कवयित्री : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’
परिचय (पेशे से व्याख्याता। नाम के अनुरूप काव्य में स्वयंसिद्धा है। व्याकरण और भाषा पर अच्छी पकड़ है। हर विषय पर कविता लिखती हैं। प्रेम, स्नेह, मानवता, करूणा, प्रकृति, सद्भाव और जज्बातों से परिपूर्ण काव्य में उनकी विद्वता के साथ भाव-गंभीरता भी परीलक्षित होती है। दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कविता और गीत के साथ हाइकू भी लिखती हैं और लघु कथाएं और कहानियां भी नीलम जी की प्रिय विधा है। कई लेखक-लेखिकाओं की पुस्तकों की समीक्षा भी समय-समय पर लिखती हैं।)
मन पावन…
कोमल शांत लगे मन पावन,
बालक की छवि है मनहारी।
खेल रहा सुध खोकर बालक,
फूल खिले खुश है फुलवारी।।
मोहक है मुख प्रेम भरा उर,
बालक कोंपल है मधुहारी।
कृष्ण बड़े मन भावन हो तुम,
नाच रहे मिल गोप दुलारी।।
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गाता गीत ऋतुराज है
राग सुर ताल सजाता हुआ,
गाता नव गीत ऋतुराज है।
झूमें खग विहग गूँज कलरव,
बजाती समीर सुख साज है।।
नील व्योम भी निरख रहा है,
सतरंगी छटा इस धरा की।
फूल फूल पे छा गयी खुशी,
मोहिनी सी आभा धरा की।
लागे रंगमंच सा उपवन ,
थाप पे थिरके कविराज है।
राग सुर ताल सजाता हुआ,
गाता नव गीत ऋतुराज है।।
ओ री वासंती ओढ़ रही,
चुनरी झीनी प्रीती गौरी।
पीत पुष्पों से सजा उपवन,
पूजन चली शारदे छोरी।
भोर लाली से भरी बगिया,
है वसंत लगे युवराज है।
राग सुर ताल सजाता हुआ,
गाता नव गीत ऋतुराज है।।
मृग नयनी प्रेमिल भाव धरे,
मिलन प्रिय देखो आ रही है। प्रीतम छवि को हृदय में समा,
सजके वो गजब ढा रही है।
बोल मधुर कोयलिया के सुन,
मन भाव विभोर मृगराज है।
राग सुर ताल सजाता हुआ ,
गाता नव गीत ऋतुराज है।।
राग सुर ताल सजाता हुआ,
गाता नव गीत ऋतुराज है।
झूमें खग विहग गूँज कलरव,
बजाती समीर सुख साज है।।
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सृजन लक्ष्य को पाना है राही
शब्द शब्द में भाव सजा कर ,जीवन गीत सुनाना है।
वर दो अब हे मातु शारदे!,सृजन लक्ष्य को पाना है।
सत्य धर्म हित में हो वाणी ,ऐसा राग बनाना है।
वर दो अब हे मातु शारदे!,सृजन लक्ष्य को पाना है।।
पढ़े दीन दुखी के दर्द को , मन के भाव दिखा देंगे।
चले कलम हक की बातों पर ,न्याय नीति अपना लेंगे।
जन जन की आवाज बनें हम , दम लेखन में लाना है।
वर दो अब ये मातु शारदे!,सृजन लक्ष्य को पाना है।
चुन चुन नवल अक्षर मुक्तामणि, काव्य में पद को जोड़े।
रचना मौलिक हर दम रचते,कलम साधना क्यों छोड़े ।
सत साहित्य पावन रच गढ़े ,जग पे फिर छा जाना है।
वर दे अब ये मातु शारदे!,सृजन लक्ष्य को पाना है।
छंद साध के काव्य उत्तम,रचकर के सुख मिलता है।
नवरस भरे प्रेमिल छंद में, फूल लेखनी खिलता है।
तिमिर अज्ञान का मिटाकर यूँ,गीत प्रभा दिख लाना है।
वर दे अब हे मातु शारदे,सृजन लक्ष्य को पाना है।
शब्द शब्द में भाव सजाकर,जीवन गीत सुनाना है।
वर दो अब हे मातु शारदे,सृजन लक्ष्य को पाना है।
गीत लिखने बैठूं…
जब भी गीत लिखने बैठूँ,
याद तिहारी आ जाती है।
सूने मन का तिमिर भगाती,
मन दीपक की तू बाती है।
जबसे नाम जुड़ा है साथी,
विरह वेदना मुझे सताती।
साँझ सवेरे लिखती रहती,
मैं सजना को प्रेमिल पाती।
जब भी उगता दिनकर देखूँ,
प्रीतम छवि झलक दिखाती है।
सूने मन का तिमिर भगाती,……….1
तेरे ख्यालों में डूबी हूँ,
जैसे मीन सरोवर में हो।
खिलती जाती प्रिय तब तब मैं,
निहार रहे नैन घर में हो।
जब भी दर्पण में मुख देखूँ ,
नजरें मन को भरमाती हैं।
सूने मन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,2
कैसे लिख दूँ छन्द रुबाई ,
कैसे सुर भरी सजें सरगम।
गीत गज़ल भी रुसवा मुझसे ,
विरहन मन है अँखिया कुछ नम ।
जब भी जिया बावरा तड़पे,
धड़कन बढ़ती तब जाती है ।
सूने मन का ,………………….3
जब भी लिखने गीत मैं बैठूँ,
याद तिहारी आ जाती है ।
सूने मन का तिमिर भगाती,
मन दीपक की तू बाती है
अब तो देश की सोचो कविराज
बहुत गा चुके गीत श्रृंगार के,
अब तो देश की सोच लो कविराज।
कपोल कल्पित बातें हुईं बहुत,
अब तो लोक की सुन लो कविराज।
महज कल्पना से मन नहीं भरता,
चिंतन यथार्थ का जरूरी है।
मीठी चुपड़ी बातों को तज के,
अंगार उगलना भी जरूरी है।
बहुत हो चुकी रास लीला क्रीड़ा,
अब सत का मोर्चा थामो कविराज।
बहुत गा चुके…………………….1
बहुत गा चुके गुण सौंदर्य के,
तेजोबल को भी दे दो मान ।
रूप सिंगार उलझे नैना क्यों,
ज्ञान बुद्धि बल बने पहचान।
बहुत हो गया नख शिख वर्णन,
आत्मिक बल लो सुध कविराज।
बहुत गा चुके,………………….2
दीन दलित के हित का सोचों,
लोक को समझो लोक को जानो।
संस्कृति का गुणगान करो अब,
प्राचीन सभ्यता को भी पहचानो।
बहुत हुआ हास्य रस मनोरंजन,
चित गाम्भीर्य है जरूरी कविराज।
बहुत गा चुके गीत,…………3
बहुत गा चुके गीत श्रृंगार के,
अब तो सोचो देश की कविराज।
कपोल कल्पित बातें हुईं बहुत,
अब तो लोक की सुन लो कविराज।
साक्षी तुम्ही बनी हो
आँसू बहे हमारें,मैया पुकार लो ना।
बैठे तिरे सहारे, राहे निहार लो ना।
विनती सुनो खड़े हैं,बाधा मिटे हमारी।
साक्षी तुम्ही बनी हो,पूजा करें तिहारी।
सुर राग साथना को,मैं भाव से सुना दूँ।
नव छंद को रचा है, मैं गीत गुनगुना लूँ।
ये लेखनी सदा ही,जग के लिए रचाना।
भावों भरी कहानी,जग को मुझे सुनाना
तुम दीन दो सहारा, समझो जहाँ सुधारा।
जो लोक को रुचे है, करना वही दुबारा।
बनना विशाल उर के,तुम भेद भाव रोको।
साथी कमाल कर दो,तुम स्वार्थ भाव टोको।
साकार हो सभी के,सपनें सजें सुहाने।
हो लेखनी अमर यूँ,रच गीत सुर सजाने।।
आशा सदा बढ़ाना,मन ना निराश पाना।
सच्ची कहो कहानी,जग नाम कर दिखाना।।
हाइकु
मिला कहाँ है?
न्याय सीता को बोलो
चुप क्यों राम?
मिला कहाँ है?
न्याय द्रोपदी को भी
क्यों मौन कृष्ण?
टूटा टूटा है
गरीब मजदूर
होता शोषण
जलती धरा
आग युद्ध भीषण
है मानवता?
आँधी ले गयी
फसलें हरियल
विधि का न्याय?
उठे विक्षोभ
माँगे न्याय प्रकृति
जागों मनुज!
अमानवीय
आचरण तजना
सुनो मनुज?
रोको मानव!
शोषण औ दोहन
आहत सृष्टि!
चीखती धरा!
तपिश लू जलाती
कौन सुने है?
प्रचण्ड गर्मी
लेती प्रतिशोध भू
घटते वन!
न्याय करें है
विधान विधि सदा
समझो मनु!
मत सताओ
दीन दलित पंगु
लगेगी हाय!
न्यायोचित हो
आचरण सर्वदा
फले जीवन.
बनके कृष्ण
मेटो अन्याय सदा
हे! कर्मयोद्धा.
जीवन चक्र
माँगे है संतुलन
सुनो मनुज!
न्याय माँगे है
हर शोषित वर्ग
जागो इंसान!
धर्म औ न्याय
जीवन की है धारा
सुनो नाविक!
मिलेगा न्याय
पीड़ित को हमेशा
आस मन की.
तेरे कर्म ही
आते लौट कर यूँ
न्याय विधि का.
भ्र्ष्टाचार मेटो
सत की हो स्थापना
हो न्याय प्रभु!
पाता सजा जो
अत्याचारी अधर्मी
फलेगा न्याय.



