अचानक प्रकृति करवट लेती है और कुछ दरक जाता है। ऐसे में कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोगों में ईश्वरी चेतना जागृत होती है और वे लोगों के लिए मिसाल बन जाते हैं। केबी व्यास का जीवन भी ऐसे ही कहानी कहता है। वे टूटे नहीं और ईश्वर ने उन्हें एक ऐसी चेतना दी कि वे दूसरों के मन की बात समझने लगे, वे करुणा से भीतर तक भर गए, लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा उन्हें कचौटते और वे मानवीय संवेदनाओं से भर जाते। शायद इन्हीं भावों ने उन्हें फिर से खड़ा किया और आज वे समाज को जागृत और खड़ा करने में तत्पर हैं।…
दिलीप कुमार पुरोहित. शारजाह
जीवन की राह विचित्र हैं। यहां कब क्या हो जाए, जीवन को समझना मुश्किल है। कई बार आदमी बड़े सपने देखता है, कई महत्वाकांक्षाएं पालता है, जीवन के बारे में सोचते-सोचते काफी आगे निकल जाता है, अचानक प्रकृति करवट लेती है और कुछ दरक जाता है। ऐसे में कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोगों में ईश्वरी चेतना जागृत होती है और वे लोगों के लिए मिसाल बन जाते हैं। केबी व्यास का जीवन भी ऐसे ही कहानी कहता है। वे टूटे नहीं और ईश्वर ने उन्हें एक ऐसी चेतना दी कि वे दूसरों के मन की बात समझने लगे, वे करुणा से भीतर तक भर गए, लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा उन्हें कचौटते और वे मानवीय संवेदनाओं से भर जाते। शायद इन्हीं भावों ने उन्हें फिर से खड़ा किया और आज वे समाज को जागृत और खड़ा करने में तत्पर हैं।
केबी व्यास 1986 से सोका गक्कई इंटरनेशनल के सक्रिय सदस्य हैं और डॉ. दाईसाकु इकेदा इनके गुरु हैं। ये सन 2000 में शारजाह चले गए थे और तब से वहीं रह रहे हैं। वे वहां रेडियो जॉकी बन कर गए थे और वहां से पहले ये दिल्ली में भी रेडियो जॉकी ही थे। 17 वर्ष तक दिल्ली और शरजाह में रेडियो जॉकी के रूप में कार्य करने के बाद 2015 में अचानक इन्हें ब्रेन स्ट्रोक हो गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर एक मिलीमीटर भी मस्तिष्क की ये नस और फूल जाती तो फट जाती और आपके शरीर का दायां हिस्सा पेरालाइज हो जाता।
उस समय इनके विचारों की तारतम्यता इनके बोले गए शब्दों में बिल्कुल उलट आती थी। जैसे कि ये बोलना चाहते हैं कि – आपसे मिलकर मुझे अच्छा लगा और इनके मुंह से निकल जाता कि – हनुमान जी पोषक हैं। ना कोई संदर्भ ना कोई उस समय की घटना और इनके मुंह से अनायास ही कुछ का कुछ निकल जाता था । परंतु उस समय एक बड़ी अजीब घटना घटित हुई। ये हालांकि बोल नहीं पाते थे बस सभी की सुनते थे और समझते थे। उसके बाद जब लोगों को सुनना शुरू किया तो इन्हें इंट्यूटिवली पता चल जाता था कि ये व्यक्ति कितना सच बोल रहा है, ये व्यक्ति कितने दुख में है, इस व्यक्ति की पीड़ा कितनी है, इस व्यक्ति का सुख और आनंद कितना है। ये चूँकि बोल नहीं पाते थे इसलिए इनकी नजरों में से करुणा बहती थी। उस समय इन्होंने निर्णय लिया कि अब ये अपने प्रकाशन के कार्य को आगे बढ़ाएंगे और जो कुछ भी इन्होंने महसूस किया है उसे सहज– अभिव्यक्ति नाम की 10 पुस्तकों की सीरीज में निकालेंगे।
2014 में हाइकू संग्रह आया, और ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हो गए
साहित्य जगत में अब इनका स्पष्ट दृष्टिकोण हो चुका था कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है। आज तक कुल मिलाकर इनकी छः पुस्तकें निकल चुकी हैं। पहली पुस्तक आई 2014 में – हाइकु जो इनका कविता संग्रह है वो उस समय आई थी जब जोधपुर में हाइकु की पहली पुस्तक आई थी। उन दिनों फ़ेसबुक पर एक ग्रुप चलता था – “भा सा री हथई” उसमें से 6 लोगों के हाइकुओं को शामिल किया और 7 वां केबी व्यास खुद थे। तो इस तरह से “हाइकु इंद्रधनुष” नाम की पुस्तक निकली। फिर इन्हें ब्रेन स्ट्रोक हो गया और तब अन्य 5 पुस्तकें निकाली । “पुष्करणा रत्न” “प्रगति की ओर” “ सहज अभिव्यक्ति – भाग 1” “सहज अभिव्यक्ति – भाग 2” और अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है “सहज अभिव्यक्ति – भाग 3”।
सहज अभिव्यक्ति पुस्तक मात्र नहीं, एक विचारधारा का प्रवाह है
“सहज अभिव्यक्ति – भाग 2” की भूमिका पद्मश्री शीन काफ निजाम साहब और अजमेर के डॉ. शिबन कृष्ण रैना और “सहज अभिव्यक्ति – भाग 3” की भूमिका प्रो. हिम्मत सिंह सिन्हा जो कुरुक्षेत्र में दर्शन शास्त्र के विभागाध्यक्ष थे और डीन भी थे उन्होंने लिखी है तथा दूसरी श्री कमलेश भट्ट ‘कमल’ ने लिखी है।
नारी भी कर सकती है अंतिम संस्कार
इन्होंने अपनी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति – भाग 1” में एक आलेख लिखा है “नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है” और इसके ऊपर इन्होंने वेदों के प्रमाण भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि वेदों मे अंतिम संस्कार करने के लिए ‘संतान’ शब्द का उपयोग हुआ है, ना कि ‘पुत्र’ का। बस उस व्यक्ति को जनेऊ पहने हुए होना चाहिए और उस समय 2015 में एक महाविद्यालय में प्रिंसिपल रही डॉ. आशा रानी राय ने कानपुर में आर्य समाज ने 100 कन्याओं को जनेऊ धारण करवाया था|
मित्र धूप में स्वच्छ-शीतल जल के समान
अपनी दूसरी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति – भाग 2” में के बी व्यास लिखते हैं “मैं मित्र हूँ – और जीवन के रास्ते पर मित्र का मिल जाना जैसे धूप में किसी प्यासे को स्वच्छ ठंडा पानी मिल जाना है |” इसके पश्चात “सहज अभिव्यक्ति – भाग 3” आई । जैसे-जैसे उनकी एक-एक पुस्तक आती रही वे जीवन में गहरे गोता लगाते रहे और भीतर के रत्न मणिक निकल कर बाहर लाते रहे। वे लोगों को भी देख रहे थे, अपने आस पास भी देख रहे थे और “सहज अभिव्यक्ति” भी लिख भी रहे थे। इस तरह से अब जो “सहज अभिव्यक्ति – भाग 4” आ रही है उसमें दो आलेख हैं “ अंतर्ज्ञान” (Intuition) तथा दूसरा है “अतीन्द्रिय” (Imperceptible)।
मित्रता तब गहरी होती है जब कृतज्ञता को महसूस करते हैं
डॉ. दाईसाकु इकेदा कहते हैं – “मित्रता और गहरी होती है, जब हम किसी दूसरे की कृतज्ञता को महसूस करते हैं, उस व्यक्ति को और सहयोग करते हैं और उसके प्रति वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा उसने हमारे लिए किया था।”साहित्य इनके जीवन का उद्देश्य बन गया है और इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा की जन्म शताब्दी 2028 में आने से पहले विश्व ज्ञान – यात्रा का संकल्प इन्होंने लिया हुआ है और अभी तक यह भारत, यूएई, बहरीन, कतर, ओमान, मौरीशस, सिंगापुर, मलेशिया और जापान हो आए हैं। अब इनका अगला पड़ाव 21 और 25 मई को जर्मनी में है तथा उसके पश्चात कैनेडा और यूएसए भी जाएंगे।







