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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी स्टोरी-5 : स्वप्न, श्रद्धा और सरोवर : जब मां चामुंडा ने सर प्रताप सिंह को दिया था कायलाना झील बनाने का आदेश

इतिहासकार स्व. एनके शर्मा के शोध में सामने आया है कि अकाल से त्रस्त मारवाड़ को बचाने के लिए जोधपुर राजपरिवार की कुलदेवी मां चामुंडा के आदेश पर बना था ‘प्रताप सागर’, जिसे आज दुनिया कायलाना झील के नाम से जानती है। स्व. शर्मा को कायलाना क्षेत्र में प्राचीन भग्नावस्था में शिलालेख मिला था, जिस पर राजस्थानी भाषा में कुछ उत्कीर्ण था। बतौर स्व. एनके शर्मा- इसमें दैवीय किवदंती का वर्णन था। बतौर स्व. एनके शर्मा- सर प्रताप सिंह को एक स्वप्न आया था, जिसमें कुलदेवी मां चामुंडा ने तीन ओर से घिरे पहाड़ी क्षेत्र में कृत्रिम झील बनाने का आदेश दिया था, बताया जाता है कि यह झील जब बनकर तैयार हुई तो मां चामुंडा के खुशी के आंसू निकल आए और उन आंसुओं से झील भर गई!

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर/जैसलमेर

9783414079 diliprkahai@gmail.com

मारवाड़ की धरती सदियों से वीरता, परंपरा और आस्था की गवाह रही है। यहां की रेत में जितनी वीरगाथाएं दबी हैं, उतनी ही लोककथाएं भी सांस लेती हैं। इन्हीं लोकविश्वासों और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच एक ऐसी कहानी सामने आती है, जो केवल जल संरक्षण की नहीं बल्कि श्रद्धा, संवेदना और जनकल्याण की मिसाल बन चुकी है। यह कहानी है जोधपुर की प्रसिद्ध कायलाना झील की, जिसे पहले ‘प्रताप सागर’ के नाम से जाना जाता था।

इतिहासकार स्वर्गीय एनके शर्मा के शोध में सामने आया कि कायलाना झील का निर्माण केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि इसके पीछे देवी आस्था और जनसेवा का अद्भुत संगम था। इतिहासकार स्व. एनके शर्मा को कायलाना क्षेत्र में एक भग्नावस्था में शिलालेख मिला था, जिसमें राजस्थानी भाषा में कुछ उत्कीर्ण था। जिसमें देवीय किवदंती की कहानी सामने आई थी। स्व. एनके शर्मा के शोध के अनुसार, पूर्व राजपरिवार की कुलदेवी मां चामुंडा ने स्वप्न में सर प्रताप सिंह को आदेश दिया था कि तीन ओर पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र में एक विशाल झील का निर्माण करवाया जाए, ताकि अकाल और जल संकट से त्रस्त मारवाड़ की जनता को राहत मिल सके।

यह केवल एक स्वप्न नहीं था, बल्कि एक ऐसा संकल्प था जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार तैयार किया। आज भी कायलाना झील जोधपुर की जीवनरेखा मानी जाती है और हजारों लोगों की प्यास बुझा रही है।

जब बूंद-बूंद पानी को तरसता था मारवाड़

आज जिस जोधपुर को पर्यटन और संस्कृति के लिए जाना जाता है, वहां एक समय पानी सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था। मारवाड़ का भूगोल ऐसा रहा है कि यहां वर्षा बेहद कम होती थी और अकाल लगभग हर कुछ वर्षों में दस्तक दे देता था। गांवों में कुएं सूख जाते थे, तालाबों का पानी समाप्त हो जाता था और लोग मीलों दूर से पानी लाने को मजबूर होते थे।

ऐसे कठिन समय में शासकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रजा के लिए पानी की व्यवस्था करना था। पानी के अभाव में खेती चौपट हो जाती थी, पशुधन नष्ट होने लगता था और आमजन का जीवन संकट में पड़ जाता था।

कहा जाता है कि इसी भीषण संकट को देखकर मां चामुंडा ने सर प्रताप सिंह को स्वप्न में दर्शन दिए। देवी ने उन्हें आदेश दिया कि पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र में एक विशाल जलाशय बनाया जाए, जिससे आने वाले समय में मारवाड़ अकाल की त्रासदी से बच सके।

सर प्रताप सिंह ने इस स्वप्न को केवल धार्मिक संकेत नहीं माना, बल्कि इसे जनता की सेवा का संदेश समझा। उन्होंने तत्काल उस क्षेत्र का निरीक्षण करवाया और झील निर्माण का निर्णय लिया।

1872 में शुरू हुआ इतिहास बदलने वाला निर्माण

इतिहासकारों के अनुसार, 1872 में कायलाना झील का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। उस समय इसे ‘प्रताप सागर’ नाम दिया गया था। यह लगभग 84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली विशाल कृत्रिम झील थी।

झील निर्माण का कार्य आसान नहीं था। उस दौर में आधुनिक मशीनें नहीं थीं। पहाड़ियों के बीच जल संग्रहण की योजना बनाना, मिट्टी और पत्थरों से बांध तैयार करना तथा पानी के बहाव को नियंत्रित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था।

बताया जाता है कि इस निर्माण पर लगभग 65 हजार रुपए खर्च हुए थे, जो उस समय बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी। आर्थिक संकट आने पर राजपरिवार ने भी त्याग का परिचय दिया। लोककथाओं के अनुसार, धन की कमी होने पर महारानी के गहने तक बेच दिए गए ताकि निर्माण कार्य रुक न सके।

यह घटना बताती है कि उस समय जल संरक्षण को किस गंभीरता से लिया गया था। शासकों के लिए यह केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि जनता के जीवन को बचाने का अभियान था।

मां चामुंडा के आंसुओं से भर गई झील!

इतिहासकार स्व. एनके शर्मा के शोध में एक अत्यंत रोचक और आस्था से जुड़ा प्रसंग सामने आता है। बताया जाता है कि जब झील का निर्माण पूरा हुआ तो मां चामुंडा अत्यंत प्रसन्न हुईं।

लोकमान्यता है कि देवी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और उन्हीं आंसुओं की बूंदों से यह झील भर गई। भले ही यह एक धार्मिक और लोकविश्वास से जुड़ी कथा हो, लेकिन मारवाड़ के लोगों के लिए यह कहानी केवल कल्पना नहीं, बल्कि भावनात्मक सत्य है। यही कारण है कि आज भी कायलाना झील को लोग केवल जलाशय नहीं, बल्कि देवी कृपा का प्रतीक मानते हैं।

राजस्थान में जल स्रोतों को हमेशा धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जोड़ा गया है। यहां तालाबों, बावड़ियों और झीलों को केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता माना जाता रहा है। कायलाना झील की कथा भी उसी परंपरा का हिस्सा है।

कौन थे सर प्रताप सिंह?

  • जन्म : 1845
  • निधन : 1922
  • पिता : महाराजा तख्त सिंह
  • पहचान : जोधपुर के प्रभावशाली शासक, सेनापति और प्रशासक
  • पद : रीजेंट, प्रधानमंत्री और ब्रिटिश भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल
  • विशेषता : न्यायप्रिय, निडर और दूरदर्शी शासक
  • योगदान : कायलाना झील निर्माण, सामाजिक सुधार और जोधपुरी कोट डिजाइन

न्याय के देवता क्यों कहलाते हैं सर प्रताप सिंह?

जोधपुर में आज भी सर प्रताप सिंह को न्याय का देवता माना जाता है। कचहरी में लोग अपनी अटकी हुई फाइलें और प्रार्थनाएं लेकर पहुंचते हैं। मान्यता है कि उनके प्रतिमा के सामने फाइल रखने से लंबे समय से अटके मामलों का समाधान जल्दी होता है। यह विश्वास बताता है कि जनता के मन में आज भी उनके न्यायप्रिय व्यक्तित्व के प्रति कितनी गहरी आस्था है।

जोधपुरी कोट के डिजाइनर भी थे सर प्रताप सिंह

विश्व प्रसिद्ध ‘जोधपुरी कोट’ को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय भी सर प्रताप सिंह को दिया जाता है। उनकी पोशाक शैली राजसी गरिमा और आधुनिकता का अनूठा संगम थी। बाद में यही डिजाइन ‘बंदगला’ या ‘जोधपुरी सूट’ के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध हुआ। आज भी शादियों और औपचारिक आयोजनों में यह परिधान शान का प्रतीक माना जाता है।

बिना बैक गियर की गाड़ियां!

सर प्रताप सिंह के व्यक्तित्व से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बेहद प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि उनकी गाड़ियों में बैक गियर नहीं होता था। इसके पीछे उनका सिद्धांत था कि जीवन और शासन दोनों में हमेशा आगे बढ़ना चाहिए, पीछे नहीं हटना चाहिए। यह सोच उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और प्रगतिशील दृष्टिकोण को दर्शाती है।

समाज सुधारक भी थे सर प्रताप सिंह

सर प्रताप सिंह केवल योद्धा या प्रशासक ही नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने बाल विवाह, मृत्यु भोज और दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाए। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों के साथ सामाजिक चेतना पर भी जोर दिया। यही कारण है कि उन्हें मारवाड़ के आधुनिक विकास का प्रमुख आधार माना जाता है।

युद्धभूमि से प्रशासन तक दिखाई वीरता

सर प्रताप सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल थे। उन्होंने दूसरे अफगान युद्ध और प्रथम विश्व युद्ध में भी भाग लिया। विशेष बात यह थी कि लगभग 70 वर्ष की आयु में भी वे युद्धभूमि में सक्रिय रहे। उनकी बहादुरी और नेतृत्व क्षमता की चर्चा देश-विदेश तक होती थी।

झील निर्माण के लिए तोड़े गए महल और बगीचे

इतिहास के अनुसार, जहां आज कायलाना झील स्थित है, वहां पहले राजा भीम सिंह और तख्त सिंह द्वारा बनाए गए सुंदर बगीचे और महल हुआ करते थे। लेकिन जनता की जरूरत को प्राथमिकता देते हुए उन्हें ध्वस्त कर झील का निर्माण किया गया। यह निर्णय बताता है कि उस समय शासकों के लिए जनहित सर्वोपरि था।

आज भी जोधपुर की जीवनरेखा है कायलाना

समय बदल गया, तकनीक बदल गई, लेकिन कायलाना झील का महत्व आज भी बरकरार है। यह झील आज भी जोधपुर के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत मानी जाती है। गर्मियों में जब जल संकट बढ़ता है, तब यह झील शहर को राहत देती है। साथ ही यह स्थान पर्यटन, प्राकृतिक सौंदर्य और सूर्यास्त के लिए भी प्रसिद्ध है। शाम के समय यहां का दृश्य लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

इतिहास, आस्था और जल संरक्षण का अद्भुत संगम

कायलाना झील केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि यह मारवाड़ की दूरदर्शिता, आस्था और जनसेवा का जीवंत उदाहरण है। एक ओर यह झील जल संरक्षण की ऐतिहासिक मिसाल प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर मां चामुंडा और सर प्रताप सिंह की कथा इसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी प्रदान करती है। आज जब दुनिया जल संकट से जूझ रही है, तब कायलाना झील का इतिहास हमें यह संदेश देता है कि यदि शासन, समाज और आस्था एक साथ मिल जाएं तो असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं। मारवाड़ की धरती पर बना यह सरोवर केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जिसमें जनता की भलाई सर्वोपरि थी। शायद यही कारण है कि आज भी लोग श्रद्धा से कहते हैं—“यह केवल झील नहीं, मां चामुंडा का आशीर्वाद है।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor