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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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स्वर्णनगरी में सहकारिता पर संकट: द सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक से ग्रामीणों को पैसा नहीं, कलेक्टर-चेयरमैन से जवाब तलब

जिले के कई गांवों से लोग 15, 50 और 70 किलोमीटर की दूरी तय कर बैंक शाखाओं तक पहुंच रहे हैं। अधिकांश लोग मजदूर, किसान और छोटे व्यापारी हैं, जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें इन्हीं जमा पैसों पर निर्भर हैं। लेकिन काउंटर पर पहुंचते ही उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “कैश उपलब्ध नहीं है” या “उच्च अधिकारियों के निर्देश हैं।”

कैलाश बिस्सा, जैसलमेर।

स्वर्णनगरी जैसलमेर में सहकारिता की रीढ़ मानी जाने वाली द सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक की हालत बद से बदतर होती जा रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आम ग्रामीणों को उनके अपने जमा पैसे तक नहीं मिल रहे। विडंबना यह है कि बैंक के चेयरमैन स्वयं जिला कलेक्टर हैं, फिर भी हालात सुधारने की दिशा में ठोस कदम नजर नहीं आ रहे। ग्रामीणों में आक्रोश पनप रहा है और आंदोलन की चेतावनी खुलकर सामने आ चुकी है।

दूर-दराज से आते ग्रामीण, खाली हाथ लौटते लोग

जिले के कई गांवों से लोग 15, 50 और 70 किलोमीटर की दूरी तय कर बैंक शाखाओं तक पहुंच रहे हैं। अधिकांश लोग मजदूर, किसान और छोटे व्यापारी हैं, जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें इन्हीं जमा पैसों पर निर्भर हैं। लेकिन काउंटर पर पहुंचते ही उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “कैश उपलब्ध नहीं है” या “उच्च अधिकारियों के निर्देश हैं।”

कई ग्रामीणों का कहना है कि वे सुबह से कतार में लगते हैं, दिन भर इंतजार करते हैं और शाम तक निराश लौटते हैं। आने-जाने में किराया, मजदूरी का नुकसान और समय की बर्बादी अलग से। ऐसे में बैंक की यह कार्यशैली सीधे-सीधे आम आदमी की आजीविका पर चोट है।

अधिकारी नदारद, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना

ग्रामीणों का आरोप है कि उच्च अधिकारी अपनी सीट पर उपलब्ध नहीं मिलते। एक वरिष्ठ प्रबंधक प्रहलादाराम ने भी “उच्च अधिकारियों के निर्देश” का हवाला देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि जब शीर्ष पदाधिकारी ही जवाबदेह नहीं होंगे, तो आम उपभोक्ता अपनी शिकायत किसके सामने रखे?

बैंक प्रशासन की यह उदासीनता सहकारिता की मूल भावना के विपरीत है। सहकारी बैंक का उद्देश्य ही ग्रामीणों और किसानों को सुगम वित्तीय सेवाएं देना होता है, लेकिन यहां स्थिति उलट दिख रही है।

चेयरमैन कलेक्टर, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

बैंक के चेयरमैन स्वयं जिला कलेक्टर हैं। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर त्वरित हस्तक्षेप की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि अब तक न तो कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया गया और न ही स्थिति सुधारने का रोडमैप साझा किया गया।

जब बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन समय पर मिल रहा है, तो फिर खाताधारकों को उनका अपना पैसा क्यों नहीं? यह सवाल अब हर गांव की चौपाल पर उठ रहा है।

पारदर्शिता का अभाव, भरोसे पर आघात

ग्रामीणों के अनुसार बैंक प्रबंधन कैश की उपलब्धता, भुगतान सीमा या तकनीकी दिक्कतों पर कोई स्पष्ट सूचना जारी नहीं करता। सूचना-पट पर अस्पष्ट नोटिस चस्पां कर दिए जाते हैं या मौखिक रूप से “उपर से आदेश” बता दिया जाता है।

यह स्थिति न केवल वित्तीय अव्यवस्था की ओर इशारा करती है, बल्कि जनता के भरोसे पर भी गहरा आघात है। सहकारी बैंक में जमा राशि अक्सर किसानों की फसल बिक्री, पेंशन, मनरेगा मजदूरी या छोटी बचत का परिणाम होती है। जब जरूरत के समय पैसा न मिले, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सामाजिक संकट है।

आंदोलन की चेतावनी

कई ग्रामीण प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो बैंक और प्रशासन के खिलाफ आंदोलन किया जाएगा। धरना-प्रदर्शन से लेकर उच्च स्तर पर शिकायत तक की तैयारी की बात सामने आ रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी टकराव के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन अपने हक के लिए आवाज उठाना मजबूरी बनती जा रही है। “हमारा पैसा, हमें ही नहीं मिल रहा”—यह वाक्य अब आम चर्चा का विषय है।

जवाबदेही तय हो

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में बैंक प्रबंधन को तत्काल निम्न कदम उठाने चाहिए—

  1. कैश उपलब्धता और भुगतान सीमा पर सार्वजनिक सूचना।

  2. अतिरिक्त कैश की व्यवस्था और विशेष काउंटर।

  3. दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों के लिए टोकन/समय-निर्धारण प्रणाली।

  4. शिकायत निवारण कक्ष और हेल्पलाइन।

  5. चेयरमैन स्तर पर समीक्षा बैठक और प्रेस ब्रीफिंग।

जब तक ठोस और पारदर्शी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक अव्यवस्था और अविश्वास बढ़ता ही जाएगा।

प्रशासन के लिए परीक्षा की घड़ी

यह मामला केवल बैंकिंग समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है। जिला कलेक्टर-चेयरमैन को स्वयं संज्ञान लेकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए—क्या वास्तव में कैश संकट है? यदि हां, तो कितने समय में समाधान होगा? क्या वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था (आरटीजीएस/एनईएफटी/डीबीटी) सुचारू है?

जब तक स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक सवाल उठते रहेंगे। ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे रहा है और सहकारिता की साख दांव पर है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर विषय

स्वर्णनगरी में सहकारिता बैंक की यह स्थिति चिंताजनक है। आम नागरिकों को उनका अपना पैसा न मिलना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर विषय है। बैंक प्रशासन और जिला प्रशासन को तत्काल प्रभाव से ठोस कार्रवाई कर भरोसा बहाल करना होगा। अन्यथा यह मुद्दा व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी जिम्मेदारी सीधे-सीधे संबंधित अधिकारियों पर होगी।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor