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Thursday, July 9, 2026, 6:14 am

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Lifestyle

हर घर की शबरी : डॉ. रामानंद काबरा

(भावात्मक, संवेदनशील और सशक्त संदेश)

आज मेरे प्रभु मेरे द्वार आए

वर्षों से अपने राम की प्रतीक्षा में बैठी माँ शबरी—
जब यह समाचार मिला कि आज मेरे प्रभु मेरे द्वार आए हैं,
तो उसका तन-मन, उसकी आँखें, उसका रोम-रोम
प्रेम से छलक उठा।
घर आया अतिथि…
और वह भी स्वयं भगवान।
पर एक गरीब भीलनी के पास देने को था ही क्या?
न सोने की थाली, न चाँदी का पात्र।
बस आँगन में लगा बेर का पेड़।
शबरी ने बेर तोड़े—
पर सहसा ठिठक गई।
कहीं कोई बेर खट्टा न निकल जाए…
उसने एक-एक बेर अपने दाँतों से चखा,
जो मीठा लगा—वही राम को परोसा।
राम ने उन्हें सहर्ष स्वीकार किया।
प्रेम से खाया।
लक्ष्मण का क्रोध भरा दृष्टि-पात—
और राम का शांत संकेत।
उस क्षण राम बेर नहीं खा रहे थे,
वे माँ के प्रेम की परीक्षा में उत्तीर्ण हो रहे थे।
और यही क्षण भारतीय संस्कृति की आत्मा बन गया।

आज सदियाँ बीत गईं…
राम वन से लौट आए…
पर शबरी ओर उसके भाव, उसका प्रेम आज भी जीवित है।
वह हर घर में है।
सुबह माँ बच्चों का टिफिन बनाती है
सब्ज़ी में नमक ज़्यादा तो नहीं?
पहले स्वयं चख लेती है।
फल काटते समय देखती है—
कहीं कठोर ओर खट्टा तो नहीं?
दूध उबालते हुए सूँघ लेती है—
खट्टा तो नहीं?
पति के लिए टिफिन सजता है—
रोटी गरम कैसे रहे,
सलाद ताज़ा हो,
दही ठीक हो,
नमक-शक्कर अलग रखी जाए—
ताकि खाने में खटास न आ जाए।
बच्चा स्कूल से लौटे—
फल देने से पहले जाँच।
सैंडविच बने—
खीरा कड़वा तो नहीं?
ब्रेड पर फफूँद तो नहीं?

सास-ससुर की दवाइयाँ—
एक-एक स्ट्रिप देखी जाती है,
कहीं एक्सपायर तो नहीं?
गेहूँ पिसवाने से पहले—
घुन तो नहीं?
खीर परोसने से पहले—
खट्टी तो नहीं हो गई?

कितनी ही चीज़ें…
हर बार वही प्रक्रिया—
पहले स्वयं चखना,
फिर अपनों को देना।
कभी-कभी लगता है—
हर घर में एक स्त्री
शबरी की भूमिका में ही तो है।
वह अपने स्वाद से पहले
हमारी सुरक्षा देखती है।
अपने आराम से पहले
हमारा स्वास्थ्य।
अपने सुख से पहले
हमारी चिंता।
और हम?
हम निश्चिंत रहते हैं—
क्योंकि जो थाली हमारे सामने है,
वह शबरी द्वारा चखी हुई है।

यह कहानी त्याग का महिमामंडन नहीं है।यह स्मरण है।

स्मरण इस बात का कि—
स्त्री का यह प्रेम कर्तव्य नहीं,
संवेदनशील चेतना है।
और यदि समाज
इस प्रेम को
सिर्फ़ “स्वाभाविक” मानकर
नज़रअंदाज़ कर दे—
तो यह संस्कृति नहीं,
अन्याय बन जाता है।

शबरी को सम्मान चाहिए,
सहभागिता चाहिए,
और कभी-कभी—
बस यह पूछ लिया जाना चाहिए—
आज तुमने क्या खाया?”

जिस समाज में
हर घर में एक शबरी है,
वह समाज भूखा नहीं मरता।
पर यदि कृतज्ञता मर जाए—
तो संवेदना अवश्य मर जाती है।

आइए,हर घर की शबरी को
श्रद्धा ही नहीं—
सम्मान भी दें।

डॉ. रामानंद काबरा
9414070142

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor