दीवार फिल्म का संवाद बना हकीकत — गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों में रोष, भजनलाल सरकार पर पक्षपात का आरोप
दिलीप कुमार पुरोहित, जयपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
“आज खुश तो बहुत होगे तुम…?” — हिंदी सिनेमा की चर्चित फिल्म दीवार का यह संवाद कभी दो भाइयों के टकराव का प्रतीक बना था, लेकिन आज राजस्थान की पत्रकारिता में यह संवाद एक नई सच्चाई बयान कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दीवार दो भाइयों के बीच नहीं, बल्कि अधिस्वीकृत और गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों के बीच खड़ी कर दी गई है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा बजट में अधिस्वीकृत पत्रकारों के लिए की गई घोषणाओं के बाद गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों में गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि सरकार ने पत्रकार समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया है—एक वो, जिन्हें सुविधाओं का पूरा अधिकार है; और दूसरे वो, जो 30-30 साल की सेवा के बावजूद “अदृश्य” कर दिए गए हैं।
सुविधाएं सिर्फ अधिस्वीकृतों के लिए, बाकी सब ‘अपराधी’?
मुख्यमंत्री ने बजट में अधिस्वीकृत पत्रकारों के लिए सम्मान निधि 15,000 रुपये से बढ़ाकर 18,000 रुपये प्रतिमाह करने की घोषणा की है। साथ ही दिवंगत अधिस्वीकृत पत्रकारों की पत्नियों के लिए आश्रित सम्मान निधि 7,300 से बढ़ाकर 9,000 रुपये प्रतिमाह कर दी गई है। 60 वर्ष से अधिक आयु के अधिस्वीकृत पत्रकारों के लिए पेंशन जैसी सुविधा सुनिश्चित की गई है।
इसके अतिरिक्त राजस्थान आवास मंडल के माध्यम से जयपुर में पत्रकारों के लिए आवासीय योजना की घोषणा भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता का मूल्यांकन सिर्फ “अधिस्वीकृति कार्ड” से होगा? क्या वे पत्रकार, जिन्होंने तीन दशकों तक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों में काम किया, लेकिन किसी कारणवश अधिस्वीकृत नहीं हैं—वे सरकार की नजर में अयोग्य हैं?
गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का कहना है कि सरकार ने यह मान लिया है कि जो अधिस्वीकृत नहीं है, वह या तो महत्वहीन है या सरकार के लिए असुविधाजनक। यह धारणा न केवल पत्रकारिता की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
पत्रकारों को बांटने की राजनीति?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अधिस्वीकृति का दायरा सीमित रखकर सरकार पत्रकारों के एक वर्ग को “संतुष्ट” और दूसरे वर्ग को “हाशिए” पर रखना चाहती है। गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का आरोप है कि यह नीति पत्रकारों को आपस में लड़वाने और स्वतंत्र आवाजों को कमजोर करने का प्रयास है।
राइजिंग भास्कर का स्पष्ट मानना है कि पत्रकारों को श्रेणियों में बांटना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। अधिस्वीकृति कोई सम्मान का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता। पत्रकारिता सेवा, अनुभव और जनसरोकारों से तय होती है—न कि सिर्फ सरकारी सूची से।
30 साल की सेवा का कोई मूल्य नहीं?
राजस्थान में ऐसे हजारों पत्रकार हैं जिन्होंने 25 से 35 वर्ष तक लगातार रिपोर्टिंग, संपादन और जनसरोकार की पत्रकारिता की है। इनमें से कई राष्ट्रीय अखबारों से जुड़े रहे, कई ने क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
फिर भी वे अधिस्वीकृत नहीं हैं। क्यों?
क्या अधिस्वीकृति की प्रक्रिया पारदर्शी है?
क्या इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता?
क्या मानदंड समान रूप से लागू किए जाते हैं?
इन सवालों का जवाब आज तक स्पष्ट नहीं है। गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का कहना है कि अधिस्वीकृति प्रक्रिया कई बार “चयनित” लोगों के लिए आसान और बाकी के लिए असंभव बना दी जाती है।
लोकतंत्र में आलोचक की भूमिका से डर क्यों?
गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों ने साफ कहा है कि वे सरकार की योजनाओं की आंख मूंदकर प्रशंसा नहीं करेंगे। यदि सरकार उन्हें नजरअंदाज करेगी, तो वे सरकार की नीतियों की सख्त समीक्षा करेंगे। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। यदि सवाल पूछने वाले पत्रकारों को सुविधाओं से वंचित रखा जाएगा, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं है।
जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी की मांग तेज
राइजिंग भास्कर ने सरकार के सामने एक ठोस प्रस्ताव रखा है—“जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी” का गठन।
इस अथॉरिटी की प्रमुख विशेषताएं प्रस्तावित हैं:
-
इसका संचालन वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा किया जाए।
-
इसमें कोई आईएएस या आरएएस अधिकारी शामिल न हो।
-
कोई सक्रिय राजनीतिज्ञ सदस्य न हो।
-
दो या तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीश संरक्षक की भूमिका में हों।
-
पत्रकारों से जुड़े सभी कल्याणकारी मुद्दे इसी अथॉरिटी के अधीन लाए जाएं।
इस प्रस्ताव का उद्देश्य पत्रकारों को राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप से मुक्त कर स्वायत्त व्यवस्था देना है। गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का कहना है कि जब तक यह अथॉरिटी गठित नहीं होती, उनका विरोध जारी रहेगा।
आवासीय योजना: सबके लिए या चुनिंदा के लिए?
जयपुर में आवासीय योजना की घोषणा सुनने में आकर्षक लगती है, लेकिन यदि यह योजना सिर्फ अधिस्वीकृत पत्रकारों तक सीमित रहेगी, तो यह भेदभाव का उदाहरण बनेगी।
पत्रकारों का सवाल है—क्या 30 साल तक रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार घर का हकदार नहीं? क्या उसके परिवार की सुरक्षा और स्थायित्व कम महत्वपूर्ण है?
सम्मान निधि या राजनीतिक संदेश?
सम्मान निधि की राशि बढ़ाना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन जब इसका लाभ सीमित वर्ग तक ही रहे, तो यह “सम्मान” कम और “संदेश” अधिक प्रतीत होता है।
यह संदेश क्या है?
कि सरकार के करीब रहने वालों को लाभ मिलेगा?
या यह कि जो आलोचक हैं, उन्हें प्रतीक्षा करनी होगी?
गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का चेतावनी भरा स्वर
गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे राज्यव्यापी आंदोलन करेंगे।उनका कहना है कि वे शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाएंगे, ज्ञापन देंगे, जनजागरण करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर धरना-प्रदर्शन भी करेंगे। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि वे सरकार की हर योजना की तथ्यात्मक और आलोचनात्मक समीक्षा करेंगे।
“दीवार” कब टूटेगी?
दीवार फिल्म में अंततः दीवार टूटती है, लेकिन उससे पहले संघर्ष होता है। आज राजस्थान की पत्रकारिता भी उसी मोड़ पर खड़ी है।मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने अवसर है कि वे इस दीवार को गिराएं—अधिस्वीकृति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं, गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों को भी कल्याणकारी योजनाओं में शामिल करें और पत्रकार समुदाय को एकजुट रखें।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह दीवार और ऊंची होगी। लोकतंत्र में सरकार और मीडिया के बीच संवाद जरूरी है, दूरी नहीं। सवाल यह है कि क्या सरकार संवाद का रास्ता चुनेगी, या दीवार को स्थायी बना देगी?
सवाल लोकतंत्र में समानता के व्यवहार का है? संघर्ष अभी जारी है
गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का संघर्ष सिर्फ आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और समानता के लिए है। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि पत्रकारिता की पहचान “कार्ड” से नहीं, “कर्तव्य” से होती है। आज मुद्दा सिर्फ सम्मान निधि या आवास का नहीं है। मुद्दा है—न्याय का, समान अवसर का और लोकतांत्रिक मूल्यों का।
जब तक अधिस्वीकृत और गैर अधिस्वीकृत के बीच भेदभाव रहेगा, तब तक यह दीवार बनी रहेगी। और जब तक दीवार बनी रहेगी, सवाल भी उठते रहेंगे।




