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Thursday, July 9, 2026, 8:10 am

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भगवान महावीर चाइल्ड वेलफेयर ट्रस्ट : कच्ची बस्तियों के 15 हजार बच्चों के जीवन में उजाले की पहल

शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता का समन्वय बनकर उभरा पुण्यार्थम् अभियान, राजस्थान में सामाजिक परिवर्तन का सशक्त मॉडल रंग लाने लगा

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर


9783414079 | diliprakhai@gmail.com

राजस्थान की कच्ची बस्तियों में पनपती चुनौतियों के बीच एक ऐसा सामाजिक अभियान आकार ले रहा है, जिसने हजारों बच्चों के जीवन की दिशा ही बदल दी है। जहां गरीबी, संसाधनों की कमी और शिक्षा से दूरी जैसी समस्याएं बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेलती हैं, वहीं भगवान महावीर चाइल्ड वेलफेयर ट्रस्ट का ‘पुण्यार्थम्’ अभियान आशा की किरण बनकर सामने आया है। यह अभियान केवल शिक्षा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को संस्कार, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ाने का समग्र प्रयास है।

आज यह पहल 15,000 से अधिक बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला चुकी है और राजस्थान में सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है।

 

कच्ची बस्तियों से शुरू हुआ बदलाव का सफर

‘पुण्यार्थम्’ अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका जमीनी दृष्टिकोण है। यह पहल बच्चों को अपने पास बुलाने के बजाय खुद उनके बीच पहुंचती है। इसकी शुरुआत जयपुर के हसनपुरा क्षेत्र की कच्ची बस्तियों से हुई, जहां शिक्षा और संसाधनों की भारी कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। इन बस्तियों में रहने वाले बच्चे अक्सर स्कूल जाने से वंचित रह जाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति, अभिभावकों की अनभिज्ञता और सामाजिक परिस्थितियां उनकी शिक्षा में बाधा बनती थीं। ऐसे में ‘पुण्यार्थम्’ ने बस्तियों में ही शिक्षा केंद्र स्थापित कर बच्चों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित की।

प्रत्येक बस्ती में एक समर्पित शिक्षिका नियुक्त की गई, जिनका कार्य केवल पाठ्यक्रम पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों में अनुशासन, नैतिकता और जीवन मूल्यों का विकास करना भी है। बच्चों को यह सिखाया जाता है कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का आधार है।

शिक्षा के साथ संस्कार और कौशल का समावेश

‘पुण्यार्थम्’ का दृष्टिकोण पारंपरिक शिक्षा से कहीं आगे बढ़कर है। यह पहल बच्चों के समग्र विकास पर केंद्रित है। यहां बच्चों को निशुल्क शिक्षा के साथ-साथ खेल, कला, सांस्कृतिक गतिविधियों और नैतिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकास का अवसर मिलता है। बच्चों को डिजिटल शिक्षा से भी जोड़ा जा रहा है, ताकि वे आधुनिक तकनीक से परिचित हो सकें। इसके अलावा, उन्हें छोटे-छोटे कौशल सिखाए जाते हैं, जिससे वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें। संस्था का मानना है कि यदि शिक्षा के साथ संस्कार और कौशल का संतुलन बनाया जाए, तो बच्चे न केवल अच्छे विद्यार्थी बनते हैं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बनते हैं।

महारानी कॉलेज की छात्राओं का जमीनी अनुभव

इस अभियान से जुड़कर जयपुर के महारानी कॉलेज की लगभग 500 छात्राओं ने इंटर्नशिप के माध्यम से समाज की वास्तविक स्थिति को करीब से समझा। यह अनुभव उनके लिए केवल एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को देखने का नजरिया बदलने वाला साबित हुआ। इंटर्नशिप के दौरान छात्राओं ने देखा कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे किन कठिन परिस्थितियों में जीवन जीते हैं। उन्होंने यह भी जाना कि शिक्षा से दूर रहने के पीछे कितने सामाजिक और आर्थिक कारण होते हैं।

छात्रा लक्षिता ने बताया कि संस्था सीमित संसाधनों के बावजूद बेहद प्रभावी तरीके से काम कर रही है। टीम तपती धूप में बच्चों के लिए छांव की व्यवस्था करती है और सरल माध्यमों से उन्हें अक्षर ज्ञान कराती है। छात्रा टीना के अनुसार, बच्चों को स्टेशनरी और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाती है और उनकी देखभाल परिवार की तरह की जाती है। रंजना ने संस्था की विशेष परंपराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि यहां जन्मदिन और त्योहार मनाने का तरीका अलग है—तिलक, मौली और मिठाई के साथ, जो भारतीय संस्कृति की झलक देता है। वहीं कुमोदनी ने कहा कि यहां टीमवर्क का महत्व सिखाया जाता है और “संगठन में शक्ति है” का वास्तविक अनुभव मिलता है।

स्वावलंबन की ओर बढ़ते कदम

‘पुण्यार्थम्’ अभियान का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना भी है। इसके लिए उन्हें विभिन्न प्रकार के कौशल सिखाए जाते हैं, जिससे वे भविष्य में आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें। यह पहल बच्चों में आत्मविश्वास विकसित करती है और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रेरित करती है। संस्था का मानना है कि यदि बच्चों को सही दिशा और अवसर मिले, तो वे किसी भी परिस्थिति को बदल सकते हैं।

सशक्त नेतृत्व और व्यवस्थित संचालन

इस अभियान के सफल संचालन के पीछे मजबूत नेतृत्व और सुव्यवस्थित प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका है। संजय कुमार के नेतृत्व में ‘पुण्यार्थम्’ अभियान निरंतर विस्तार कर रहा है, जबकि जयपुर क्षेत्र की जिम्मेदारी नवीन शर्मा संभाल रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में बच्चों को निशुल्क शिक्षा, भोजन और आवागमन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। साथ ही अनुभवी शिक्षकों और समाजसेवकों की टीम प्रत्येक केंद्र की नियमित निगरानी करती है, जिससे गुणवत्ता और प्रभावशीलता बनी रहती है।

राजस्थान भर में फैलता प्रभाव

आज ‘पुण्यार्थम्’ अभियान राजस्थान में 330 से अधिक शिक्षा केंद्रों के माध्यम से सक्रिय है। इन केंद्रों के जरिए कच्ची बस्तियों में रहने वाले बच्चों तक सीधी पहुंच बनाई गई है। संस्था ने अभिभावकों को भी इस प्रक्रिया में भागीदार बनाया है, जिससे शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण हुआ है। यह नेटवर्क न केवल शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि सामाजिक समरसता और सहयोग की भावना को भी मजबूत कर रहा है।

बदलाव की प्रेरक कहानियां

इस अभियान की सफलता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हजारों प्रेरणादायक कहानियां हैं। योगिता, जो पहले संसाधनों के अभाव में संघर्ष कर रही थी, आज डिजिटल शिक्षा के माध्यम से अपने परिवार की आर्थिक सहायता कर रही है।वहीं पिंकी चौहान ने संस्कृत शिक्षा के जरिए प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल कर अपनी पहचान बनाई है। ये उदाहरण बताते हैं कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर कोई भी बच्चा अपनी परिस्थितियों को बदल सकता है।

भविष्य की योजनाएं और विस्तार

‘पुण्यार्थम्’ अभियान भविष्य में और अधिक विस्तार की दिशा में कार्य कर रहा है। संस्था की योजना है कि नए क्षेत्रों में शिक्षा केंद्र स्थापित किए जाएं, डिजिटल और तकनीकी शिक्षा को और मजबूत किया जाए तथा रोजगारोन्मुख कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए। इसके साथ ही अधिक से अधिक स्वयंसेवकों और समाजसेवकों को इस पहल से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि इसका दायरा और प्रभाव बढ़ाया जा सके।

समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश

‘पुण्यार्थम्’ अभियान यह स्पष्ट संदेश देता है कि जब शिक्षा के साथ संस्कार और स्वावलंबन को जोड़ा जाता है, तब वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव होता है। यह पहल न केवल बच्चों के जीवन को बदल रही है, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा दे रही है। आज यह राजस्थान में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है और भविष्य में देशभर के लिए एक आदर्श मॉडल बनने की ओर अग्रसर है। कच्ची बस्तियों के अंधेरे से निकलकर उजाले की ओर बढ़ते इन बच्चों की कहानी केवल एक अभियान की सफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, समर्पण और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल है। ‘पुण्यार्थम्’ ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव संभव हैं।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor