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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी काव्य धारा-1 : कवि : कासिम बीकानेरी

कासिम बीकानेरी

परिचय : (क़ासिम बीकानेरी। बीकानेर ही नहीं देश में साहित्य का बड़ा नाम। पूरा नाम सय्यद क़ासिम अली। पिता- सय्यद अहमद अली। मदीना मस्जिद के सामने, मुहल्ला भिश्तियान, बीकानेर(राजस्थान) के निवासी हैं। जन्मतिथि- 10 जनवरी 1978, शिक्षा डबल एम.ए.(उर्दू व समाजशास्त्र), आईटीआई डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, व्यवसाय – आर.वी.पी.एन में इंजीनियरिंग सुपरवाइज़र। प्रकाशित कृतियां:-मेरी अपनी भी एक दुनिया है (ग़ज़ल संग्रह) 2015, आज कह दूं कोई ग़ज़ल ऐसी (राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह) 2018, ज़बान मेरी हमर भाखा (कमल रंगा की राजस्थानी कविताओं का उर्दू अनुवाद, देवनागरी में प्रकाशित) 2021, दादाजी की साइकिल (हिंदी कहानी संग्रह, राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की तरफ से प्रकाशित पुस्तक पर सहायता प्राप्त) 2023, छपाक छई (बाल कहानी संग्रह, पंडित जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान की तरफ से प्रकाशित) 2023, बाबोसा रो छत्तो (राजस्थानी कहानी संग्रह, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से आर्थिक सहयोग प्राप्त) 2023, प्रकाशनाधीन पुस्तकें-कोरोना हूं मैं 21वीं सदी का (राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के आर्थिक सहयोग से अति शीघ्र प्रकाशित होने वाली दूसरी पुस्तक के रूप में चयनित) 2026, निकहते-सुख़न(उर्दू ग़ज़ल संग्रह), सम्मानों एवं पुरस्कारों की संख्या 135, रचना की विधा -गजल, नज़्म गीत, कहानी सहित 21 से अधिक विधाओं में सृजन। कई फिल्मों में अभिनय, गीत, स्क्रिप्ट लेखन एवं सहायक निर्देशक का कार्य किया है। क़ौम नागौरी तेलियान वेलफ़ेयर सोसाइटी के प्रथम निर्वाचित सचिव। साहित्य, संस्कृति,कला एवं समाज सेवा में सक्रिय। ईमेल qasimbikaneri@gmail.com, संपर्क : 8561814522)

मेरे ख़त का जवाब आने दो

मेरे ख़त का जवाब आने दो
और वो भी शिताब आने दो

मुश्को-अंबर की क्या ज़रूरत है
ख़त में कोई गुलाब आने दो

नींद खुलने से टूटा ख़्वाब हसीं
इक नया फिर से ख़्वाब आने दो

कच्ची कलियां न तोड़ो आप अभी
पहले उन पर शबाब आने दो

हम पे मौला करम की हो बारिश
हम पे अपना सवाब आने दो

हमको दिखला दो चांद सा चेहरा
बीच में मत हिजाब आने दो

है परिंदा क़फ़स में कब से क़ैद
अब तो बाहर जनाब आने दो

देखना कैसे बदलेगी दुन्या
‘फ़िक्र में इन्क़िलाब आने दो’

तश्नगी से भटकते सहरा के
सामने मत सराब आने दो

अपने दिल का दरीचा वा करके
मुझको आली जनाब, आने दो

नज़्म की या ग़ज़ल की हो ‘क़ासिम’
कोई अच्छी किताब आने दो

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गर्व है वो मेरा मेरी थाती है मां…

गर्व है वो मेरा मेरी थाती है मां,
मुझको जीना जहां में सिखाती है मां।

रास्ते से कभी मैं भटकता नहीं,
क्या है अच्छा बुरा, सब बताती है मां।

दूध के रूप में मुझको अमृत पिला,
अहसां अपना कभी न जताती है मां।

घेर लेते हैं संकट जो मुझ को कभी,
मुझको हर इक बला से बचाती है मां।

रोज़ा रखती है मां हम सभी के लिए,
सबको खाना खिला करके खाती है मां।

बनके शक्ति कभी बनके दुर्गा कभी,
काम सारे हमारे बनाती है मां।

पूरी करती है ख़्वाहिश हमारी सभी,
अपनी ख़ातिर कभी कुछ न लाती है मां।

जानती है जहां के रिवाजों को वो,
सारी रस्मों को देखो निभाती है मां।

हावी होते हैं ‘क़ासिम’ जहां के सितम,
ज़ुल्म से मुझको लड़ना सिखाती है मां।

000

फिर से बच्चा होना चाहता हूं…

मैं ख़ुद को यूं भी खोना चाहता हूं
के फिर से बच्चा होना चाहता हूं

हुई है उम्र अब मेरी तो पचपन
मुझे फिर याद आता है लड़कपन
बयां मैं कर नहीं सकता ज़ुबां से
सुकूं देता था कितना मुझको बचपन
मैं मिट्टी का बिछौना चाहता हूं
के फिर से बच्चा………………..

शरारत करता ही रहता था हरदम
नहीं था ज़िंदगी में कोई भी ग़म
ख़ुदा कर दे अ़ता वो दिन सुहाने
हसीं कितना हसीं था सारा आलम
हुमक के फिर से रोना चाहता हूं
के फिर से बच्चा……………….

बड़ा ख़ुशहाल था बचपन सुहाना
कहां पर खो गया है वो ज़माना
खिलौना इक नया हर दिन मंगाना
वो गुड्डे गुड़िया की शादी रचाना
वही फिर से खिलौना चाहता हूं
के फिर से बच्चा………………..

वो चार आने की चीज़ें लेके आना
सभी के साथ मिलके उनको खाना
मैं जब रूठा तो अब्बू का मनाना
कभी हाथों से ही झूला झुलाना
मैं वो यादें सजो…

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“बिगड़ा निज़ाम”

अब कोई भी कृष्ण नहीं है न ही कोई राम है |
सबका अपना-अपना मतलब अपना अपना काम है ||

चौराहों पर अबलाओं की इज़्ज़त लूटी जाती है |
नारी अब घर से बाहर जाने से भी घबराती है ||
गली गली में घूम रहे हैं देखो वहशी दीवाने |
हम विश्वास करें किस पर जब हर कोई ही घाती है ||
ऐसे मंज़र अब तो हमको दिखते सुब्हो-शाम है |
अब कोई भी कृष्ण नहीं है न ही कोई राम है ||

आज देश में नारी पर ज़ुल्मों की भरमार है |
घर-घर देखो अब औरत को मिल रही दुत्कार है ||
औरत को हम देवी दुर्गा जाने क्या-क्या कहते हैं |
क्या उसकी रक्षा की ख़ातिर कोई भी तैयार है ||
कलियुग है ये घोर और व्यभिचार खुल्ले-आम है |
अब कोई भी कृष्ण नहीं है न ही कोई राम है |

आज कोई भी दु:शासन को चीर हरण से रोके कौन
द्रौपदी की इज़्ज़त लूटे आख़िर उसको टोके कौन
रावण की नगरी में भी रह देखो सीता पावन थी
अब कोई भी कृष्ण नहीं है न ही कोई राम है |
सबका अपना-अपना मतलब अपना अपना काम है ||

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मुझको मिले यहां जो…

मुझको मिले यहां जो अलम याद आ गए
तूने दिए थे मुझको वो ग़म याद आ गए

कहने लगा ग़ज़ल तो तसव्वुर में आ बसी
फिर मुझको तेरे गेसू के ख़म याद आ गए

होगा सबब कोई तो इनायत का आपकी
क्या बात है जो आपको हम याद आ गए

जिसने दिया था ज़ख़्म, मुदावा वही करे
बरसों के बा’द भूले सनम याद आ गए

जब जान मेरी मांग ली, तब राज़ ये खुला
उसने किए थे क्यूं वो करम, याद आ गए

शीशा ये ऐ’तमाद का टूटा जो एक बार
इस ज़िन्दगी के सारे भरम याद आ गए

मुश्किल से भूल पाया था यास और ग़म सभी
फिर क्या हुआ कि आज वो ग़म याद आ गए

हिर्स-ओ-हवस की क़ैद में जीने लगा था मै
भटके हुए थे मेरे क़दम, याद आ गए

एहसास दिल में औरों के जब दर्द का हुआ
‘मुझको सभी के भूके शिकम याद आ गए’

उनको वो ढालता रहा शे’रों की शक्ल में
‘क़ासिम’ को जब भी उनके सितम याद आ गए

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Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor