आज के दौर में अंधविश्वास,धार्मिक अवसरवाद धार्मिक पाखंड पर तीखा कटाक्ष
राखी पुरोहित. जोधपुर
मनुष्य को अपनी आस्था और श्रद्धा ऐसी रखनी चाहिए कि किसी के कहने भर से किसी भी चीज या जगह को उपासना या आराधना का माध्यम न बनाया जाए, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि उस वस्तु अथवा जगह का धार्मिक महत्व है भी या नहीं। प्रतिष्ठित रंग संस्था आकांक्षा (जोधपुर इप्टा) के बैनर तले रविवार को भगत की कोठी विस्तार योजना स्थित आकांक्षा सभागार में सफल मंचित हास्य व्यंग्य नाटक ‘थाली का बैंगन’ के माध्यम से कुछ ऐसा ही संदेश दिया गया। नाटक के माध्यम से समाज में फैले अंधविश्वास, धार्मिक अवसरवाद और पाखंड पर बेहद संजीदगी लेकिन तीखे अंदाज में प्रहार किया गया।
प्रख्यात कथाकार व उपन्यासकार कृश्न चंदर की अमर कहानी पर आधारित —हास्य व्यंग्य नाटक नाटक ‘थाली का बैंगन’ का सफल मंचन हुआ। इस नाटक का नाट्य रूपांतरण और कुशल निर्देशन मशहूर रंग निर्देशक डॉ. विकास कपूर ने किया। नाटक में कृश्न चंदर के धारदार लेखन और डॉ. कपूर के निर्देशन का बेजोड़ कलात्मक व भावपक्ष देखने को मिला, जिसे देख सभागार में मौजूद दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। यह नाटक समाज को यह कड़ा संदेश देने में पूरी तरह सफल रहा कि किस तरह चंद स्वार्थी तत्व अपनी रोटियां सेकने के लिए आम जनता की धार्मिक भावनाओं और अंधविश्वास का दुरुपयोग करते हैं, जिसका खामियाजा अंततः निर्दोष समाज को भुगतना पड़ता है। कार्यक्रम के अंत में दर्शकों ने खड़े होकर तालियों के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
यह था कथानक: एक नजर
नाटक की कहानी एक अत्यंत गरीब परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो धंधा मंदा होने के कारण फाके (भूखमरी) की कगार पर पहुंच जाता है। विपदा के इस दौर में पति अपनी अटी (बटुए) से आखिरी सिक्का निकालकर अपनी पत्नी को बाजार से बैंगन लाने के लिए कहता है। पत्नी बाजार से बैंगन लेकर आती है और जैसे ही रसोई में उसे काटने बैठती है, तो कटे हुए बैंगन के भीतर बीजों की प्राकृतिक बनावट से ‘अल्लाह’ लफ्ज़ उभरा हुआ दिखाई देता है। यह देखकर पति-पत्नी दोनों चौंक उठते हैं।
धीरे-धीरे यह बात पूरे शहर में फैल जाती है और लोग इसे कुदरत का करिश्मा मानने लगते हैं। तमाम अकीदतमंद और मुस्लिम समाज के लोग इस ‘बैंगन मुबारक’ के दीदार के लिए उमड़ पड़ते हैं। लोगों का मानना था कि एक काफिर के घर में ही सही, लेकिन साफ़ ईमान का जलवा बिखरा है। इसके बाद वहां नजराना और चढ़ावा आने लगता है। बैंगन को कांच के एक खूबसूरत बक्से में सुरक्षित रख दिया जाता है और उसके नीचे पवित्र हरा कपड़ा बिछा दिया जाता है। घर में बकायदा कुरान ख्वानी का दौर शुरू हो जाता है।
कुछ दिनों के बाद जब लोगों का जोश ठंडा पड़ने लगता है और चढ़ावे के साथ-साथ भीड़ कम होने लगती है, तो चालाक पति एक नई जुगत भिड़ाता है। वह बैंगन को दोबारा गौर से देखता है और इस बार उसे बैंगन का रुख बदला हुआ सा लगता है। पति-पत्नी बैंगन को इस तरह सहेजते हैं कि इस बार उसमें ‘ॐ’ (ओम) की आकृति दिखाई देने लगती है। अब पंडित रामदयाल को बुलाया जाता है, जो इस बात की तस्दीक (पुष्टि) करते हैं। देखते ही देखते वहां का नजारा बदल जाता है—अब वहां आरती होने लगती है, भजन गाए जाते हैं और सोने के जेवर सहित भारी चढ़ावा आने लगता है। चढ़ावे में से पंडित जी का हिस्सा तय कर दिया जाता है, जबकि बैंगन की मिल्कियत उसी पति-पत्नी के पास रहती है।
आहिस्ता-आहिस्ता जब इस ‘ॐ’ की आकृति का खुमार भी लोगों के सिर से उतरने लगता है और कमाई घटने लगती है, तो स्वार्थी पति फिर से एक नई तरकीब निकालता है। इस बार वह बैंगन के कोण (ज्यामिति) को बदलकर ईसाइयों के पवित्र प्रतीक ‘सलीब’ (क्रॉस) को दिखाने की तिकड़म में जुट जाता है। लेकिन इस बार उसकी यह चालाकी भारी पड़ जाती है। इस तिकड़म के चक्कर में पूरे शहर में सांप्रदायिक तनाव फैल जाता है। हिंदू, मुसलमान और ईसाई आपस में भिड़ जाते हैं। मामूली पत्थरबाजी से शुरू हुआ यह विवाद देखते ही देखते छुरेबाजी और खूनी दंगों में तब्दील हो जाता है, जिसमें कई बेकसूर लोगों की जान चली जाती है। अंत में, जब पुलिस मुस्तैदी से इस पूरे फसाद की जड़ तक पहुंचने वाली होती है, तब पकड़े जाने के डर से घबराए पति-पत्नी उस विवादित बैंगन को मोरी (गंदे नाले) में फेंक देते हैं और रातों-रात शहर छोड़कर भाग जाते हैं।
इन कलाकारों ने की जीवंत अदाकारी
नाटक की सफलता का मुख्य श्रेय इसके कलाकारों को जाता है, जिन्होंने अपने किरदारों में जान फूंक दी। मंच पर अभिनय करने वाले प्रमुख कलाकार इस प्रकार रहे:
इंदर (मुख्य पात्र/पति): अनुज अरोड़ा
सुंदरी (पत्नी): डॉ. नीतू परिहार
मास्टर जी: राजकुमार चौहान
गणेश मियां / मनन मियां: जयदीप व प्रवीण शर्मा
हाजी छन्नन: मोहम्मद हाशिर कश्फी
साई करम शाह: शरद शर्मा
पण्डित राम दयाल: हिमांशु जोशी
मौलवी साहब:
अफजल
हुसैन
टी.वी. रिपोर्टर: अंतिमा व्यास
पुत्तन: दीप्तांशु व्यास
अन्य कलाकार (कोरस व सहयोगी): कैलाश गहलोत, आराध्या परिहार, आदित्य, साहिल, सौरभ कच्छवाहा और मोहम्मद हाशिर।
मंच से परे (नेपथ्य की टीम)
नाटक को तकनीकी और संगीतमय रूप से प्रभावी बनाने में बैकस्टेज टीम का विशेष योगदान रहा:
गीत संयोजन: अनुज अरोड़ा
गीत रिकॉर्डिंग: सुनील गौड़ (गौड़ स्टूडियो, जोधपुर)
वेशभूषा: कैलाश गहलोत एवं डॉ. नीतू परिहार
रूप सज्जा (मेकअप): अंतिमा व्यास व कैलाश गहलोत
मंच व्यवस्था: प्रवीण शर्मा और माया
ध्वनि प्रभाव: रौनक गहलोत
मंच आलोकन (प्रकाश व्यवस्था): मोहम्मद शफी
प्रस्तुति नियंत्रक: प्रवीण कुमार झा






