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Thursday, July 9, 2026, 6:29 am

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Lifestyle

विश्वास की पहली किस्त : डॉ. रामानंद काबरा

लघु कथा : डॉ. रामानंद काबरा

शहर के एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट में मेरा परिवार, एक मित्र के परिवार के साथ बैठा था।
भीड़ थी, ऑर्डर हो चुका था, समय लगना तय था—और हमें कोई जल्दी भी नहीं थी।
तभी पास की खाली टेबल पर एक दम्पति अपने दो बच्चों के साथ आकर बैठा।
उन्होंने वेटर को ऑर्डर दिया और चुपचाप मेन्यू कार्ड में 100 रुपये का नोट रख दिया।
मैं समझ गया—टिप पहले दी जा चुकी थी।

उस शाम मैंने एक दिलचस्प दृश्य देखा। वेटर हर बार तेज़ क़दमों और बड़ी मुस्कान के साथ उसी टेबल की ओर बढ़ता रहा।
हमारा डिनर भी ठीक था, पर उनकी सर्विस खास थी।
डिनर के अंत में हमने भी टिप दी—
पर तब तक समझ आ चुका था कि
विश्वास की पहली किस्त पहले भरने वाला, सेवा ज़्यादा एन्जॉय करता है।

हम रोज़ यही पैटर्न ज़िंदगी में देखते हैं—शादी से पहले—
उपहार,समय,ध्यान,आदर,
बातों की गरमाहट,
और हर पल “अच्छा महसूस *कराने” की कोशिश।
लेकिन शादी के बाद
जैसे सब कुछ सामान्य होने लगता है, और यह सिलसिला थम सा लगने लगता है, इसे सहज लिए जाने लगता।परिणाम..
यहीं से रिश्तों में खिंचाव शुरू होता है। फिर शिकायतें जन्म लेती हैं,
और कई बार परिणाम बहुत कड़वे हो जाते हैं।

यह सच है कि
जो चीज़ मिलने से पहले आकर्षक लगती है,वह मिलने के बाद सामान्य हो जाती है—
लेकिन समझदार लोग जानते हैं कि रिश्तों में आकर्षण नहीं, उष्णता बनाए रखनी होती है।

जबकि आज के स्मार्ट लोग
रेस्टोरेंट वाले उस दम्पति की तरह सोचते हैं—
वे सेवा का इंतज़ार नहीं करते,
वे पहले भरोसा जमा करते हैं।
कई बार कोई कह देता है—
“मैं ही क्यों हर बार पहल करूँ?”
तो मित्र,यह हसीन ख़्वाब किसने दिखाए थे?
शुरुआत जिसने की थी,
निभाने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है।ओर रिश्ते व्यापार नहीं होते, जंहा हिसाब रखा जाए।

ऐसे ही जब एक ड्राइवर यह तय कर लेता है कि उसे सुरक्षित ड्राइविंग करनी है—तो संभावित दुर्घटनाएँ रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं।
एक स्मार्ट पिता अपने बच्चे से यह नहीं कहता—
“फर्स्ट आएगा तो इनाम मिलेगा।”
वह पहले ही कह देता है—
“मुझे भरोसा है, तू अच्छा करेगा।”
और एडवांस में ही उपहार थमा देता है।
वह बच्चे पर
तनाव नहीं, भरोसा डालता है।
परिणाम यह होता है कि
बच्चा शायद टॉप न करे,
पर उसका प्रयास ईमानदार और अथक होता है।

एक संगीत शिक्षक
क्लास में पहले ही कह देता है—
“आप सबको ‘A ग्रेड’ मिलेगा।”
फिर जोड़ देता है—
“लिखकर नहीं, करके दिखाना है।”

और बच्चे
वही कर दिखाते हैं,
जो उन्होंने सुन लिया था।
क्योंकि-भरोसा आदेश नहीं देता—
भरोसा प्रेरणा बन जाता है।
इसीलिए जीवन में
परम्परागत नहीं, स्मार्ट वे चुनिए।

जो लोग विश्वास की पहली किस्त
पहले भर देते हैं—ओर नियमित यथा समय भरते रहते है
उन्हें शिकायते ओर उलाहना नहीं झेलना पड़ता।
रिश्ते हों, बच्चे हों,
काम हो या जीवन—
जहाँ भरोसा पहले जाता है,
वहाँ परिणाम खुद चलकर आता है।

डॉ. रामानंद काबरा
94140 70142

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor