प्राकृतिक स्वास्थ्य साधना केंद्र के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजय उमराव ने गत दिनों एक चैनल को साक्षात्कार दिया था। पाठकों की डिमांड पर इसे राइजिंग भास्कर में पब्लिश किया जा रहा है।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान सबसे ज्यादा जिस चीज़ को खो रहा है, वह है — स्वास्थ्य और संतुलन। हर छोटी-बड़ी बीमारी के लिए हम सीधे दवाइयों का सहारा लेते हैं, लेकिन शायद हम यह भूल गए हैं कि हमारे आसपास मौजूद प्रकृति स्वयं एक जीवित औषधालय है। इसी सोच को जीवन का दर्शन बना चुके हैं स्वास्थ्य साधना केंद्र के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और प्रख्यात प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. अजय उमराव, जो वर्षों से बिना दवाइयों के लोगों को स्वस्थ जीवन की राह दिखा रहे हैं।
डॉ. उमराव मानते हैं कि शरीर कोई मशीन नहीं है जिसे बार-बार रासायनिक दवाइयों से ठीक किया जाए, बल्कि यह एक जीवित प्रणाली है, जिसे समझने, सुनने और प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलाने की जरूरत है। उनकी चिकित्सा पद्धति का मूल मंत्र है — डिटॉक्स, अनुशासन और प्रकृति से जुड़ाव।
इसी दर्शन को समझने और आमजन तक पहुंचाने के उद्देश्य से उनसे हुई यह विस्तृत बातचीत प्रस्तुत है।
प्राकृतिक चिकित्सा क्या है? आयुर्वेद से कैसे अलग है?
डॉ. अजय उमराव बातचीत की शुरुआत करते हुए एक आम भ्रम को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं, “लोग अक्सर प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में मूलभूत अंतर है। आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों, चूर्ण, काढ़े और औषधियों का उपयोग किया जाता है। लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी तरह की दवा का प्रयोग नहीं होता।”
उनके अनुसार प्राकृतिक चिकित्सा पूरी तरह से पंचमहाभूतों पर आधारित है —आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।
इन्हीं पांच तत्वों से हमारा शरीर बना है और इन्हीं तत्वों के माध्यम से शरीर को संतुलित कर बीमारियों का उपचार किया जाता है।
वे मुस्कुराते हुए एक आध्यात्मिक उदाहरण भी देते हैं,
“भगवान शब्द भी पंचतत्वों से जुड़ा है —
भ से भूमि,
ग से गगन,
व से वायु,
अ से अग्नि,
और न से नीर यानी जल।
जब इंसान इन पांच तत्वों के साथ सामंजस्य में रहता है, तब बीमारी खुद दूर रहने लगती है।”
डिटॉक्स ही असली इलाज है
डॉ. उमराव की चिकित्सा पद्धति का केंद्र बिंदु है — डिटॉक्सिफिकेशन।
वे बताते हैं, “प्राकृतिक चिकित्सा का सिद्धांत है — शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना। जब शरीर में गंदगी, टॉक्सीन और अवांछित पदार्थ जमा हो जाते हैं, तब बीमारी जन्म लेती है। जैसे ही शरीर साफ होता है, इंसान खुद को हल्का, ऊर्जावान और स्वस्थ महसूस करने लगता है।”
वे शरीर की तुलना एक गाड़ी से करते हैं, “जैसे गाड़ी 10 हजार किलोमीटर चलने के बाद सर्विस मांगती है, वैसे ही शरीर भी समय-समय पर मेंटेनेंस मांगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि गाड़ी की सर्विस तारीख से तय होती है, शरीर की नहीं।”
स्वास्थ्य साधना केंद्र में इसके लिए विशेष तकनीक अपनाई जाती है। “हमारे पास एक मशीन है, जिससे पानी के माध्यम से आंतों की सफाई की जाती है। अगर पेट साफ रहेगा, तो आधी बीमारियां अपने आप खत्म हो जाएंगी।”
वे एक चौंकाने वाला उदाहरण भी साझा करते हैं, “न्यूयॉर्क में एक शोध के दौरान 248 शवों की आंतों की जांच की गई। आंतों में सीमेंट जैसा जमा हुआ मल पाया गया, जिसे हथौड़े से तोड़ना पड़ा। उसमें कीड़े तक लग गए थे। अगर हम अपने शरीर की सफाई नहीं करेंगे, तो जीते-जी हमारी हालत भी ऐसी हो सकती है।”
जल चिकित्सा: हजारों बीमारियों की औषधि
डॉ. उमराव कहते हैं कि मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना है। “पानी सिर्फ प्यास बुझाने के लिए नहीं है, यह एक शक्तिशाली उपचार माध्यम है।” वे जल चिकित्सा के कुछ सरल लेकिन प्रभावी उदाहरण देते हैं —
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दस्त होने पर ठंडे पानी की पट्टी पेट पर रखने से राहत मिलती है।
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बुखार में गर्म पानी में पैर डुबोने से शरीर का तापमान संतुलित होता है।
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शुगर के मरीजों को गर्म और ठंडे पानी में बिठाने से लाभ मिलता है।
उनका मानना है कि अगर पानी को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो यह शरीर की प्राकृतिक हीलिंग पावर को कई गुना बढ़ा देता है।
मिट्टी से जुड़ाव: इम्युनिटी का प्राकृतिक टीका
मिट्टी चिकित्सा पर बात करते हुए डॉ. उमराव का स्वर भावुक हो जाता है। “पहले लोग मिट्टी में चलते थे, घास पर नंगे पांव टहलते थे, मिट्टी में खेलते थे, कुश्ती लड़ते थे। इसी वजह से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती थी।” वे बताते हैं कि आज भी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले और मिट्टी के घरों में रहने वाले लोग अपेक्षाकृत ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। “मिट्टी के घर गर्मी में ठंडे और सर्दी में गर्म रहते हैं। कोरोना काल में भी देखा गया कि झुग्गियों में रहने वालों पर बीमारी का असर कम हुआ, क्योंकि उनकी इम्युनिटी मजबूत थी।”
प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी का लेप गैस, एसिडिटी, सोरायसिस और एक्जिमा जैसी बीमारियों में उपयोग किया जाता है। वे आधुनिक जीवनशैली पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं, “आज लोग रबर और प्लास्टिक की चप्पल पहनते हैं, जिससे शरीर का धरती से संपर्क टूट जाता है। इससे बीपी बढ़ता है और स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। कपड़े या चमड़े की चप्पल पहननी चाहिए, ताकि धरती से जुड़ाव बना रहे।”
उपवास: प्राकृतिक चिकित्सा का ब्रह्मास्त्र
डॉ. उमराव के अनुसार उपवास प्राकृतिक चिकित्सा का सबसे शक्तिशाली हथियार है। “जब हम खाना बंद करते हैं, तब शरीर खुद को ठीक करने में लग जाता है।” वे बताते हैं कि पुराने अर्थराइटिस जैसे मामलों में भी उन्होंने 5 से 7 दिन तक सिर्फ पानी पर रखकर बेहतरीन परिणाम देखे हैं। “टॉक्सीन निकालने में पानी सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।”
आहार ही औषधि है
डॉ. उमराव का साफ संदेश है —“आप जैसा खाते हैं, आप वैसे ही बनते हैं।” वे कहते हैं कि हमारे किचन में ‘मृत आहार’ नहीं होना चाहिए। मैदा, चाउमीन, बर्गर, प्रोसेस्ड फूड — ये सब मृत आहार हैं। वहीं करेले का जूस, ताजे फल और सब्जियां — जीवित आहार हैं।
वे चेतावनी देते हैं, “हम भगवान द्वारा दिए गए फलों और सब्जियों के साथ छेड़छाड़ करते हैं। मिक्स फ्रूट बनाकर उसमें नमक, मसाले डाल देते हैं। जब प्रकृति की बनाई चीजों से छेड़छाड़ करेंगे, तो परिणाम भी भुगतना पड़ेगा।”
जैविक घड़ी और शरीर का समय चक्र
डॉ. उमराव शरीर की जैविक घड़ी को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। वे बताते हैं कि हर अंग का अपना समय होता है —
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रात 1-2 बजे: लिवर सक्रिय
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3-5 बजे: फेफड़े
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5-7 बजे: बड़ी आंत
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7-9 बजे: पेट
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9-11 बजे: अग्नाशय
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11-1 बजे: हृदय
वे सुझाव देते हैं कि सुबह चाय-कॉफी की जगह नारियल पानी, छाछ या मिलेट्स लें।
“कैफीन और निकोटिन शरीर के लिए जहर हैं। चीनी धीरे पचती है और बीमारियों की जड़ बनती है।”
किन बीमारियों में प्राकृतिक चिकित्सा असरदार है?
डॉ. उमराव साफ कहते हैं कि आपातकालीन स्थितियों में प्राकृतिक चिकित्सा तुरंत काम नहीं करती। लेकिन जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में यह बेहद प्रभावी है, जैसे —कब्ज, गैस, एसिडिटी, बैक पेन, साइटिका, फैटी लिवर, डायबिटीज, घुटनों का दर्द, हाई ब्लड प्रेशर।
स्वस्थ जीवन का अंतिम मंत्र
बातचीत के अंत में डॉ. उमराव अपने जीवन दर्शन को एक पंक्ति में समेट देते हैं —“पैर गर्म, पेट नरम और सिर ठंडा रहना चाहिए। अगर यह संतुलन बना रहा, तो बीमारी पास भी नहीं आएगी।”
वे लोगों को संदेश देते हैं —“अपनी जीवनशैली नियमित करें, आहार शुद्ध और संयमित रखें, और प्रकृति के नियमों का पालन करें। आप सिर्फ बीमारियों से नहीं बचेंगे, बल्कि एक खुशहाल और ऊर्जावान जीवन जिएंगे।”
निरोग रहने का सूत्र : प्रकृति से नाता जोड़ें
डॉ. अजय उमराव का यह इंटरव्यू हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि शायद इलाज हमारे आसपास ही है — हवा में, पानी में, मिट्टी में और हमारे अपने अनुशासन में। जरूरत है तो बस प्रकृति से दोबारा रिश्ता जोड़ने की। आज जब हर बीमारी का समाधान गोली में ढूंढा जा रहा है, ऐसे में प्राकृतिक चिकित्सा हमें याद दिलाती है कि शरीर को ठीक करने की सबसे बड़ी शक्ति शरीर के अंदर ही होती है।



