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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी-कथा-कहानी : ‘एक निर्णय’ कहानीकार-अंशु हर्ष

कहानी : एक निर्णय 

कहानीकार : अंशु हर्ष 
परिचय : (अंशु हर्ष पिछले 18 वर्षों से लेखन और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। वे पिछले 14 वर्षों से सिम्पली जयपुर मैगज़ीन और वॉइस ऑफ जयपुर की प्रकाशक एवं संपादक हैं। इसके साथ ही वे राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की को-फाउंडर भी हैं। साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर उनकी सशक्त उपस्थिति रही है वे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 2015, 2019, 2022, 2023 और 2026 में बतौर स्पीकर भाग ले चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, प्रभा खेतान फाउंडेशन के “कलम” कार्यक्रम में रायपुर, बिलासपुर और जोधपुर में अपनी सहभागिता दर्ज करवा चुकी हैं। अंशु हर्ष ने शेखावाटी साहित्य संगम (2023, 2024, 2025), ब्रज महोत्सव (2023) और सरिस्का साहित्य संवाद (2026) में भी बतौर वक्ता अपनी उपस्थिति दी है। बच्चों के साहित्य को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने चिल्ड्रन्स लिटरेचर फेस्टिवल – किताबों, जोधपुर (2017, 2018) में भागीदारी की और जवाहर कला केंद्र, जयपुर में 20 दिवसीय राइटिंग वर्कशॉप का संचालन भी किया है।उनके प्रकाशित कविता संग्रहों में 2013 का “शब्दों का समंदर” (जिसका दूसरा संस्करण 2019 में प्रकाशित हुआ), 2021 में “ए प्लेटोनिक लव” और “समंदर दी ओशन” (अंग्रेज़ी अनुवाद), तथा 2024 में “तुम ठाकुर मेरे” शामिल हैं। उन्होंने 2018 में “मुक्ताकाश – 51 कविमन संग्रह”, 2020 में “एक नया मुक्ताकाश – दस कविमन संग्रह” और 2025 में “शब्द ए सफर” का संपादन भी किया है। पुस्तक संपादन के क्षेत्र में उन्होंने पंडित विजय शंकर मेहता के साथ कार्य करते हुए 2020 में “कोरोना जंग की सप्तपदी”, 2021 में “कहानियां जीवन की” और 2024 में “स्वास्थ रामायण” का संपादन किया। अनुवाद के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है उन्होंने 2022 में डॉ. आइवान माइसनर की बिज़नेस लेसन पर आधारित पुस्तक “नॉलेजप्रेन्योर” का हिंदी अनुवाद किया। लेखन के क्षेत्र में उन्होंने 2023 में “महाभारत के हनुमान” और 2026 में “इच्छा मृत्यु” (उपन्यास, वाणी प्रकाशन) जैसी कृतियों के माध्यम से अपनी सशक्त लेखनी का परिचय दिया है।)

(…आज फेसबुक पर एक चेहरा देखा, जिसे देखते ही नजर थम गई और दिल की धड़कनें तेज हो गईं। यह तो सीमा थी… दिल की गहराई से एक आवाज आई—”यह वही है!”सीमा के साथ मैंने ज्यादा वक्त नहीं बिताया। बस दो साल का वैवाहिक बंधन, जिसमें हमने सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई थीं। पर वो कसमें मैं निभा नहीं सका। परिवार के बहकावे में आकर मैंने उस बंधन को तोड़ दिया। और आज, जब उस घटना को याद करता हूं, तो लगता है, मैंने सीमा के साथ बहुत गलत किया।…उसकी आवाज़ में दर्द था, जो मुझे चुभ रहा था उसकी हर बात मेरी आत्मा को भीतर तक झकझोर गई। मैं बेबस खड़ा रहा , वह चली गई, और मैं उसे रोकने की हिम्मत भी न जुटा सका। मेरी आत्मग्लानि और बेबसी के बीच, एक औरत ने अपनी पूरी दुनिया खुद अपने कंधों पर उठा ली। उस दिन मैंने एक पत्नी, एक साथी और एक दोस्त खो दिया, और शायद खुद को भी।…इसी कहानी से…)

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चेहरों की किताब, यानी फ़ेसबुक। यह एक ऐसी जगह है, जहां दुनिया-जहां के अनगिनत चेहरे अपनी प्रोफाइल पिक्चर्स के जरिए हमें पढ़ने को मिल जाते हैं। पेशे से वकील हूं, लेकिन ग्लोबलाइजेशन और टेक्नोलॉजी के इस दौर में फ़ेसबुक मेरी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन गया है कि अगर दिन में दो-तीन बार इस पर न आऊं, तो ऐसा लगता है जैसे दिन के कामों में कुछ अधूरापन रह गया हो।

अकेलेपन को दूर करने का यह एक अनमोल माध्यम बन चुका है। यहां एक साथ अख़बार, टीवी, गीत-संगीत और राजनीति से लेकर हर सामाजिक मुद्दे पर बहस और चर्चा की जा सकती है। सुबह अख़बार में जो पढ़ा, उस पर अपनी राय साझा करना; नए अनमोल वचन पढ़ना; या किसी के द्वारा अपलोड किए गए नए-पुराने गीतों को सुनना – यह सब दिल को अजीब सुकून देता है।

कुछ जाने-पहचाने तो कुछ बिल्कुल अजनबी दोस्तों के साथ वक्त बिताते हुए ऐसा लगता है, जैसे वक़्त के पहिये को कुछ पल के लिए रोक दिया गया हो। फ़ेसबुक की इस दुनिया में डूबकर कुछ देर के लिए अतीत के बोझिल पलों को भुला देता हूं।यह चेहरों की किताब मेरे लिए सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि वो जगह है, जहां हर चेहरे के पीछे छिपी एक कहानी और हर प्रोफाइल तस्वीर में झलकती भावनाओं को महसूस करता हूं। आज फेसबुक पर एक चेहरा देखा, जिसे देखते ही नजर थम गई और दिल की धड़कनें तेज हो गईं। यह तो सीमा थी… दिल की गहराई से एक आवाज आई—”यह वही है!”

सीमा के साथ मैंने ज्यादा वक्त नहीं बिताया। बस दो साल का वैवाहिक बंधन, जिसमें हमने सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई थीं। पर वो कसमें मैं निभा नहीं सका। परिवार के बहकावे में आकर मैंने उस बंधन को तोड़ दिया। और आज, जब उस घटना को याद करता हूं, तो लगता है, मैंने सीमा के साथ बहुत गलत किया।

महज बाईस साल की उम्र में, मैंने उसे और हमारी छोटी सी बच्ची को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया। वजह? माँ की हसरत थी कि उनके बेटे को दहेज में एक कार मिले, जो सीमा के पिता देने में असमर्थ थे। मैं माँ-बाप का इकलौता बेटा था। उनकी इच्छा के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, और न ही उन्हें सीमा की और अपनी भावनाओं को समझ पाया।

आज, जब अतीत के उन पलों को दोबारा सोचता हूं, तो दिल पर बोझ महसूस होता है। काश! मैंने सीमा का साथ दिया होता। वह तो हर कदम पर समझौते कर रही थी, मेरे परिवार के स्वभाव को सह रही थी। पढ़ी-लिखी, ख्वाब देखने वाली सीमा जो आई ए एस अधिकारी बनने का सपना लेकर चली थी ने अपने सपनों को तिलांजलि देकर खुद को घर बनाने और रिश्तों को निभाने में झोंक दिया।

माँ के कठोर स्वभाव ने उसे कभी चैन से बैठने नहीं दिया। घर के तमाम काम, जिम्मेदारियां, और उस पर एक छोटी बच्ची की देखभाल , सीमा ने सब कुछ बिना किसी शिकायत के किया। कई बार मैं उससे पूछता, “तुम पढ़ना चाहती हो? कुछ बनना चाहती हो?” पर इससे आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। मैं जानता था कि घर की परिस्थितियां उसे ऐसा करने नहीं देंगी।

माँ ने उसे कभी चैन की सांस नहीं लेने दी। दुनिया भर के छोटे-बड़े कामों में उलझा कर रखा, और रात तक वह इतनी थक जाती कि खुद के लिए कुछ सोचने का समय ही नहीं बचता। लेकिन इन सबके बीच, अपनी बच्ची का ख्याल रखने में वह कभी चूकती नहीं। वह बच्ची को बड़े चाव से संभालती थी, कभी अपनी तकलीफ या गुस्सा उस मासूम पर नहीं निकालती थी।

सीमा ने रिश्तों को निभाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मैं? मैं उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका।

उस दिन कुछ अजीब घटा। मैं कोर्ट से घर लौटा तो देखा कि घर में एक पंडित जी बैठे हुए थे। उनके हाथ में कुछ लड़कियों की तस्वीरें और कुंडलियां थीं। मुझे देखते ही माँ मेरी तरफ दौड़ीं और बोलीं, “देख इन तस्वीरों में से कौन सी लड़की तुझे पसंद है?” मैंने माँ से कहा, “ये कानूनन अपराध है।” मेरी आवाज़ में दृढ़ता थी, लेकिन माँ के चेहरे पर बेपरवाही की एक मोटी परत जमी हुई थी। जैसे उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

असल में, माँ ने पहले ही सीमा को डरा-धमका कर अपनी बात मनवा ली थी। सीमा, जो खुद को बचाने की हर कोशिश कर सकती थी, ने शायद थक-हारकर अपने रास्ते अलग करने का फैसला कर लिया था।

सीमा पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। उसने शायद सोच लिया था कि झगड़ों और अपमान से भरे इस जीवन से बेहतर है अपनी स्वतंत्रता की राह चुनना। वह जानती थी कि आत्मसम्मान के बिना जिंदगी जीने का कोई अर्थ नहीं है।

मैं हैरान-परेशान कभी माँ की तरफ देखता, कभी पंडितजी की तरफ। बिना कुछ बोले, मैं अपने कमरे में चला गया। बाहर से माँ की आवाज़ें आती रहीं। पंडितजी को एक तस्वीर देते हुए वह कह रही थीं, “आप आगे बात करिए, यहाँ सब मैं संभाल लूंगी।”

पंडितजी चले गए। तभी सीमा मेरे लिए चाय लेकर कमरे में आई। उसकी आँखों में एक सवाल था, और मेरे दिल में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी । लेकिन तभी माँ ने मुझे पुकारा और मैं बाहर चला गया। बाहर माँ, उस लड़की की तस्वीर मेरे सामने रखकर बार-बार उसे दौलतमंद परिवार की इकलौती बेटी बताने लगीं। “एक घर और गाड़ी दहेज में देंगे, इतना पैसा है कि तेरा ही सब कुछ होगा,” माँ कहती जा रही थीं। उनकी बातों से लालच की बू साफ महसूस हो रही थी।

मैंने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन माँ ने भावनाओं का तमाशा खड़ा कर दिया। “ठीक है, मैं और तेरे बाबा वृद्धाश्रम चले जाते हैं। कह देंगे कि एक ही बेटा था, वो भी कलयुगी निकला। अब हम क्या करें?” उनकी आवाज रोने-चिल्लाने में बदल गई।

माँ के इस रूप और बाबा की खामोशी के आगे मैं अक्सर झुक जाया करता था। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ मेरे और माँ के बीच नहीं था। इसमें तीन जिंदगियों का सवाल जुड़ा हुआ था। मेरी आत्मा इस बार झुकने को तैयार नहीं थी, लेकिन मेरी माँ की कठोरता और मेरे बाबा की खामोशी ने सीमा को अकेले पहल करने पर मजबूर कर दिया।

सीमा ने अपनी बच्ची को साथ लिया और घर छोड़ने का फैसला कर लिया। मैं उसे रोकना चाहता था, लेकिन मेरे शब्द गले में अटक गए। वह धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ी, और मैं वहीं खड़ा, बेबस अपनी आँखों में आंसू लिए उसे जाते हुए देखता रहा।

जाते-जाते उसने मेरे दिल को तोड़ने वाली बात कही। “मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है,” उसने कहा। “ना आपकी दूसरी शादी से कोई परेशानी। माँ के कहने पर आप उनके लिए दौलतमंद बहू लाइए। मैं आपकी जिंदगी में कोई कानूनी अड़चन नहीं डालूंगी। बस, जब तक मैं नौकरी ना कर लूं, मेरा और बच्ची का भरण-पोषण करते रहिएगा। इसके लिए मुझे किसी कागजी भरोसे की जरूरत नहीं। आप अगर बेटे होने का फ़र्ज़ निभा सकते है तो मुझे आप पर पूरा यकीन है कि आप पिता होने का फर्ज निभाएंगे।”

उसने आगे कहा, “जैसे ही मैं कोई नौकरी करने लग जाऊंगी, मुझे आपकी मदद की भी जरूरत नहीं होगी। तब तक बस इतना सोचिए कि मैं और यह बच्ची आप पर अधिकार रखते हैं। उसके बाद हमारा आपसे कोई सरोकार नहीं रहेगा। मैं अपने बाबा के घर भी नहीं जाऊंगी। उन पर पहले से ही तीन बहनों की जिम्मेदारी है। मैं उन पर और बोझ नहीं बनना चाहती। यहाँ महिला और बाल विकास गृह है, वहीं जाकर मैं अपनी व्यवस्था कर लूंगी।”

उसकी आवाज़ में दर्द था, जो मुझे चुभ रहा था उसकी हर बात मेरी आत्मा को भीतर तक झकझोर गई। मैं बेबस खड़ा रहा , वह चली गई, और मैं उसे रोकने की हिम्मत भी न जुटा सका। मेरी आत्मग्लानि और बेबसी के बीच, एक औरत ने अपनी पूरी दुनिया खुद अपने कंधों पर उठा ली। उस दिन मैंने एक पत्नी, एक साथी और एक दोस्त खो दिया, और शायद खुद को भी।

वो चली गई… बिना कोई लड़ाई-झगड़ा किए, बिना किसी शिकायत या बद्दुआ दिए। उसकी खामोशी ने जैसे मेरी आत्मा को चीर दिया हो। मैं बस असहाय खड़ा देखता रहा, उसे जाते हुए।

किससे कहता अपने दिल का दर्द? कौन था मेरा हमदर्द? मैं तो जैसे एक लॉटरी का टिकट बनकर रह गया था माँ-बाप के सपनों का एक टुकड़ा। जब पहला नंबर नहीं लगा, तो बस अगले नंबर के खुलने का इंतज़ार करने लगे थे।

कुछ ही दिनों बाद, मेरी फिर से शादी कर दी गई। इस बार माँ की सोच के मुताबिक़, खूब पैसे वाली बहू घर आई। वह बहू नहीं, जैसे दौलत का दरवाजा थी अपने साथ गाड़ी, घर, और दो नौकर लेकर आई। माँ के चेहरे की चमक उस दिन देखते ही बनती थी। उनका सपना पूरा हो गया था।

बहुत जल्दी हम नए घर में शिफ्ट हो गए। वह घर जो दहेज में वेल-फर्निश्ड मिला था। पुराने घर को यूँ ही बंद करके छोड़ दिया गया। लेकिन मेरे लिए, वह घर सिर्फ एक इमारत नहीं था। वहाँ मेरी ज़िंदगी के वो पल बंद थे, जो अब कभी लौटकर नहीं आने वाले थे।

वह ताला सिर्फ घर पर नहीं लगा था, बल्कि मेरी यादों और मेरे अंदर के खालीपन पर भी लग चुका था। हर बार जब उस घर का ख्याल आता, एक अजीब सी टीस उठती। वह घर जहां सीमा के साथ बिताए हुए मेरे दिन थे, जहां उसकी हंसी गूंजती थी, जहाँ हमारी बच्ची ने अपने पहले कदम रखे थे। लेकिन अब मैं? मैं तो बस एक कठपुतली बनकर नए रिश्तों और नए घर के सामान में उलझ गया था। नयी शादी को सिर्फ एक साल ही हुआ था। उस दिन हम सभी दहेज़ में मिली गाड़ी में बैठकर कहीं जा रहे थे। सब खुश थे, जैसे जिंदगी अपने नए रंगों में सजी हो। लेकिन फिर, एक पल में सब खत्म हो गया। रास्ते में हमारी गाड़ी एक ट्रक से टकरा गई। टक्कर इतनी भयानक थी कि पूरी गाड़ी चकनाचूर हो गई।

उस दुर्घटना में, मेरी तरफ का दरवाज़ा खुल गया और मैं बाहर गिर पड़ा। शायद ईश्वर को मेरी सजा का सिलसिला जारी रखना था, इसलिए मुझे बचा लिया। लेकिन गाड़ी में बैठे माँ, पिताजी, और मेरी नई पत्नी कोई भी नहीं बचा। मैं वहीं सड़क पर पड़ा, उस गाड़ी के मंजर को देख रहा था, जो दिल को चीर देने वाला था। धुआं, चीखें, और टूटे सपनों की गूंज हर तरफ फैली हुई थी।

परिवार के नाम पर अब बस मैं ही बचा था। कुछ दिनों तक दूर के रिश्तेदार आते-जाते रहे। लेकिन समय बीतने के साथ, वे भी अपने-अपने जीवन में लौट गए। मैं अकेला रह गया, अपनी आत्मग्लानि और टूटे दिल के साथ।

जैसे-जैसे मैंने थोड़ा सामान्य होने की कोशिश की, एक दिन मुझे याद आया कि आज सीमा के खाते में पैसे डालने की तारीख है। सीमा और मेरी नन्ही सी बेटी का ख्याल मेरे मन में बार-बार आने लगा। अचानक एक ख्याल आया क्यों न जाकर उनसे मिल लूं? शायद उससे बात करने से दिल का बोझ हल्का हो जाए। कहीं न कहीं, मेरे मन में यह कसक भी थी कि जो कुछ मैंने सीमा और अपनी बच्ची के साथ किया, शायद ईश्वर ने मुझे उसी की सजा दी है।

इन्हीं उलझनों को लिए, मैं महिला और बाल विकास गृह पहुंचा। वहाँ जाकर पता चला कि सीमा तो कुछ दिन पहले ही यह शहर छोड़कर चली गई है। मेरा दिल जैसे धड़कना ही भूल गया। मैंने वहाँ के ऑफिस स्टाफ से पूछा तो उन्होंने मेरे हाथ में एक चिट्ठी पकड़ा दी।

मेरे कदम भारी हो गए। जहाँ आने से पहले एक उम्मीद थी कि सीमा शायद मेरे साथ लौट आएगी। शायद वह फिर से मेरे आंगन को अपने हंसी-खुशी और मेरी नन्ही बच्ची की शरारतों से भर देगी। लेकिन अब वह आखिरी उम्मीद भी टूट गई। जिस आस का दिया मेरे दिल में जल रहा था। हाथ में चिट्ठी लिए, मैं वहीं खड़ा था ठगा हुआ, अकेला, और टूटा हुआ।

मैं बोझिल कदमों से पास के पार्क में जाकर एक बेंच पर बैठ गया। हाथ में लिफाफा था, लेकिन उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मन में हज़ारों सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे, और दिल के किसी कोने में एक उम्मीद भी थी कि शायद सीमा ने कुछ ऐसा लिखा हो जो मेरी आत्मा को सुकून दे सके। आखिरकार, लिफाफा खोला। जैसे ही पत्र पर नज़र पड़ी, आँखों के आगे धुंधलापन छा गया। ये वो आँसू थे, जो बरसों से दिल में दबे अकेलेपन और पछतावे का बोझ नहीं सह पाए।

मैंने कांपते हाथों से पत्र पढ़ना शुरू किया:

“श्रीमान वकील साहब,
मुझे पता था, एक दिन आप यहाँ जरूर आएंगे। शायद आपकी बच्ची का प्यार आपको खींच लाए, या फिर आपका मन खुद से लड़ते-लड़ते थक जाए। यह कब होगा, यह मैं नहीं जानती थी, लेकिन इतना जरूर जानती थी कि आपको एक दिन अपनी गलती का एहसास होगा।

मैं आपको यह बताना जरूरी समझती हूँ कि मैंने अपनी प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली है और अब ट्रेनिंग के लिए जा रही हूँ। मेरी पोस्टिंग कहाँ होगी, यह अभी तय नहीं है। मैं जानती हूँ कि आपको यह सब जानने का हक नहीं है, लेकिन फिर भी बता रही हूँ, ताकि आप निश्चिंत रहें। आप जो मेरे अकाउंट में पैसे जमा करवाते हैं, उन्हें अब बंद कर दीजिए। मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया है, और उससे मेरा और मेरी बेटी का खर्च चल जाता है।

शेष कुशल।
भगवान आपको और आपके परिवार को सदा आबाद रखे।

— सीमा”

पत्र के आखिरी शब्द पढ़ते ही आँखों का धुंधलापन एक तेज बरसात में बदल गया। आँसू बेकाबू होकर बहने लगे। वो पल आज भी याद करता हूँ, तो आँखें अपने आप भीग जाती हैं।

सीमा ने अपने पत्र में लिखा था—”भगवान आपको और आपके परिवार को सदा आबाद रखे”। लेकिन क्या यह दुआ उसके दिल से निकली होगी? या यह सिर्फ एक औपचारिकता थी, जो उसने अपने घावों पर मरहम की तरह रखी थी?

आंखों में धुंधलापन छा गया था। ये वही पल था, जब मैं फिर से वर्तमान में लौट आया। यही मेरी सीमा है। सीमा… नहीं, अब तो मेरा उसे ‘मेरी’ कहने का हक भी नहीं बचा। मैं अपने ही मन में सवाल-जवाब करने लगा। झिझकते हुए उस फोटो पर क्लिक किया ताकि पता लगा सकूं कि वह कहां है, किस शहर में है।

मन में बेतहाशा सवाल उमड़ने लगे। मेरी बेटी कैसी होगी? दो साल और निकल गए हैं। अब तो वह पांच साल की हो गई होगी, है ना?

जब तस्वीर पर नजर डाली, तो सिर्फ यह पता चल सका कि वह भोपाल में है। बाकी सारी जानकारी उसने लॉक कर रखी थी। दिल की धड़कनें तेज हो गईं। अब क्या करूं? उससे कैसे संपर्क किया जा सकता है? फ्रेंड रिक्वेस्ट तो मैं भेज सकता हूं, पर वह मेरी दोस्ती कभी स्वीकार नहीं करेगी। क्यों करेगी? वह जानती भी तो नहीं कि अब मैं ‘आबाद’ नहीं, बल्कि ‘बर्बाद’ हूं।

फिर दिमाग में एक और सवाल उठा। कहीं उसने दूसरी शादी तो नहीं कर ली? नहीं… ऐसा नहीं हो सकता… या शायद हो भी सकता है।

मन बेचैन हो उठा। ना बैठने में चैन था, ना उठने में। ओह… क्या करूं? कैसे पता लगाऊं कि वह कैसी है? ऐसा कौन होगा, जो मुझे उसकी खबर दे सके? अचानक ध्यान गया कि शायद म्यूचुअल फ्रेंड्स से कुछ मदद मिल सके।

लैपटॉप खोलकर देखा। एक मुस्कान चेहरे पर तैर गई। एक महिला मित्र, जो वकालत के पेशे में थी और भोपाल से जुड़ी थी, सीमा की दोस्त भी थी। अब बात बन सकती है, मैंने खुद से कहा। लेकिन फिर एक संशय ने घेर लिया। अचानक उससे सीमा के बारे में पूछना ठीक लगेगा? क्या वह गलत समझेगी?

इन्हीं उलझनों में पूरा दिन निकल गया। नींद जैसे मुझसे कोसों दूर जा चुकी थी। बेचैनी बढ़ रही थी। आखिरकार, मैंने लैपटॉप फिर से ऑन किया। वह वकील मित्र ऑनलाइन दिखीं। झिझकते हुए चैट विंडो पर गया और “हैलो” लिखा। हल्के-फुल्के हालचाल पूछने के बाद, मैंने उनके केस पर चर्चा शुरू कर दी। बात खत्म होने ही वाली थी कि मैंने साहस जुटाया और सीमा और उनकी दोस्ती का जिक्र कर दिया।

लिखते समय महसूस हुआ कि शायद कुछ बातें कहने से ज्यादा आसान होती हैं लिख देना।

अब आगे का कदम क्या होगा? क्या मेरी बात उनसे होगी? क्या सीमा तक मेरी बात पहुंचेगी? या फिर यह कहानी अधूरी रह जाएगी? मेरे मन में सवालों की लहरें उठ रही थीं। चैट पर संदेश भेजने के बाद मैं बेचैनी से स्क्रीन की तरफ देखता रहा। हर गुज़रता सेकंड भारी लग रहा था। उम्मीद और डर का अजीब सा मेल था। क्या जवाब मिलेगा? क्या वह मेरी बात समझ पाएंगी?

पांच मिनट बाद, स्क्रीन पर जवाब चमका: “वो यहां की कलेक्टर हैं।”

जवाब पढ़ते ही मेरे भीतर कई भावनाएं एक साथ उमड़ पड़ीं। एक तरफ यह जानकर राहत थी कि सीमा वहां है और सुरक्षित है। लेकिन दूसरी तरफ, उसका कलेक्टर होना मेरे मन पर सवालों का पहाड़ छोड़ गया।

अब क्या करूं? मैंने खुद से पूछा। उसकी निजी ज़िंदगी के बारे में पूछना अब उचित नहीं लगा। उसका पद ऐसा था कि अगर किसी सरकारी अधिकारी को उसकी पुरानी जिंदगी के बारे में कोई चर्चा सुनाई देती, तो यह सही नहीं माना जाता। सीमा की पुरानी यादों को कुरेदना शायद ठीक नहीं होगा।

मैंने बात बदलने की कोशिश की। “ओह, कलेक्टर साहिबा!” मैंने लिखा। “शायद मैं उन्हें पहले एक बार भोपाल यात्रा के दौरान मिला हूं। उनका चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा लग रहा है।”

अपने भीतर उठते सवालों को दबाते हुए, मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की। लेकिन एक अजीब सी खालीपन की लहर मन में दौड़ गई। जैसे कुछ कहना चाहता था, जो कह नहीं पाया।

अब मैं स्क्रीन के उस तरफ बैठे अपने पुराने दिनों के अक्स देख रहा था। मन के किसी कोने में उम्मीद अभी भी थी कि शायद कोई रास्ता निकले। लेकिन इस वक्त, मैंने खुद को समझाया: कभी-कभी सवालों का जवाब ढूंढना छोड़ देना ही सबसे सही होता है। मन में अजीब सी कशमकश चल रही थी। एक तरफ सीमा के कलेक्टर बनने की खबर से गर्व महसूस हो रहा था। उसने अपने जीवन में जो मुकाम हासिल किया, वह वाकई काबिले-तारीफ था। लेकिन उसी गर्व के बीच एक टीस भी थी। अगर इस मोड़ पर हम साथ होते, तो शायद जिंदगी कुछ और ही होती।

दिल और दिमाग के बीच एक अंतहीन द्वंद्व छिड़ गया। दिल कहता, “जाओ, उससे मिलो। उसे अपनाने की बात करो।” लेकिन दिमाग तर्क देता, “क्या वह तुम्हें अपनाएगी? क्या वह बीते दिनों की ओर लौट पाएगी?”

थोड़ी देर के लिए भावनाओं पर व्यावहारिकता हावी हो गई। मैंने खुद से कहा, “सीमा से अपनाने की बात करना शायद सही नहीं होगा। वह आज जिस ऊंचाई पर है, वहां उसे अपने बीते कल में ले जाना अनुचित होगा।” पर एक बार उससे मिलकर हाल-चाल तो पूछ सकता हूँ।

यही सोचकर मैंने उसी वक्त ट्रेन की ई-टिकट बुक करवा ली। भोपाल जाने की तैयारी शुरू हो गई। दो दिन बाद की टिकट मिली, और अब वह समय काटे नहीं कट रहा था। हर गुजरता पल बस उसी के ख्यालों में बीत रहा था।

आखिरकार वह दिन भी आ गया। जब ट्रेन में बैठा, तो खिड़की के बाहर की भागती तस्वीरों में खुद को खोजने लगा। दिल की धड़कनें बढ़ रही थीं, हर पल मन में एक ही सवाल उठता: “कैसी होगी वह? क्या वह मुझे देखकर खुश होगी? क्या मैं कुछ कह पाऊंगा?”

भोपाल स्टेशन पर उतरते ही शहर की हवा में एक अजीब सी पहचान महसूस हुई। यही वह जगह थी, जहां अब वह थी। मुझे नहीं पता कि इस मुलाकात का अंजाम क्या होगा, लेकिन इतना तय था कि यह सफर सिर्फ एक मुलाकात के लिए नहीं, बल्कि खुद को एक जवाब देने के लिए था।

आज का दिन मेरे लिए खास था। सीमा से मिलने की उम्मीदें और मन में उठते सवालों ने मुझे बेचैन कर रखा था। सुबह मैं उसके दफ्तर पहुंचा, लेकिन वहां पता चला कि वह आज छुट्टी पर है। मन कुछ क्षणों के लिए उदास हो गया। फिर हिम्मत जुटाकर मैंने वहां बैठे पी.ए. से निवेदन किया, “मैं बाहर से आया हूं, सीमा से मिलना बहुत जरूरी है। क्या आप मुझे उसका घर का पता बता सकते हैं?”

कुछ झिझक के बाद उन्होंने पता लिखकर दे दिया। पता मिलते ही मैं सीमा के घर की ओर रवाना हुआ। वहां पहुंचते ही बाहर के गेट पर चौकीदार ने मेरा विजिटिंग कार्ड मांगा। कार्ड देते समय मेरे मन में हलचल मच गई। क्या वह नाम देखकर मुझसे मिलने से इनकार कर देगी? पर अब जब यहां तक पहुंच गया था, तो एक बार कोशिश करना ही सही लगा।

कुछ मिनटों बाद एक नौकर ने मुझे ड्राइंग रूम में बैठा दिया। अंदर बैठते ही मेरी नजर वहां खेल रही दो छोटी बच्चियों पर पड़ी। मन में तुरंत सवाल उठने लगे: क्या सीमा ने दूसरी शादी कर ली है? क्या यह उसकी दूसरी बेटी है?

मैं इन्हीं ख्यालों में उलझा हुआ था कि तभी सीमा अंदर आई। उसकी सहज मुस्कान और नमस्कार ने मुझे थोड़ा संभाला, लेकिन भीतर का असहजता का भाव बरकरार था। उसने बड़े ही अपनापन से पूछा, “आप इतनी दूर से आए हैं, क्या लेंगे?”

“बस एक कप चाय,” मैंने जवाब दिया। उसकी आंखों में देखना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। एक अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी, जैसे कुछ कहना चाहूं, पर कह न पाऊं।

दो-तीन मिनट की चुप्पी के बाद, सीमा ने ही बात शुरू की। “कैसे हैं आप?” उसने पूछा।

“अच्छा हूं,” मैंने जवाब दिया। “और आप?”

“मैं भी ठीक हूं,” उसने कहा।

“और बिटिया?” मैंने धीरे से पूछा।

“वह भी ठीक है, अपनी बहन के साथ खेल रही है,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “आज उसका जन्मदिन है, इसलिए ऑफिस से छुट्टी ली है। सोचा, दोनों को घुमा-फिरा लाऊं और शाम को एक छोटी सी पार्टी भी है।”

“ओह…” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला। मैंने उसके बारे में और जानने की कोशिश की। “और आपके…”

मेरा सवाल पूरा होता इससे पहले ही उसने मेरा इरादा भांप लिया। “ये दूसरी बेटी मैंने गोद ली है,” उसने कहा। “साक्षी को अकेलापन न महसूस हो, इसलिए। दोनों एक-दूसरे के साथ बहुत खुश हैं, और मुझे भी उनके साथ अपना जीवन का लक्ष्य नजर आता है।”

उसकी बात सुनकर मैं समझ गया कि वह अपने जीवन में कितना संतुलन और उद्देश्य पा चुकी है। इस बीच, नौकर चाय और नाश्ता ले आया।

चाय के कप को थामे हुए मैंने एक महत्वपूर्ण फैसला कर लिया। उसे कुछ नहीं पता। यह सोचकर मैंने उसकी खुशियों को बरकरार रखने का निर्णय लिया। “सब ठीक है,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

उसकी सरलता और सहजता ने मुझे यह समझा दिया कि अपनी कहानी सुनाकर मैं उसे व्यथित नहीं करना चाहता था। मैंने तय कर लिया कि उसकी जिंदगी में कोई नया सवाल या फैसला थोपना ठीक नहीं होगा।

चाय खत्म होते ही मैंने जाने की इजाजत मांगी। उसने सहमति में सिर हिलाया। दरवाजे तक आते-आते मेरे कदम भारी हो रहे थे। बाहर जाते हुए मैंने आखिरी बार पलटकर देखा। उसकी मुस्कान में वह सुकून था, जिसे मैं अपनी परेशानियों से नहीं छीनना चाहता था।

उस दिन मैंने अपनी खुशी को उसके सुकून के लिए कुर्बान कर दिया, और शायद यही मेरा सबसे बड़ा प्रायश्चित था।

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Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor