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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी स्टोरी-6 : रक्त से रिश्ते जोड़ने वाला इंसान : सेवा, समर्पण और मानवता की मिसाल नरेंद्र सिंह

“परहित सरिस धरम नहि भाई…” को जीवन में उतारने वाला एक साधक

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

भारतीय संस्कृति में सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है— “परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।” अर्थात दूसरों के हित से बड़ा कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा कोई पाप नहीं। कुछ लोग इन पंक्तियों को केवल पढ़ते हैं, कुछ सुनते हैं, और कुछ ऐसे भी होते हैं जो इन्हें अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं। नरेंद्र सिंह ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने सेवा, समर्पण और मानव प्रेम को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के हर कर्म में उतार दिया।नरेंद्र सिंह… एक ऐसा नाम, जो आज अनेक लोगों के लिए आशा, संवेदना और मानवता का पर्याय बन चुका है। जिन्होंने अपने जीवन में 131 बार रक्तदान कर यह साबित किया कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका मानव प्रेम होता है। लोग उन्हें आज “दाता” और “रक्तदाता” के नाम से जानते हैं। उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है— जब तक सांस है, तब तक सेवा है।

एक सुई के डर से मानवता के महासंकल्प तक

हर महान यात्रा की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। नरेंद्र सिंह की सेवा यात्रा भी एक साधारण-सी घटना से शुरू हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। कई वर्षों पहले वे किसी काम से अस्पताल गए थे। वहां उनके एक मित्र ने कहा— “आज तुम्हें रक्तदान करना है।” नरेंद्र सिंह बताते हैं कि उन्हें सुई से बहुत डर लगता था। उन्होंने पहले कभी रक्तदान नहीं किया था। लेकिन मित्र ने एक वाक्य कहा जिसने उनकी सोच बदल दी— “किसी की जान बचाने के लिए सुई का दर्द भी सहन नहीं कर सकते?”यह वाक्य उनके भीतर उतर गया। उन्होंने पहली बार रक्तदान किया। रक्तदान के बाद जब वे बाहर आए तो जिस व्यक्ति के लिए रक्त दिया गया था, उसकी बेटी उनके पैरों में गिर गई और आंखों में आंसू लिए धन्यवाद देने लगी। उस क्षण नरेंद्र सिंह को पहली बार समझ आया कि रक्तदान केवल खून देना नहीं, बल्कि किसी के जीवन में उम्मीद लौटाना है। उस दिन के बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वे जीवनभर रक्तदान करेंगे। यही संकल्प धीरे-धीरे मिशन बन गया।

रक्तदान : उनके लिए उत्सव भी, तपस्या भी

आज नरेंद्र सिंह 131 बार रक्तदान कर चुके हैं। कई बार उन्होंने एसडीपी डोनेट कर गंभीर मरीजों की जान बचाई। उनके लिए रक्तदान कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है।वे शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बड़े प्रशंसक हैं। भगत सिंह के जन्मदिवस 28 सितंबर और शहादत दिवस 23 मार्च पर वे चाहे देश के किसी भी कोने में हों, रक्तदान अवश्य करते हैं। उनका मानना है कि देशभक्ति केवल नारों से नहीं, बल्कि मानवता की सेवा से सिद्ध होती है।गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
अर्थात कर्म को श्रेष्ठता और निष्ठा से करना ही योग है। नरेंद्र सिंह का जीवन इसी कर्मयोग का जीवंत उदाहरण है।

वंदे भारत सेवा संस्थान : सेवा को संगठन का स्वरूप

नरेंद्र सिंह केवल व्यक्तिगत स्तर पर सेवा नहीं करते, बल्कि उन्होंने इसे सामाजिक आंदोलन का रूप भी दिया है। वे वंदे भारत सेवा संस्थान के सचिव हैं। यह संस्था रक्तदान और मानव सेवा के कार्यों में अग्रणी भूमिका निभा रही है।संस्थान का उद्देश्य केवल रक्त उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि समाज में सेवा की संस्कृति विकसित करना है। नरेंद्र सिंह चाहते हैं कि रक्तदान का अभियान घर-घर तक पहुंचे। वे एक ऐसा राष्ट्रीय मंच बनाना चाहते हैं जहां जरूरत पड़ने पर किसी भी व्यक्ति को समय पर रक्त मिल सके।उनका मानना है कि समाज तभी मजबूत बनता है जब लोग “मैं” से ऊपर उठकर “हम” के बारे में सोचने लगते हैं।

रक्तदान से जुड़े प्रेरक तथ्य

  • एक यूनिट रक्त तीन लोगों की जान बचा सकता है।
  • स्वस्थ व्यक्ति हर तीन माह में रक्तदान कर सकता है।
  • रक्तदान से शरीर में नया रक्त बनने की प्रक्रिया सक्रिय होती है।
  • रक्तदान करने वाला व्यक्ति मानसिक संतोष और आत्मिक शांति अनुभव करता है।
  • नरेंद्र सिंह अब तक 131 बार रक्तदान कर चुके हैं।

एक अनजान युवती के लिए किडनी दान की पेशकश

आज के समय में लोग अपने रिश्तेदारों के लिए भी त्याग करने से बचते हैं, लेकिन नरेंद्र सिंह ने मानवता की चरम सीमा को छूते हुए एक अनजान युवती के लिए अपनी किडनी दान करने की पेशकश की।यह केवल एक चिकित्सा संबंधी निर्णय नहीं था, बल्कि मानवता के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण था। वे मानते हैं कि यदि किसी के जीवन को बचाने के लिए शरीर का एक अंग भी काम आ जाए तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है?उपनिषदों में कहा गया है—
“त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
अर्थात त्याग के माध्यम से ही अमरत्व प्राप्त होता है।नरेंद्र सिंह का जीवन इसी त्याग की अनुभूति कराता है।

देहदान, अंगदान और नेत्रदान : मृत्यु के बाद भी सेवा

नरेंद्र सिंह केवल जीवित रहते हुए ही नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा करना चाहते हैं। उन्होंने देहदान, अंगदान और नेत्रदान की घोषणा कर रखी है।उनका कहना है—“यह शरीर एक दिन मिट्टी होना है। उससे पहले यदि यह किसी के काम आ जाए तो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है?”वे चाहते हैं कि उनकी देह मेडिकल विद्यार्थियों के शोध और अध्ययन में काम आए ताकि भविष्य में डॉक्टर और बेहतर तरीके से मानवता की सेवा कर सकें।यह विचार भारतीय दर्शन की उस भावना से जुड़ा है जिसमें शरीर को नश्वर और सेवा को अमर माना गया है।

नरेंद्र सिंह के प्रमुख सेवा संकल्प

131 बार रक्तदान
 नियमित एसडीपी डोनेशन
अंगदान की घोषणा
नेत्रदान का संकल्प
देहदान का निर्णय
कैंसर मरीजों के लिए हेयर डोनेशन
हजारों पौधों का रोपण
पक्षियों के लिए परिंडे अभियान

कैंसर पीड़ितों के लिए बाल दान : संवेदना की अनोखी मिसाल

एक बार जब उनकी माताजी बीमार थीं, तब वे अस्पताल के कैंसर वार्ड में गए। वहां उन्होंने एक महिला को देखा, जिसके बाल कीमोथेरेपी के कारण झड़ चुके थे। वह महिला आईने में खुद को देखकर रो रही थी। तब किसी ने नरेंद्र सिंह को बताया कि यदि लोग अपने बाल दान करें तो ऐसे मरीजों के लिए विग बनाई जा सकती है, जिससे उनमें आत्मविश्वास लौट सके। बस, उसी दिन नरेंद्र सिंह ने तय कर लिया कि वे अपने बाल बढ़ाएंगे और समय-समय पर बाल दान करेंगे। आज वे कई बार हेयर डोनेशन कर चुके हैं।यह संवेदनशीलता बताती है कि सेवा केवल बड़ी-बड़ी बातों से नहीं होती, बल्कि किसी के टूटे मन को संभाल लेना भी सेवा है।

प्रकृति प्रेम : श्मशान को हरियाली में बदलने का प्रयास

नरेंद्र सिंह केवल इंसानों तक सीमित नहीं हैं। उनका प्रेम प्रकृति और जीव-जंतुओं तक फैला हुआ है। उन्होंने अपने समाज के श्मशान में हजारों पौधे लगाए, जिनमें से अनेक अब विशाल वृक्ष बन चुके हैं।श्मशान… जहां लोग मृत्यु का सन्नाटा महसूस करते हैं, वहां नरेंद्र सिंह ने हरियाली और जीवन का संदेश बो दिया। वे पक्षियों के लिए परिंडे लगाते हैं और उनमें नियमित दाना-पानी डालते हैं। भीषण गर्मी में जब पक्षी पानी के लिए भटकते हैं, तब नरेंद्र सिंह जैसे लोग धरती पर करुणा की ठंडी छांव बन जाते हैं।ऋग्वेद में कहा गया है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।नरेंद्र सिंह इसी भाव के साथ प्रकृति की सेवा करते हैं।

सेवा की उनकी सोच

“जब तक सांस है, लोगों की मदद करता रहूं।”

“यह शरीर मिट्टी होना है, उससे पहले किसी के काम आ जाए तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।”

“रक्तदान केवल खून देना नहीं, किसी परिवार की उम्मीद बचाना है।”

सोशल मीडिया को बनाया मानवता का माध्यम

आज जहां सोशल मीडिया का उपयोग अक्सर विवाद और दिखावे के लिए होता है, वहीं नरेंद्र सिंह ने इसे मानव सेवा का माध्यम बनाया। उन्होंने कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं जिनके जरिए रक्तदान की मुहिम चलाई जाती है।जब भी किसी को रक्त की जरूरत होती है, उनका जवाब बहुत सरल होता है—
“मेरे नंबर दे दो…”इसके बाद यह मौन साधक बिना प्रचार और प्रसिद्धि की इच्छा के अस्पताल की ओर निकल पड़ता है।यह वही सेवा है जिसे भारतीय दर्शन में निष्काम कर्म कहा गया है— बिना किसी फल की इच्छा के किया गया कार्य।

सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं

आज समाज में लोग पहचान, प्रसिद्धि और संपत्ति के पीछे भाग रहे हैं। ऐसे समय में नरेंद्र सिंह जैसे लोग यह विश्वास जगाते हैं कि इंसानियत अभी जीवित है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सेवा केवल दान देने से नहीं होती, बल्कि किसी के दर्द को अपना दर्द समझने से होती है। वे बताते हैं कि एक इंसान चाहे तो अपने जीवन को हजारों लोगों की उम्मीद बना सकता है।महाभारत में कहा गया है—“नर सेवा ही नारायण सेवा है।”नरेंद्र सिंह ने इस वाक्य को अपने जीवन का आधार बना लिया है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

नरेंद्र सिंह की सबसे बड़ी चिंता यह है कि आने वाली पीढ़ी सेवा और संवेदना के महत्व को समझे। वे चाहते हैं कि युवाओं में रक्तदान और मानव सेवा के प्रति जागरूकता बढ़े।उनका सपना है कि देशभर में ऐसा नेटवर्क बने जहां किसी मरीज को रक्त के अभाव में जान न गंवानी पड़े।आज जब युवा सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताते हैं, नरेंद्र सिंह चाहते हैं कि वही युवा समाज के लिए कुछ घंटे सेवा को भी दें। वे मानते हैं कि यदि हर युवा वर्ष में केवल एक बार रक्तदान करे तो देश में कभी रक्त की कमी नहीं रहेगी।

मौन साधक की अमर यात्रा

नरेंद्र सिंह कोई बड़े मंचों पर भाषण देने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे चुपचाप सेवा करने वाले साधक हैं। उनका जीवन बताता है कि सच्ची महानता प्रचार में नहीं, बल्कि परोपकार में होती है। उन्होंने रक्तदान को मिशन बनाया, अंगदान का संकल्प लिया, देहदान की घोषणा की, पौधे लगाए, पक्षियों के लिए परिंडे लगाए, कैंसर मरीजों के लिए बाल दान किए और हर जरूरतमंद की मदद के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। ऐसे लोग समाज की वह रोशनी होते हैं, जो बिना शोर किए हजारों जिंदगियों में उजाला भर देते हैं।नरेंद्र सिंह वास्तव में यह सिद्ध करते हैं कि इंसान का जीवन लंबा नहीं, बल्कि उपयोगी होना चाहिए। और जो जीवन दूसरों के काम आ जाए, वही जीवन सार्थक कहलाता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor