अक्सर निवेशक किसी कंपनी के शेयर लंबी अवधि के लिए खरीदकर डीमैट खाते में रख देते हैं। वे उन्हें बेचते नहीं, लेकिन बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण लंबे समय तक उनसे कोई अतिरिक्त आय नहीं होती। ऐसे में SLB व्यवस्था निवेशकों के लिए एक अतिरिक्त कमाई का विकल्प बनकर उभरी है।
दिलीप कुमार पुरोहित. मुंबई
9783414079 diliprakhai@gmail.com
अब तक आपने घर, दुकान या जमीन को किराये पर देकर हर महीने आय कमाने के बारे में सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके डीमैट अकाउंट में पड़े शेयर भी आपको “किराया” दे सकते हैं? पूंजी बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रही स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) व्यवस्था के जरिए अब निवेशक अपने शेयर कुछ समय के लिए उधार देकर नियमित आय अर्जित कर सकते हैं। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में शेयरों पर मिलने वाला डिविडेंड और बोनस जैसे कॉरपोरेट लाभ भी संरक्षित रहते हैं।
डीमैट में ‘सोए’ शेयर अब करेंगे कमाई
अक्सर निवेशक किसी कंपनी के शेयर लंबी अवधि के लिए खरीदकर डीमैट खाते में रख देते हैं। वे उन्हें बेचते नहीं, लेकिन बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण लंबे समय तक उनसे कोई अतिरिक्त आय नहीं होती। ऐसे में SLB व्यवस्था निवेशकों के लिए एक अतिरिक्त कमाई का विकल्प बनकर उभरी है।
इस सिस्टम में निवेशक (लेंडर) अपने शेयर निर्धारित अवधि के लिए उधार देते हैं और बदले में उन्हें एक तय शुल्क मिलता है। यह शुल्क कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे मकान का किराया।
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग एक विनियमित तंत्र है, जिसे एक्सचेंज और सेबी के दिशा-निर्देशों के तहत संचालित किया जाता है।
इसकी प्रक्रिया को आसान भाषा में समझें:
ब्रोकरेज सपोर्ट जरूरी – सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होता है कि आपका ब्रोकर SLB सुविधा देता है या नहीं। सभी ब्रोकर्स यह सेवा उपलब्ध नहीं कराते।
शेयर चुनना – निवेशक तय करता है कि वह किन शेयरों को उधार देना चाहता है और कितनी अवधि के लिए।
मांग और आपूर्ति का मिलान – जब कोई निवेशक (शॉर्ट सेलर) किसी शेयर को बेचने के उद्देश्य से उधार लेना चाहता है, तो एक्सचेंज प्लेटफॉर्म पर दोनों का मिलान किया जाता है।
शुल्क तय होता है – शेयर की मांग, उपलब्धता और अवधि के आधार पर लेंडिंग शुल्क तय होता है।
अवधि पूरी होने पर वापसी – तय समय पूरा होने पर उधार लेने वाला निवेशक समान संख्या में शेयर वापस करता है।
शॉर्ट सेलिंग से जुड़ा है खेल
अक्सर जो निवेशक शेयर उधार लेते हैं, वे “शॉर्ट सेलिंग” करते हैं। यानी वे पहले शेयर बेचते हैं, बाद में कम कीमत पर खरीदकर लौटाने की उम्मीद रखते हैं। यदि शेयर की कीमत गिरती है, तो उन्हें मुनाफा होता है।
लेकिन लेंडर यानी मूल शेयरधारक को इससे कोई लेना-देना नहीं होता। उसे तो तय शुल्क मिल जाता है, चाहे शेयर की कीमत गिरे या बढ़े।
डिविडेंड और अन्य लाभ का क्या?
निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि अगर शेयर उधार दे दिए, तो डिविडेंड या बोनस का क्या होगा? नियमों के अनुसार, यदि लेंडिंग अवधि के दौरान कंपनी डिविडेंड घोषित करती है, तो उसका समायोजन इस तरह किया जाता है कि मूल निवेशक को उसका लाभ मिल सके।
इसी तरह बोनस, स्प्लिट या अन्य कॉरपोरेट एक्शन की स्थिति में भी समुचित समायोजन होता है। यानी लेंडर का अधिकार सुरक्षित रहता है।
नियम और शर्तें
लेंडर के लिए न्यूनतम ऑर्डर वैल्यू तय होती है (आमतौर पर एक निश्चित राशि से अधिक)।
उधार लेने वाले को पर्याप्त मार्जिन जमा करना होता है।
लेंडिंग की अवधि कुछ दिनों से लेकर अधिकतम 12 महीनों तक हो सकती है, हालांकि अधिकतर सौदे छोटे समय के होते हैं।
ब्रोकर्स इस सेवा पर 15–18% तक कमीशन और जीएसटी वसूल सकते हैं।
जोखिम भी समझें
हालांकि यह व्यवस्था विनियमित है, फिर भी कुछ जोखिम मौजूद हैं:
यदि बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव हो, तो शॉर्ट सेलर को भारी नुकसान हो सकता है, जिससे सेटलमेंट पर असर पड़ सकता है।
सभी शेयर SLB के लिए उपलब्ध नहीं होते; केवल एक्सचेंज द्वारा स्वीकृत शेयर ही इस श्रेणी में आते हैं।
शुल्क की दर मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है, इसलिए निश्चित आय का दावा नहीं किया जा सकता।
किन निवेशकों के लिए उपयोगी?
वे निवेशक जो लंबे समय के लिए शेयर होल्ड करते हैं। जिनके पोर्टफोलियो में बड़े और लिक्विड शेयर हैं। जो अतिरिक्त आय चाहते हैं, लेकिन शेयर बेचना नहीं चाहते। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े निवेशक, संस्थागत फंड और हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल (HNI) इस सुविधा का अधिक उपयोग करते हैं, लेकिन अब रिटेल निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ रही है। एक उदाहरण से समझें
मान लीजिए आपके पास किसी बड़ी कंपनी के 1,000 शेयर हैं, जिनकी मौजूदा कीमत 500 रुपये प्रति शेयर है। कुल मूल्य हुआ 5 लाख रुपये। यदि आप इन्हें तीन महीने के लिए लेंडिंग प्लेटफॉर्म पर डालते हैं और 4% वार्षिक दर के हिसाब से शुल्क तय होता है, तो तीन महीने में आपको लगभग 5,000 रुपये के आसपास अतिरिक्त आय हो सकती है (दर और अवधि के अनुसार परिवर्तन संभव)। इस दौरान यदि कंपनी डिविडेंड देती है, तो उसका लाभ भी आपको समायोजन के रूप में मिल सकता है।
क्यों बढ़ रही है लोकप्रियता?
पैसिव इनकम का विकल्प – बिना शेयर बेचे अतिरिक्त आय।
पोर्टफोलियो का बेहतर उपयोग – निष्क्रिय पड़े एसेट को उत्पादक बनाना।
मार्केट इफिशिएंसी – शॉर्ट सेलिंग से बाजार में तरलता बढ़ती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे-जैसे निवेशकों में वित्तीय साक्षरता बढ़ेगी, SLB जैसे विकल्पों की मांग भी बढ़ेगी।
सावधानी क्या बरतें?
अपने ब्रोकर से सभी शुल्क और नियम लिखित में समझें। केवल उन्हीं शेयरों को लेंड करें जिन्हें आप लंबी अवधि तक रखना चाहते हैं। बाजार की स्थिति और कंपनी की बुनियादी मजबूती पर नजर रखें। मार्जिन और सेटलमेंट नियमों को समझे बिना कदम न उठाएं।
भविष्य की दिशा
भारतीय पूंजी बाजार तेजी से परिपक्व हो रहा है। डिजिटल डीमैट खातों की संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है। ऐसे में निवेशकों के लिए यह जरूरी है कि वे पारंपरिक खरीद-बिक्री से आगे बढ़कर नई वित्तीय संभावनाओं को समझें। स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था उसी दिशा में एक कदम है, जहां निवेशक अपने पोर्टफोलियो से अधिकतम लाभ ले सकते हैं। हालांकि यह कोई जोखिम-रहित योजना नहीं है, लेकिन समझदारी और जानकारी के साथ इसका उपयोग किया जाए तो यह नियमित आय का एक सशक्त साधन बन सकता है।



