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Thursday, July 9, 2026, 4:10 am

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शास्त्र सम्मत और पर्यावरण-अनुकूल मकर संक्रांति!

कृतिका खत्री. दिल्ली 

मनुष्य उत्सव प्रिय प्राणी है। विभिन्न उत्सवों के माध्यम से वह अपने मन की भावनाएँ व्यक्त करता है। हिंदू धर्म में उत्सवों के माध्यम से केवल धार्मिकता ही नहीं, बल्कि प्रत्येक उत्सव, पर्व और व्रत मनुष्य को प्रकृति के और अधिक निकट ले जाने वाला होता है। इन्हीं में से एक है मकर संक्रांति। यह एक प्राकृतिक पर्व है, अर्थात प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने वाला उत्सव। दक्षिण भारत में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है। सिंधी समाज इसे ‘तिरमौरी’ कहते हैं। महाराष्ट्र तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है और गुजरात में यह पर्व ‘उत्तरायण’ के नाम से प्रसिद्ध है।

मकर संक्रांति का काल : मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम भाव बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन लोग ‘तिलगुड़ लो, मीठा बोलो’ कहकर ईर्ष्या-द्वेष भूलकर एक-दूसरे के निकट आते हैं। अन्य पर्वों की तरह यह तिथि-आधारित नहीं है। वर्तमान में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। सूर्य की गति के कारण कभी-कभी यह एक दिन आगे बढ़कर 15 जनवरी को भी आती है। वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को है। हिंदू धर्म में संक्रांति को देवी माना गया है। मान्यता है कि संक्रांति देवी ने संकरासुर नामक दैत्य का वध किया था। संक्रांति के अगले दिन को ‘किंक्रांत’ या ‘करिदिन’ कहा जाता है, जिस दिन देवी ने किंकरासुर का वध किया।

मकर संक्रांति का महत्व :  इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक वातावरण अधिक चैतन्यमय होता है, जिससे साधना करने वालों को विशेष लाभ मिलता है। कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को ‘दक्षिणायन’ कहा जाता है। मान्यता है कि दक्षिणायन की अपेक्षा उत्तरायण में मृत्यु होना अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।

मकर संक्रांति के पर्वकाल में दान का महत्व :  मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक का काल पर्वकाल कहलाता है। इस समय किए गए पुण्य कर्म विशेष फलदायी माने जाते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस काल में दान, जप और धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यधिक महत्व है। मान्यता है कि इस समय दिया गया दान पुनर्जन्म में सौ गुना फल देता है।

हल्दी-कुमकुम का महत्व :  मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक हल्दी-कुंकू के कार्यक्रम किए जाते हैं। मकर संक्रांति के दिन ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी सक्रिय होती है। सूर्य के उत्तरायण में ब्रह्मांड में रज-सत्त्व तरंगें अधिक होती हैं। ऐसे अनुकूल समय में हल्दी-कुंकू करना लाभदायक माना जाता है। इसके माध्यम से हम सुवासिनि के रूप में घर पधारी साक्षात आदिशक्ति की ही पूजा करते हैं।

वाण देना :  शास्त्रों में बताया गया है कि नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, तिल पात्र, गुड़, गाय, घोड़ा, सोना या भूमि का यथाशक्ति दान करना चाहिए। मकर संक्रांति के अवसर पर सुवासिनियों को हल्दी-कुंकू के साथ जो दान दिया जाता है, उसे ‘वाण देना’ कहते हैं। आजकल अधार्मिक वस्तुएँ वाण में देने की गलत परंपरा चल पड़ी है। वाण में दी जाने वाली वस्तुएँ सात्त्विक होनी चाहिए। सात्त्विक वाण देना धर्मप्रसार है और इससे ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है। जैसे—सौभाग्य की वस्तुएँ, अगरबत्ती, उबटन, धार्मिक ग्रंथ, पोथियाँ, देवताओं के चित्र आदि आध्यात्मिक वस्तुएँ वाण में देनी चाहिए।

सुगड़ का वाण देना :  मकर संक्रांति के अवसर पर ‘सुगड़’ का वाण दिया जाता है। सुगड़ मिट्टी का छोटा घड़ा होता है। उस पर हल्दी-कुंकू लगाया जाता है और धागा लपेटा जाता है। उसमें गाजर, बेर, गन्ने के टुकड़े, मटर, सेम की फलियाँ, कपास, चना, तिलगुल, हल्दी-कुंकू आदि रखे जाते हैं। फिर पाट पर रंगोली बनाकर पाँच सुगड़ रखे जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इनमें से तीन सुगड़ सुहागिन स्त्रियों को दान दिए जाते हैं, एक तुलसी को और एक अपने लिए रखा जाता है।

मकर संक्रांति के समय तीर्थ स्नान का महत्व :  इस काल में तीर्थ स्नान करने से महा पुण्य प्राप्त होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पुण्यकाल माना जाता है। इस समय गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के तट पर स्नान करने से विशेष पुण्य मिलता है।

तिलगुड़ बाँटना :  तिलगुड़ का सेवन करने से अंतरात्मा की शुद्धि होती है और साधना अच्छी होती है। दूसरों को तिलगुड़ देने से पहले उसे भगवान के सामने रखने से वह प्रसाद बन जाता है और उसमें शक्ति व चैतन्य बना रहता है। सामने वाले को तिलगुड़ देने से उसके भीतर प्रेम भाव और सकारात्मकता बढ़ती है।

बच्चे का जन्म :  शिशु के जन्म के बाद आने वाली पहली मकर संक्रांति पर ‘शिशु मंगल संस्कार’ संस्कार किया जाता है। इसके लिए बच्चे के लिए विशेष कपडा सिलवाया जाता है। पहले औक्षण किया जाता है, फिर बच्चे के सिर पर बेर, गन्ने के टुकड़े, मूँगफली की फलियाँ और मुरमुरे एक साथ डाले जाते हैं। अन्य बच्चे नीचे गिरे पदार्थ उठाकर खाते हैं। इसके बाद सुवासिनियों को हल्दी-कुमकुम दिया जाता है। मान्यता है कि इस संस्कार से बच्चे को आने वाली गर्मी से कोई बाधा नहीं होती और उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। यह संस्कार मुख्यतः महाराष्ट्र में प्रचलित है।

मकर संक्रांति के दिन काले वस्त्र पहनने की गलत परंपरा :  आजकल मकर संक्रांति के दिन छोटे बच्चे और सुवासिनियाँ काले वस्त्र पहनते हैं। किंतु ‘मकर संक्रांति के दिन काले वस्त्र पहनने चाहिए या पहन सकते हैं’—इसका किसी भी धर्मग्रंथ में आधार नहीं है। इसलिए इस दिन काले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए। संदर्भ :  सनातन संस्था का ग्रंथ “त्यौहार, धार्मिक उत्सव, एवं व्रत

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor