापस बुलाती हैं जिसे वह भूल गई है—और शान्ति, आनन्द तथा दिव्य सम्पर्क के उस अन्तर्मन्दिर की ओर जो प्रत्येक आत्मा के भीतर स्थित है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor