कवि : राजेश मोहता
परिचय (राजेश मोहता। निजी कॉलेज में हिंदी व्याख्याता। जब से दुनियादारी की समझ आई समझ में आया कि दुनियादारी तो राजेश ने कभी समझी नहीं। दुनिया के दांव-पेच, छल-छद्मों से दूर, गंभीर मगर शांत नहीं-भीतर आग धधक रही है, जो बाहर आती है कलम और शब्दों के माध्यम से। दुनिया राजेश को असफल मानती है, मगर एक संपादक होने के नाते मैं राजेश को असफल नहीं मानता। वह एक ऐसा योद्धा है जो महाराणा प्रताप की तरह स्वाभिमानी और स्वतंत्र होने की घोषणा करता है। अभावों के साथ जीना स्वीकार करता है, मगर सिद्धांतों और स्वाभिमान से समझौता नहीं करता। मैं राजेश मोहता को लंबे अरसे से जानता हूं, जीवन में उन्होंने संघर्ष की राह अपनाई। वो एसी रूम में बैठकर कविता सृजन नहीं करते। उनकी कविता मरुस्थल में तपती रेत पर बैठकर होती है। वे प्रकृति के चितेरे हैं तो प्रकृति के खिलाफ भी बगावत कर बैठते हैं। प्रकृति भी कभी-कभी इंसान की परीक्षा लेती है। इस परीक्षा में राजेश प्रकृति को चुनौती देते हैं। उनके शब्द-शब्द संघर्ष की परिभाषा गढ़ते हैं। उनके शब्दों के कई अर्थ निकलते हैं, मगर अर्थहीन कविता नहीं है उनके शब्द। महानगर की भीड़ में वे अकेले हैं। लेकिन हारे नहीं हैं। हारना राजेश का स्वभाव नहीं हैं। वे इसी ऊर्जा के साथ लिखते रहें, उनकी कलम चलती रहे। हम यहां पर उनका परिचय डिग्री, साहित्य और तथ्यों से नहीं देकर वस्तु स्थिति के रूप में दे रहे हैं। क्योंकि राजेश का परिचय खुद राजेश है। )
मेरे हिस्से की दुनिया…
मैं
वचनबद्ध
कवचहीन
उपेक्षित
धिक्कारा गया
साधनविहीन
यौद्धा हूं।
मैं कर्ण हूं
इसलिए पाता कुछ नही
सिर्फ खोता हूं।
मैं युद्ध मे
अपनी बारी आ जाने के इंतजार मे
बूढ़ा हो गया हूं।
मैं बेवजह ही
अपने समकालीन राजकुमारों मे
बिना नाम, काम के
जा बैठा हूं।
मुझे औरतों ने
मुंह मे भर आये
बेस्वाद थूक की तरह
थूक दिया है
पर बावजूद इसके
मैं राह मे पड़ी धूल से
लिपट कर
पृथ्वी की प्यास बुझा रहा हूं
सच तो यह है
कि मैं बार बार नकार दिया गया हूं
जन्म लेते ही मार दिया गया हूं
इतना तय है कि जो दुनिया मेरे हिस्से मे है
वह ईश्वर की नहीं है।
अगर मैं वापस लौटा…
अगर मैं वापस लौटा
तो आंसू पोंछने के लिए लौटूंगा
गले लगा कर दुख को उतार लूंगा सीने में
पीड़ा के पथ पर तुम्हारा साथी बनूंगा
अंधेरे में तुम्हारे साथ बैठ जाऊंगा।
अगर वापस लौटा
तो धूप लेकर लौटूंगा
तुम्हारे अंधेरे जीवन में
बरसूंगा बादल की तरह
और इंद्रधनुष बनकर
तन जाऊंगा तुम्हारे हाथों में
ठंडी हवा का झोंका बन लौटूंगा
वक्त के पतझड़ में
धरती के फूलों की सारी खुशबू
ले आऊंगा तुम्हारे लिए।
अगर लौटा
तो आग बनकर लोटूंगा
और धधकूंगा तुम्हारे सीने में।
अगर मैं लौटा
तो तुम जान जाओगे कि
मैं लौट सकता हूं वापस
अगर लौटा
तो कुछ लेकर लौटूंगा
खाली हाथ लौट कर
क्या करूंगा मैं।
झूठ से लड़ाई
लड़ाई थी झूठ से
पर पीछे हट गया
सत्ता के मुंह पर फिर वो
ताले सा लटक गया।
झूठ को पाला जिसने
ऊंचा वेतन दे देकर
जहर उन्हीं का वो
अमृत सा गटक गया।
सच के कपड़े पहनकर
खुद को सजाया जिसने
सत्ता के गलियारों में
वो नंगा ही पसर गया।
डरा डरा सा सच
घूमता है अकेला
लौट कर अपने घर में
वहां भी भटक गया।
मुझे नहीं लगता
मुझ में कोई सच था
तभी तो लड़कर झूठ से
वो हर रोज मर गया।
मरता हूं रोज
और फिर जन्म जाता हूं
इस जन्म मरण के चक्कर में
जाने कौन पटक गया।
शायद वो ईश्वर होगा
तो जवाब है मेरा उसे
मैं तो रोज मरता हूं
पर तू कब मर गया।
दुमुंहे सांप की भाषा
दुमुंहे सांप की तरह वह बोला
तुम अपना संघर्ष खुद करो
मन ही मन में उगली यह गाली
यार तुम भाड़ में जाकर पड़ो।
सच्चाई पर चलो सदा अच्छे बने रहो
बुदबुदाया फिर खुद वो
तुम सड़ सड़ कर मरो।
आइए आइए ……….
आपका ही इंतजार है
डूब मरो चुल्लू भर पानी में
कितना भद्दा दीदार है।
जानते हो मैंने कितना संघर्ष किया है
भीतर का मक्कार बोला
मैंने तो लिया ही लिया है।
सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है
लगता है इसको हो गया कोई भरम है
यह दुनिया तुम जैसों से ही चलती है
इसीलिए हमारी तो मस्ती ही मस्ती है।
समय का सांप
लगता है
समय के सांप ने
डस लिया है मुझे।
अब मैं जहर बुझे
अंधों के साथ अंधा बनकर
वार करूं हाथ से या जुबान से
हर बार बेकसूर मारा जा रहा है।
घर खाली हो गए हैं
और सड़के हो गई है आबाद।
अब गांव हो या शहर
हर तरफ राजनीति
मूंछों पर बट दे रही है।
और जो भोले हैं, भले हैं
उन्हें भूल गए हैं लोग।
देश में पांव घसीटती हुई
चल रही है ईमानदारी।
उल्लू सरपट दौड़ रहे हैं।
वो घर……
जहां जलता है प्रेम का दिया
नजरों से ओझल हो चुका है।
अनसुने माहौल में
मां गुनगुना रही है भजन।
अकेली और अनाथ
लड़ी जा रही है लड़ाइयां।
मंदिर में पड़ी मूर्ति
और दीवार पर लटकती
पिता की तस्वीर
धूल से धुंधली पड़ गई है
लगता है
पिता और भगवान
एक जैसे हो गए हैं।
मेरे शहर में…
मेरे शहर में
जो हो रहा है रोज
वो तेरे शहर में भी होता होगा।
यहां हर आदमी
सड़क पर पोस्टर की तरह
अपना चेहरा लेकर भाग रहा है।
लोगों की जीभ पर
नेताओं की जुबान पसर गई है।
आकाश में पतंग की जगह
हेलीकॉप्टर उड़ रहे हैं
शायद किसी उत्सव विरोधी
नेता का आगमन हुआ है शहर में।
सत्ता का चरित्र
भाषा में गिर गया है
और भाषा बह कर
गटर की तरफ जा रही है।
बैंकों में खाते खुल रहे हैं
और पैसा दुकानदारों की जेबों में जमा हो रहा है।
यह देखकर कुछ लोगों का
खून खौल रहा है
और पत्रकार उनमें
खबरें तल रहे हैं गरमा गरम।
दो जून की रोटी कमाकर
लोग चार जून का खाना
कचरा पात्र में फेंक रहे हैं।
गायें गंदगी खा रही है
और भक्त कर रहे हैं उनकी पूजा।
शहर मांझे की तरह
खुद में उलझ कर रह गया है
फिर भी गांवों की उससे मुठभेड़ जारी है।
टूटी हुई साइकिल को
सड़क पर उतारकर
कुछ लोग अर्थी की तरह
जा…
पुराने दिनों में…
कार में दोस्त
हाथ हिलाता हुआ गुजर गया।
धूल बहुत सारी
उड़ाता हुआ गुजर गया।
तब दबा किताबों में एक
सूखा गुलाब महकता रहा।
मैं पुराने दिनों में पहुंच
बहुत देर बहकता रहा।
अचानक याद आया अब
सड़क किनारे खड़ा हूं।
पंचर साइकिल लिए
धूल से भरा पड़ा हूं।



