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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी काव्य धारा-3 : कवि : एनडी निम्बावत ‘सागर’

कवि : एनडी निम्बावत ‘सागर’

परिचय (एनडी निम्बावत। पेशे से एडवोकेट। वरिष्ठ साहित्यकार और समाजसेवी और चिंतक। हिंदी और राजस्थानी के अलावा अंग्रेजी पर कमांड।प्रसिद्ध गीतकार, कवि, शायर और लेखक। कृतियां- “मेरी कलम आईना”,
उपन्यास- मंजिल कहाँ (प्रकाशाधीन), उपन्यास- अधूरे सपने अप्रकाशित, उपन्यास- चाहत अप्रकाशित, उपन्यास- गांव हो या शहर अप्रकाशित, शिक्षा एमए.(अर्थशास्त्र), एलएल. बी; डी.सी.एल.एल; एम.ए.(राजस्थानी)। व्यवसाय- वकालत, विधि सलाहकार- नगर निगम, जोधपुर, पैनल लॉयर- राजस्थान ग्रामीण बैंक, पैनल लॉयर- कर्नाटका बैंक लिमिटेड, अध्यक्ष – इंडिगो पब्लिक सीनियर सेकंडरी स्कूल (इंग्लिश मीडियम) एवं – नवीन बालवाड़ी सीनियर सेकंडरी विद्यालय (हिंदी मध्यम), परामर्शदात्री समिति सदस्य-स्वास्थ्य साधना प्रन्यास, जोधपुर(रजि.), (प्राकृतिक चिकित्सालय, जोधपुर), राष्ट्रीय महासचिव-अखिल भारतीय वैष्णव(च स) विकास ट्रस्ट, मुम्बई (रजि.), महासचिव-वैष्णव धर्मशाला, हरिद्धार, महासचिव-वैष्णव धर्मशाला, वृन्दावन, मथुरा, कार्यकारिणी सदस्य-वैष्णव धर्मशाला, पुष्कर, अजमेर राजस्थान। सदस्य सलाहकार समिति- स्वास्थ्य साधना केंद्र(प्राकृतिक चिकित्सालय), जोधपुर।अध्यक्ष – शिवनाथ नगर विकास समिति, जोधपुर(रजि.)। उपाध्यक्ष- श्री रामेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट, पांचवी रोड., जोधपुर। सदस्य-अभिव्यक्ति मंच, रुड़की (राष्ट्रीय स्तर)। संरक्षक व क़ानूनी सलाहकार -काव्य मञ्जरी सा. मंच (रजि.), गाजियाबाद (राष्ट्रीय स्तर), सदस्य- अखिल भारतीय साहित्यक संस्था “प्रसंग”, जबलपुर (राष्ट्रीय स्तर), सदस्य- साहित्यिक संस्था “मंथन श्री”-
सदस्य- खुशदिलान -ए-जोधपुर(रजि.)। उपाध्यक्ष- सृजना, जोधपुर। पुत्र-गौरव निम्बावत-एडवोकेट, पुत्र-जितेंद्र निम्बावत,एडवोकेट (Tax Practioner), पुत्र- महिम निम्बावत-सॉफ्टवेयर इंजीनियर Dy. Director IT, राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर। प्रो.m3 microtech. Jodhpur, सम्मान- 1 गौरवशाली साहित्य सेवा सम्मान (श्री माणक शिव ट्रस्ट, जोधपुर रजि.), 2 सामाजिक कर्मयोगी सम्मान
(स्व.शंकरलाल अणची बाई विरवानी ट्रस्ट रजि. जोधपुर), 3 वैष्णव रत्नाभूषण सम्मान, (श्री किंकर महारामायण लोकार्पण समिति, पाली राजस्थान), 4 काव्य शिरोमणि सम्मान (साहित्यिक संस्था प्रसंग, जबलपुर), 5 उत्कृष्ठ समाज सेवा सम्मान (वैष्णव ब्राह्मण मार्तण्ड, अजमेर), 6 Proud Donor (वनबंधु परिषद, अन्तर्राष्ट्रीय संस्था), 7 श्री रामभावाभिषेक महानुभाव श्री सम्प्रदाय अनादि पीठ श्रीमठ, काशी। Court Address : 41, Jubilee Chambers
District Court, Jodhpur(Raj.), 76, Advocate Chambers
Rajasthan High Court New Building, Jhalamand, Jodhpur.
Resi.cum office: “SHREERAM” 106, Shivnath Nagar, Nagar, Suthala, Chopasani Road, Jodhpur(Raj.)। 0921-2752119,
0291-2752139, 9314713779 & 9414043779)

ग़ज़ल : रस्में निभानी होती है

जमाने में रस्में निभानी होती है
चेहरे पर हंसी दिखानी होती है

दिल के दर्द को दिल ही जाने यहां पर
किसे मालूम क्या-क्या कहानी होती है

खामोश रहते हुए जमाना हो गया
किसी को कहां बात बतानी होती है

उसे खोने का डर तो लगा रहता है
जब कोई अपनी पहचानी होती है

यूं ही नहीं मिल जाता कुछ जमाने में
बहुत कुछ कीमत तो चुकानी होती है

जरूरी नहीं सीरत अच्छी हो “सागर”
यहां जिसकी सूरत नूरानी होती है

गीत : वक्त जरा तू धीरे चल

ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल

आंधियों ने बुझा दिए सब दीये
छूट गए सब संगी साथी
आसमां के चांद की भी रोशनी
कोई रास्ता है नहीं दिखाती
थोड़ा चलने के लिए हम जाएं सम्भल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल….

जमाने में नहीं है सभी एक समान
कोई अमीर है तो कोई है गरीब
सबकी अपनी अपनी मजबूरियां हैं
सबका कहां है एक जैसा नसीब
आज न सही, बदल जायेगा ये कल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे…..

माना कि तुझे अपनी गति चलना है
कोई भी तुझे रोक नहीं सकता
मगर लोगों को है तुमसे बड़ी उम्मीदें
कहां रुकेगा, बेचारा आदमी ये कहता
बड़ा भारी लग रहा है पल-पल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल….

बस एक ही ख़्वाहिश है हर इंसां की
तू उसके साथ रह, उसके साथ चल
ख्वाहिशें ही वजह है आदमी के जीने की
कम से कम तू तो उसे न कुचल
हो जायेगा सवेरा, ये रात जायेगी ढल
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल
ऐ वक़्त तू धीरे चल….

बाल कविता : कैसा होगा भविष्य

कैसा होगा भविष्य हमारा

हम नन्हें-नन्हें बच्चों की,
समस्याएं हैं अपार ।
जल्दी उठो, नहाओ धोओ,
जाओ स्कूल के द्वार ।।

लम्बा रस्ता, भारी बस्ता,
कौन सुने हमारी पुकार ।
स्कूल में करो पढ़ाई,
घर पर होम वर्क का भार ।।

बारिश में भीगने देते नहीं,
कहते हो जाओगे बीमार ।
कैसे बनाएं मिट्टी का घर,
कैसे सजे सपनों का संसार ।।

खेलें-कूदें कहां पर हम,
पास नहीं कोई है पठार ।
सूना घर, सूना मन,
मम्मी-पापा रहते बहार।

किसे कहें हम चाचा, ताऊ,
छोटा जो है हमारा परिवार ।
कैसा होगा भविष्य हमारा,
सोचते हैं हम बार-बार ।।

कविता : कविता का जन्म

जब किसी कागज़ का
कलम से रिश्ता बना
तब कविता का जन्म हुआ ।

निगाहों का निगाहों से मिलन
दिल में कोई फूल खिला
तब कविता का जन्म हुआ ।

नहीं लगी जब कोई बात अच्छी
मगर खामोश रहना पड़ा
तब कविता का जन्म हुआ ।

कभी अपनों से, कभी गैरों से
कोई गहरा सा दर्द मिला
तब कविता का जन्म हुआ ।

भले ही खुशियां कम ठहरे
मगर खिला देती हमारा चेहरा
तब कविता का जन्म हुआ ।

बिन वजह दोस्तों की महफ़िल सजी
चलने लगा यादों का सिलसिला
तब कविता का जन्म हुआ ।

चांदनी रात में तन्हाई का आलम
पहाड़ सा महसूस होने लगा
तब कविता का जन्म हुआ ।

आसमान में कतार में उड़ते पंछी
दृश्य ऐसा मन को छूने लगा
तब कविता का जन्म हुआ ।

देशकी सीमाओं की रक्षा के लिए
बंदूक लेकर सिपाही चलने लगा
तब कविता का जन्म हुआ ।

कविता : आसमान का बादल

मैं आसमान का बादल हूं
हवा के साथ चलता हूं
सागर से निकलता हूं
जमीं पर बरसता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…
देखकर मुझे खिल जाते
लोगों के चेहरे
सबको डराने मैं
जोर-जोर से गरजता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…
बिजलियां चमकने
लगती है तब
जब मैं बरसने को
खूब तड़फता हूँ
मैं आसमान का बादल हूं…
मेरा वजूद तो है
सिर्फ औरों के लिए
मैं अपने लिए
कब पलता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…
बनके नदी मैं गांव-शहर
आबाद करता
लोगों की प्यास बुजाता
सागर से जा मिलता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…
सागर मेरा डेरा है
सदा वहीं मेरा बसेरा है
कभी मैं रुकता नहीं
बस चलता रहता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…
भानु से है मेरा
जन्म जन्म का वास्ता
उसी की बदौलत मैं
बनता- बरसता हूं
मैं आसमान का बादल हूं…

गीत : यही आरजू

बस मेरी है यही आरजू आरजू
कि निगाहों में रहे, रहे बाहों में तू

बस मेरी है यहीं आरजू आरजू
बस मेरी है यही आरजू आरजू

चाहे दुनिया मिले या मिले ना मिले
चाहे खुशियां या मिले ना मिले
बस तेरे होंठों की ये दो कलियां खिले
इन कलियों से अपना मैं गुलशन सजा लूं
बस मेरी है यही आरजू आरजू
बस मेरी है यही आरजू आरजू

चाहे दौलत मिले या कि जन्नत मिले
किसको परवाह अगर मुसीबत मिले
बस मुझको तुम्हारी मुहब्बत मिले
दिल की हसरत ये मैं सबको बता दूं
बस मेरी है यही आरजू आरजू
बस मेरी है यही आरजू आरजू

मेरे दिल की ये हालात क्या हो गई
जब तुमपे मेरी निगाह हो गई
अब जीना भी यूं एक सजा हो गईं
आग खुद ही लगाई मैं कैसे बुजा दूँ
बस मेरी है यही आरजू आरजू
बस मेरी है यही आरजू आरजू

कविता : ये जीवन

ये जीवन
छोटी-छोटी कहानियों का
एक संग्रह है
जिसमें
तरह-तरह की स्क्रिप्ट
समय हमसे लिखवाता है
और
स्क्रिप्ट के हिसाब से हमें
अपना किरदार निभाना पड़ता है
हर एक कहानी का अंत तो है
मगर
एक सा नहीं होता है
किसी कहानी का अंत सुखद है
तो
किसी कहानी का अंत
दुःखद भी होता है
जब
सम्पूर्ण कहानियों का
अंत हो जाता है
तो
जिंदगी के रंगमंच का
पर्दा गिर जाता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor