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Thursday, July 9, 2026, 4:58 am

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Lifestyle

घर: रामानन्द काबरा

चिठ्ठी आई है…
(भाग–1 : घर)

घर…
चार दीवारों का नाम नहीं होता।
घर वह जगह होती है
जहाँ लौटने की जल्दी होती है
और रुकने की इच्छा।
लेकिन क्या आज
हमारे पास घर हैं
या केवल पते?
अमेरिका में एक भारतीय उद्योगपति
सर हेनरी फोर्ड से मिलने पहुँचे थे।
मन में हजार सवाल थे—
कि इतना बड़ा आदमी
इतना बड़ा कैसे बन गया?

लेकिन जो दृश्य उन्होंने देखा,
वह किसी किताब में नहीं लिखा था।इतना बड़ा उद्योगपति
खाना खाकर
अपने बर्तन स्वयं धो रहा था।
भारतीय अतिथि
संकोच और आश्चर्य के बीच बोले—
“सर, यह काम तो कोई नौकर कर सकता था।”
फोर्ड मुस्कराए।
मुस्कान में अहंकार नहीं,
सहजता थी।
“मित्र,” उन्होंने कहा,
“जो काम मैं कर सकता हूँ,
उसके लिए पराधीन क्यों रहूँ?
और फिर—
मेरे जूठे ही तो थे।”
वह क्षण
एक उत्तर नहीं था,
एक प्रश्न था—
सभ्यता से।

हम भारतीय
जैसे ही थोड़ी समृद्धि छूते हैं,
काम से दूरी बना लेते हैं।
काम नहीं,
काम की आदत छूट जाती है।
घर में
नौकर,
ड्राइवर,
मेड,
केयरटेकर—
मानो सुविधा नहीं,
सामाजिक स्टेटस का प्रमाण हों।

धीरे–धीरे
अपने हाथ
अपने ही जीवन से
हट जाते हैं।
और जब हाथ हटते हैं,
तो शरीर भी साथ छोड़ने लगता है।
फिटनेस गिरती है,
ऊर्जा घटती है,
और डॉक्टर
घर का स्थायी सदस्य बन जाता है।

मेरे एक मित्र के घर का दृश्य
आज भी मन में अटका है।
छह बड़े,
चार छोटे बच्चे,
और सात कर्मचारी।
घर नहीं,
रेल का जनरल कम्पार्टमेंट।

हर समय
कोई न कोई आवाज़,
कोई न कोई आदेश,
कोई न कोई शिकायत।
तीन दिन बाद
घर आई दादी
अपने बेटे से बोलीं—
“राजेश,
मुझे छोटे वाले के घर भेज दे।
यहाँ अपने कम,
बाहर वालों की भीड़ ज़्यादा है।
मेरा दम घुट रहा है…”
दादी की बात में
कोई गुस्सा नहीं था,
बस थकान थी।

आज नौकर रखना
मजबूरी नहीं,
मिनिमम रिक्वायरमेंट बन चुका है।
बच्चों के साथ
केयरटेकर,
बच्चों के बच्चों के साथ
केयरटेकर।
25 हज़ार मासिक तनख्वाह,
उसको रखने के लिए
40–50 हज़ार का कमीशन,
अजनबी नाम,
अजनबी पहचान।
और अगर कोई परिवार
यह खर्च नहीं उठा सकता—
तो वही घर
तनाव का केंद्र बन जाता है।
सम्मान
झगड़े में बदल जाता है,
स्नेह
चुप्पी में,
और प्रेम
थकान में कहीं दब जाता है।
घर में सब हैं,
फिर भी
कोई साथ नहीं है।
बच्चे
माँ–बाप से कम
केयरटेकर से ज़्यादा जुड़ते हैं।
माँ–बाप
ऑफिस और स्क्रीन में उलझे हैं।
और बुज़ुर्ग
खामोशी के साथ जीना सीख रहे हैं।
घर अब घर नहीं,
एक मैनेजमेंट सिस्टम बन गया है।

कभी–कभी लगता है—
समृद्धि ने हमें
गरीब नहीं किया,
पर खाली ज़रूर कर दिया।
हमने सुविधाएँ बढ़ाईं,
पर संवाद घटा दिए।
काम छोड़ा,
पर जिम्मेदारी नहीं छोड़ी—
वह बस दूसरों पर डाल दी।

नेपथ्य में
किसी पुराने रेडियो से
धीमी आवाज़ आती है—
चिठ्ठी आई हैं
वतन से चिठ्ठी आई है…”
और दर्द
जैसे
धीरे–धीरे
रिसने लगता है।
घर को बचाना
कोई आंदोलन नहीं मांगता।
वह बस
थोड़ा हाथ लगाने,
थोड़ा समय देने
और थोड़ा झुकने की आदत
मांगता है।

पर सवाल यह है— क्या हम
फिर से घर लौटना चाहते हैं?

रामानंद काबरा
(9414070142)

(क्रमशः — भाग–2 : संबंध)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor